

तेलंगाना के नलगोंडा और वारंगल जिलों में छिपकली की दो नई प्रजातियों की खोज से वैज्ञानिकों को मिली बड़ी सफलता।
नलगोंडा में मिली नई छिपकली का नाम हेमिडैक्टिलस कैरनिकोल रखा गया, जो पारंपरिक पत्थरों के ढेर में रहती है।
वारंगल में मिली दूसरी प्रजाति हेमिडैक्टिलस कोयाओरम का नाम कोया आदिवासी समुदाय के सम्मान में रखा गया है।
वैज्ञानिकों ने दोनों प्रजातियों की पहचान के लिए शारीरिक बनावट, सांख्यिकीय विश्लेषण और डीएनए जांच की मदद ली।
यह खोज तेलंगाना की जैव विविधता को समझने और स्थानीय वन्यजीवों के प्राकृतिक आवासों को बचाने के लिहाज से महत्वपूर्ण है।
भारत के वन्यजीव संसार में एक और दिलचस्प खोज हुई है। तेलंगाना के दो जिलों में छिपकली की दो नई प्रजातियों की पहचान की गई है। वैज्ञानिकों ने इन्हें हेमिडैक्टिलस कैरनिकोल और हेमिडैक्टिलस कोयाओरम नाम दिया है। इनमें से पहली प्रजाति नलगोंडा जिले में और दूसरी वारंगल जिले में मिली है। यह खोज बताती है कि हमारे आसपास मौजूद चट्टानों, पत्थरों और जंगलों में आज भी ऐसे जीव छिपे हैं, जिनके बारे में विज्ञान को पूरी जानकारी नहीं है।
इस अध्ययन में भारतीय प्राणी सर्वेक्षण (जूलॉजिकल सर्वे ऑफ इंडिया), फकीर मोहन विश्वविद्यालय, हैदराबाद के नेहरू प्राणी उद्यान और भारतीय वन्यजीव संस्थान के शोधकर्ताओं ने हिस्सा लिया। वैज्ञानिकों ने दोनों प्रजातियों की शारीरिक बनावट और उनके डीएनए का अध्ययन कर यह पुष्टि की कि वे पहले से ज्ञात प्रजातियों से अलग हैं। यह शोध यूरोपियन जर्नल ऑफ टैक्सोनॉमी में प्रकाशित किया गया है।
पत्थरों के ढेर में छिपी नई पहचान
नलगोंडा में मिली हेमिडैक्टिलस कैरनिकोल की कहानी खास है। इसके नाम में ही इसके रहने की जगह का संकेत छिपा है। ‘कैरनिकोल’ नाम पारंपरिक रूप से बनाए जाने वाले पत्थरों के ढेर यानी ‘स्तूप’ से जुड़ा है। ऐसे ढेर छिपकलियों को धूप, गर्मी और बदलते मौसम से बचने के लिए सुरक्षित जगह देते हैं।
यह छिपकली आकार में मध्यम है और इसकी लंबाई लगभग 49 मिलीमीटर तक होती है। इसकी पीठ पर अलग-अलग आकार के शल्क पाए जाते हैं। इनके बीच उभरे हुए, नुकीले और धारदार उभार भी मौजूद हैं। शरीर की ये विशेषताएं इसे दूसरी मिलती-जुलती छिपकलियों से अलग पहचान देती हैं।
कोया समुदाय के नाम पर दूसरी प्रजाति
वारंगल जिले में मिली दूसरी प्रजाति हेमिडैक्टिलस कोयाओरम का नाम कोया आदिवासी समुदाय के सम्मान में रखा गया है। यह समुदाय मध्य और दक्षिण-पूर्वी भारत के कुछ हिस्सों में रहता है और क्षेत्र के जंगलों तथा पहाड़ी इलाकों से उसका पुराना संबंध रहा है।
इस नाम के जरिए वैज्ञानिकों ने स्थानीय समुदायों की पारंपरिक जानकारी और प्रकृति के संरक्षण में उनकी भूमिका को सम्मान देने का प्रयास किया है।
यह प्रजाति पहली की तुलना में थोड़ी बड़ी है। इसकी लंबाई लगभग 55.6 मिलीमीटर तक पहुंचती है। इसके सिर के पिछले हिस्से में शल्क अपेक्षाकृत एकसमान होते हैं और वहां धारदार शल्क नहीं पाए जाते। इसके पेट पर शल्कों की संख्या भी पहली प्रजाति से कम है।
डीएनए जांच से खुला राज
दोनों छिपकलियों की पहचान करना आसान नहीं था, क्योंकि इनका संबंध पहले से ज्ञात प्रजातियों के समूह से है। केवल बाहरी बनावट देखकर इनके बीच का अंतर समझना मुश्किल हो सकता था। इसलिए शोधकर्ताओं ने शरीर की माप, शल्कों की बनावट और सांख्यिकीय विश्लेषण के साथ डीएनए जांच का सहारा लिया।
वैज्ञानिकों ने ऊतकों के नमूनों से आनुवंशिक पदार्थ निकाला और माइटोकॉन्ड्रियल डीएनए के एनडी-2 जीन का अध्ययन किया। इसके बाद कंप्यूटर आधारित तरीकों से इन छिपकलियों के विकासवादी संबंधों का विश्लेषण किया गया।
नतीजों से पता चला कि दोनों नई प्रजातियां हेमिडैक्टिलस मुर्रायी समूह से संबंधित हैं और उनकी निकटता हेमिडैक्टिलस ट्रेउटलरी नामक प्रजाति से है। हालांकि, आनुवंशिक अंतर और शारीरिक विशेषताओं ने साबित किया कि ये दोनों अलग प्रजातियां हैं।
जैव विविधता के लिए क्यों अहम है खोज?
भारत में हेमिडैक्टिलस वंश की 60 से अधिक प्रजातियां दर्ज की जा चुकी हैं। इनमें कई ऐसी हैं, जो खास क्षेत्रों में ही पाई जाती हैं। तेलंगाना में इन दो नई प्रजातियों का मिलना इस बात का संकेत है कि क्षेत्र की जैव विविधता को अभी और गहराई से समझने की जरूरत है।
यह खोज केवल दो नई छिपकलियों के नाम जोड़ने तक सीमित नहीं है। यह भी याद दिलाती है कि छोटे-छोटे पत्थरों के ढेर, चट्टानी जमीन और जंगल अनेक जीवों के लिए महत्वपूर्ण आश्रय हैं। इन प्राकृतिक और पारंपरिक आवासों को बचाना जरूरी है, ताकि ऐसी अनोखी प्रजातियां सुरक्षित रह सकें। तेलंगाना की ये दोनों नई छिपकलियां प्रकृति के उस रहस्य की झलक हैं, जो अक्सर हमारी नजरों के सामने होते हुए भी अनदेखा रह जाता है।