

गंगा और उसकी सहायक नदियों में किए गए सर्वे के मुताबिक उत्तर प्रदेश में 2,397 गंगा डॉल्फिन दर्ज की गई थी, जो किसी भी राज्य में सबसे अधिक हैं।
एनजीटी में दाखिल रिपोर्ट के अनुसार राज्य सरकार डॉल्फिन के आवास संरक्षण, मछली पकड़ने के जाल से होने वाली मौतों को कम करने और समुदाय की भागीदारी को बढ़ाने के लिए कई कदम उठा रही है।
उत्तरी प्रदेश में गंगा और उसकी सहायक नदियों यमुना, चंबल, केन, गोमती, राप्ती, बेतवा और घाघरा के करीब 3,450 किलोमीटर लम्बे क्षेत्र में डॉल्फिनों का व्यापक सर्वे किया जा रहा है। इस दौरान डॉल्फिनों की सटीक पहचान सुनिश्चित करने के लिए हाइड्रोफोन और जियो-रेफरेंस तकनीक जैसे आधुनिक उपकरणों की मदद ली गई है।
2012 में सर्वे किए गए हिस्सों में करीब 671 डॉल्फिन पाई गई थी। इसके बाद 2021 से 2023 के दौरान किए गए राष्ट्रीय सर्वे में भारत भर में 6,327 डॉल्फिनों की मौजूदगी दर्ज की गई। इनमें से 2,397 डॉल्फिनें अकेले उत्तर प्रदेश में रिकॉर्ड की गई।
उत्तर प्रदेश में सबसे ज्यादा डॉल्फिन
यह आंकड़ा किसी भी राज्य में डॉल्फिनों की पाई गई संख्या से अधिक है। वर्तमान में उत्तर प्रदेश के 13 जिलों में गंगा नदी के तट पर दूसरा राष्ट्रीय सर्वे किया जा रहा है। यह जानकारी उत्तर प्रदेश के चीफ वाइल्डलाइफ वार्डन ने 17 फरवरी 2026 को नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (एनजीटी) में प्रस्तुत रिपोर्ट में दी है।
उत्तर प्रदेश ने 2023 में गंगा नदी डॉल्फिन को राज्य का जलीय जीव घोषित किया था। इसके बाद से राज्य सरकार ने डॉल्फिन के संरक्षण को मजबूत करने के लिए उनके प्राकृतिक आवासों की सुरक्षा और बहाली पर विशेष जोर दिया है।
डॉल्फिन के कई अहम आवास राष्ट्रीय चंबल अभयारण्य और सारनाथ कछुआ अभयारण्य के संरक्षित नदी क्षेत्रों में स्थित हैं। इनकी सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए नियमित गश्त, शिकार और अवैध गतिविधियों पर रोक, चिन्हित नदी हिस्सों में रेत खनन पर नियंत्रण और डॉल्फिन के आवास का वैज्ञानिक मानचित्रण जैसे कदम उठाए जा रहे हैं। इन प्रयासों का उद्देश्य डॉल्फिन के संवेदनशील आवासों को सुरक्षित रखना है।
रिपोर्ट में वैज्ञानिक निगरानी की कमी पर भी बात की गई है। उत्तर प्रदेश वन विभाग ने वाइल्डलाइफ इंस्टीट्यूट ऑफ इंडिया, डब्ल्यूडब्ल्यूएफ इंडिया और वाइल्डलाइफ ट्रस्ट ऑफ इंडिया के साथ मिलकर एकीकृत और वैज्ञानिक रूप से मान्य विधियों से डॉल्फिन आबादी का सर्वे किया है।
संरक्षित नदी क्षेत्र और आवास की सुरक्षा पर जोर
रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि जागरूकता कार्यक्रम महज औपचारिक गतिविधियां नहीं हैं, बल्कि उन्हें जमीनी स्तर पर चल रहे संरक्षण प्रयासों से जोड़ा गया है। समुदाय की भागीदारी बढ़ाने के साथ-साथ इंसानों और डॉल्फिन के बीच टकराव को कम करने के लिए "माई गंगा, माई डॉल्फिन” अभियान चलाया जा रहा है।
इसके तहत प्रशिक्षित सामुदायिक स्वयंसेवकों, जिन्हें ‘डॉल्फिन मित्र’ कहा जाता है, को मछुआरों के स्थानीय समुदाय और वन विभाग के बीच सेतु की भूमिका निभाने के लिए जोड़ा गया है। ये स्वयंसेवक जागरूकता फैलाने के साथ-साथ डॉल्फिन संरक्षण से जुड़े प्रयासों में सहयोग भी करते हैं।
सहभागी संरक्षण को मजबूत करने के लिए क्षमता-निर्माण कार्यशालाएं, आजीविका से जुड़े जागरूकता कार्यक्रम और परामर्श बैठकें नियमित रूप से आयोजित की जाती हैं। इस भागीदारी से डॉल्फिन को जानबूझकर नुकसान पहुंचाने की घटनाओं में कमी आई है। साथ ही, डॉल्फिन के फंसने की घटनाओं की बेहतर जानकारी मिल रही है और बचाव अभियानों के दौरान स्थानीय समुदाय का सहयोग भी बढ़ा है।
मछली पकड़ने के जाल और ‘घोस्ट नेट’ बन रहे खतरा
रिपोर्ट में मछली पकड़ने से डॉल्फिन की होने वाली मौतों और ‘घोस्ट नेट’ (छूटे हुए जाल) की समस्या का भी जिक्र किया गया है। इसके मुताबिक मछली पकड़ने के उपकरणों से होने वाली मौतों को कम करने के लिए कई कदम उठाए गए हैं। इनमें डॉल्फिन को जाल से दूर रखने वाले उपकरण ‘पिंगर्स’ को बढ़ावा देना और बाय-बैक पहल के जरिए पुराने या छोड़े गए जालों को हटाना शामिल है।
इसके साथ ही मछुआरा समुदाय को मछली पकड़ने के सतत तरीकों के बारे में जागरूक किया जा रहा है। राज्य में डॉल्फिन संरक्षण के प्रयास अलग-अलग नदी क्षेत्रों की स्थानीय परिस्थितियों को ध्यान में रखकर किए जा रहे हैं। इसमें रेत खनन, मछली पकड़ने की तीव्रता, नावों की आवाजाही और प्रदूषण जैसे स्थानीय खतरों को भी ध्यान में रखा जाता है।
रिपोर्ट में वित्तीय वर्ष 2025-26 के दौरान केंद्र सरकार की “वन्यजीव आवासों के समेकित विकास” योजना के तहत गंगा डॉल्फिन संरक्षण के लिए स्वीकृत 91.235 लाख रुपए से किए जाने वाले प्रस्तावित कार्यों का भी विस्तृत ब्यौरा दिया गया है।
इसके साथ ही स्थानीय खतरों से निपटने के लिए डिवीजन स्तर पर सूक्ष्म-स्तरीय योजना भी बनाई जा रही है। उत्तर प्रदेश वन विभाग, टर्टल सर्वाइवल अलायंस के सहयोग से नहर प्रणाली में फंसने वाली डॉल्फिनों के लिए बचाव अभियान भी चला रहा है। 2024 और 2025 में शारदा फीडर नहर में कई सफल बचाव अभियान किए गए।
इन अभियानों में डॉल्फिन को सुरक्षित तरीके से पकड़ना, पशु चिकित्सकीय जांच और उपयुक्त प्राकृतिक आवास में छोड़ना सुनिश्चित किया जाता है। इसके लिए तय मानक संचालन प्रक्रियाओं (एसओपी) का पालन किया जाता है।