166 करोड़ हेक्टेयर जमीन की बिगड़ी सेहत, 10 फीसदी बहाली से भर सकता है 15 करोड़ लोगों का पेट: एफएओ

दुनिया में 166 करोड़ हेक्टेयर भूमि की सेहत बिगड़ चुकी है और इसमें 60 फीसदी हिस्सा कृषि व चरागाह भूमि का है। एफएओ ने उम्मीद जताई है कि इसकी 10 फीसदी बहाली से हर साल और 15.4 करोड़ लोगों का पेट भरा जा सकता है।
फोटो: सेंटर फॉर साइंस एंड एनवायरमेंट (सीएसई)
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सारांश
  • दुनिया में 166 करोड़ हेक्टेयर भूमि की सेहत बिगड़ चुकी है, जिसमें करीब 60 फीसदी हिस्सा कृषि और चरागाह भूमि का है।

  • संयुक्त राष्ट्र खाद्य एवं कृषि संगठन (एफएओ) के मुताबिक, इस खराब हो चुकी भूमि के महज 10 फीसदी हिस्से को भी बहाल कर लिया जाए तो हर साल 15.4 करोड़ अतिरिक्त लोगों के लिए भोजन पैदा किया जा सकता है।

  • यह आंकड़ा बताता है कि भूमि क्षरण का संकट केवल पर्यावरण तक सीमित नहीं है, बल्कि सीधे हमारी थाली, खेती और आजीविका से जुड़ा है।

  • मंगोलिया में चल रहे यूएनसीसीडी के कॉप-17 सम्मेलन में एफएओ ने चरागाहों और भूमि की बहाली को खाद्य सुरक्षा और ग्रामीण अर्थव्यवस्था के लिए जरूरी बताया। विशेषज्ञों के मुताबिक, भूमि बहाली का मतलब सिर्फ बंजर जमीन को हरा करना नहीं, बल्कि घास, चारे और वनस्पतियों की विविधता और गुणवत्ता लौटाना भी है। इसमें पशुपालक समुदायों की भागीदारी अहम है।

  • सम्मेलन में भूमि बहाली के लिए निवेश और वैश्विक साझेदारी बढ़ाने पर जोर दिया गया है। अफ्रीका की ‘ग्रेट ग्रीन वॉल’ जैसी पहलें दिखाती हैं कि बड़े पैमाने पर भूमि को फिर से उत्पादक बनाया जा सकता है। लेकिन इसके लिए ठोस नीतियों, वैज्ञानिक तैयारी और पर्याप्त निवेश की जरूरत है। आज जमीन बचाने की कार्रवाई ही कल की रोटी, रोजगार और आजीविका को सुरक्षित कर सकती है।

धरती की सूखती, बंजर और गुणवत्ता खोती जमीन सिर्फ पर्यावरण से जुड़ा संकट नहीं, बल्कि करोड़ों लोगों की रोजी-रोटी और भविष्य से भी जुड़ा सवाल है।

संयुक्त राष्ट्र खाद्य एवं कृषि संगठन (एफएओ) के मुताबिक अविवेकपूर्ण उपयोग और कुप्रबंधन के कारण 166 करोड़ हेक्टेयर भूमि की सेहत बिगड़ चुकी है। चिंता की बात यह है कि इसमें से 60 फीसदी कृषि योग्य जमीन और चरागाह भूमि है।

हालांकि विशेषज्ञों का अनुमान है कि भू-क्षरण की भेंट चढ़ चुकी इस जमीन के यदि 10 फीसदी हिस्से को भी बहाल कर लिया जाए, तो हर साल और 15.4 करोड़ लोगों के लिए भोजन पैदा किया जा सकता है।

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यह बात एफएओ की उप महानिदेशक बेथ बेचडोल ने यूनाइटेड नेशन कन्वेंशन टू कॉम्बैट डेजर्टिफिकेशन (यूएनसीसीडी)  के कॉन्फ्रेंस ऑफ पार्टीज (कॉप-17) के 17वें सत्र में कही है। इस दौरान उन्होंने रेंजलैंड्स यानी चरागाहों और रेगिस्तानी परिदृश्यों की बहाली को खाद्य सुरक्षा, ग्रामीण आजीविका और मजबूत ग्रामीण अर्थव्यवस्था के लिए बेहद अहम बताया।

सिर्फ जमीन को हरा करना काफी नहीं

अपने वक्तव्य में बेचडोल ने स्पष्ट किया कि भूमि की बहाली का मतलब केवल सूखी और बंजर जमीन को फिर से हरा कर देना नहीं है। असल सवाल यह है कि वहां कैसी वनस्पति उगाई जा रही है।

उनके मुताबिक, घास, चारे और अन्य वनस्पतियों की विविधता और गुणवत्ता महत्वपूर्ण है। यही पशुधन को भोजन देती है, जैव विविधता को सहारा देती है और लंबे समय तक इन पारिस्थितिक तंत्रों को स्वस्थ और उत्पादक बनाए रखती है।

उन्होंने चरवाहों और पशुपालक समुदायों को केवल लाभार्थी नहीं, बल्कि चरागाहों के संरक्षण और बहाली में साझेदार, नेतृत्वकर्ता और निर्णय लेने वाले के रूप में मान्यता देने की जरूरत पर भी जोर दिया।

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गौरतलब है कि मरुस्थलीकरण से निपटने के लिए यूएनसीसीडी की सत्रहवीं बैठक (कॉप 17) मंगोलिया की राजधानी उलानबटार में 17 से 28 अगस्त, 2026 के बीच आयोजित हो रही है।

दो सप्ताह तक चलेगा भूमि बचाने का मंथन

कॉप-17 का यह दो सप्ताह तक चलने वाला सम्मेलन खराब हो चुकी भूमि को फिर से उपजाऊ बनाने और भूमि, मिट्टी व पानी के पर्यावरण अनुकूल तरीके से प्रबंधन के लिए नीतिगत कार्रवाई और निवेश जुटाने पर केंद्रित है।

दुनिया में बढ़ती आबादी के साथ भोजन, पशु चारे और फाइबर की मांग भी लगातार बढ़ रही है। ऐसे में कृषि और चरागाह भूमि को बचाना भविष्य की खाद्य सुरक्षा के लिए अनिवार्य होता जा रहा है।

एफएओ द्वारा साझा जानकारी के मुतबिक सम्मेलन में शुरू किए गए रेंजलैंड्स फ्लैगशिप इनिशिएटिव के तीन प्रमुख स्तंभ हैं। पहला ज्ञान और शोध को साझा करने की व्यवस्था; दूसरा, सार्वजनिक और निजी निवेश जुटाने के लिए निवेश मंच और तीसरा, चरागाहों और पशुपालक समुदायों के लिए एक साझा वैश्विक गठबंधन तैयार करना।

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एफएओ ने 2026 को ‘चरागाहों और पशुपालकों को समर्पित अंतरराष्ट्रीय वर्ष’ घोषित करने की पहल का नेतृत्व किया, जिससे इस मुद्दे को वैश्विक स्तर पर व्यापक पहचान और नई गति मिल सके। बेचडोल का कहना है कि अब केवल जागरूकता पैदा करना काफी नहीं। इस बढ़ते वैश्विक समर्थन को ठोस निवेश और साझेदारियों में बदलना होगा, ताकि चरागाहों और उन पर निर्भर समुदायों को वास्तविक लाभ मिल सके।

अफ्रीका की ‘ग्रेट ग्रीन वॉल’ को भी नई उम्मीद

कॉप-17 के दौरान बेचडोल ने अफ्रीका के साहेल क्षेत्र में विशाल ‘ग्रेट ग्रीन वॉल पहल’ को मजबूत करने पर भी चर्चा की। इस पहल का उद्देश्य मरुस्थलीकरण और भूमि क्षरण से प्रभावित क्षेत्रों में बड़े पैमाने पर भूमि और पारिस्थितिक तंत्रों को बहाल करना है।

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एफएओ के आकलन के मुताबिक, साहेल क्षेत्र की ग्रेट ग्रीन वॉल पट्टी में करीब 16.2 करोड़ हेक्टेयर खराब भूमि ऐसी है, जिसे बहाल करने की जरूरत है। इस आकलन के लिए 3 लाख से अधिक स्थानों पर उच्च-रिजॉल्यूशन उपग्रह तस्वीरों का विश्लेषण किया गया।

अब एफएओ और उसके साझेदार उन्नत तकनीक के जरिए भूमि बहाली की प्रगति पर नजर रखने और उसके परिणामों को दर्ज करने की एकीकृत प्रणाली विकसित कर रहे हैं।

बेचडोल ने कहा कि आखिरकार इन प्रयासों की सफलता के लिए वित्तीय निवेश जरूरी है। लेकिन निवेश आने से पहले भी वैज्ञानिक और तकनीकी तैयारी के जरिए परियोजनाओं के जोखिम कम किए जा सकते हैं।

बंजर होती धरती को जीवन देने की है दरकार

असली चुनौती यह है कि बंजर होती धरती को फिर से जीवन दिया जाए, ताकि चरागाह लौटें, पशुओं को चारा मिले, किसानों और चरवाहों की आजीविका बचे और आने वाली पीढ़ियों के लिए भविष्य सुरक्षित रह सके।

आखिरकार, सवाल सिर्फ बंजर जमीन को फिर से हरा करने का नहीं। सवाल उस मिट्टी को बचाने का है, जिससे करोड़ों लोगों की रोटी, किसानों और चरवाहों की आजीविका और ग्रामीण अर्थव्यवस्थाओं का भविष्य जुड़ा है।

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यदि आज भू-क्षरण को रोकने और खराब हो चुकी जमीन को बहाल करने के लिए ठोस निवेश और कार्रवाई नहीं हुई, तो आने वाले समय में यह संकट सिर्फ धरती तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि हमारी थाली और आजीविका तक पहुंच जाएगा।

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