असम के जंगलों में मिली ड्रैगनफ्लाई की नई प्रजाति, दशकों पुराना वैज्ञानिक रहस्य सुलझा

करबी आंगलोंग की वनधारा में मिली ‘डिस्फिया असामेन्सिस’, अब दुनिया में इस वंश की दस प्रजातियां; सिटीजन साइंटिस्ट्स की तस्वीरों ने भी निभाई अहम भूमिका
असम के करबी आंगलोंग में मिली डैमसेलफ्लाई की नई प्रजाति, दुनिया में डिस्फिया वंश की प्रजातियों की संख्या हुई दस।
असम के करबी आंगलोंग में मिली डैमसेलफ्लाई की नई प्रजाति, दुनिया में डिस्फिया वंश की प्रजातियों की संख्या हुई दस।फोट साभार: जूटाक्सा पत्रिका
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सारांश
  • असम के करबी आंगलोंग में मिली डैमसेलफ्लाई की नई प्रजाति, दुनिया में डिस्फिया वंश की प्रजातियों की संख्या हुई दस।

  • दशकों पुराना वैज्ञानिक भ्रम खत्म, पूर्वोत्तर भारत और बांग्लादेश की डैमसेलफ्लाई अब डिस्फेया वॉली नहीं, नई प्रजाति मानी गई।

  • पांच नर नमूनों के अध्ययन से हुई नई प्रजाति की पहचान, नागरिक वैज्ञानिकों की तस्वीरों से मादा का विवरण भी तैयार।

  • नीले पेट और काले पंखों से मिलेगी नई डैमसेलफ्लाई की पहचान, करीबी प्रजाति डिस्फेया वॉली से बिल्कुल अलग।

  • करबी आंगलोंग में जंगलों की कटाई नई प्रजाति के लिए खतरा, वैज्ञानिकों ने वनधाराओं और प्राकृतिक आवास बचाने पर दिया जोर।

असम के जंगलों से एक ऐसी खबर आई है, जिसने पूर्वोत्तर भारत की जैव विविधता को लेकर वैज्ञानिकों की समझ में एक नया अध्याय जोड़ दिया है। असम के करबी आंगलोंग जिले में वैज्ञानिकों ने डैमसेलफ्लाई की एक नई प्रजाति खोजी है। इसका नाम डिस्फेया आसामेंसिस रखा गया है। इस खोज के साथ ही दुनिया में डिस्फिया वंश की ज्ञात प्रजातियों की संख्या बढ़कर दस हो गई है। यह अध्ययन जूटाक्सा नामक पत्रिका में प्रकाशित किया गया है।

इस खोज की खास बात सिर्फ एक नई प्रजाति का मिलना नहीं है, बल्कि दशकों से चले आ रहे एक वैज्ञानिक भ्रम का खत्म होना भी है। पूर्वोत्तर भारत और बांग्लादेश में पाई जाने वाली इस डैमसेलफ्लाई को लंबे समय से म्यांमार में वर्ष 1927 में दर्ज की गई प्रजाति डिस्फेया वॉली समझा जाता रहा था। नए अध्ययन ने साबित किया है कि ये दोनों अलग-अलग प्रजातियां हैं।

पांच नर नमूनों से खुला रहस्य

इस खोज को अंजाम देने वाली टीम में डिब्रूगढ़ विश्वविद्यालय, एमआईटी वर्ल्ड पीस यूनिवर्सिटी, भारतीय प्राणी सर्वेक्षण (जूलॉजिकल सर्वे ऑफ इंडिया) और देबराज रॉय कॉलेज के शोधकर्ता शामिल थे।

शोधकर्ताओं को यह नई प्रजाति करबी आंगलोंग की तलहटी से गुजरने वाली एक वनधारा के किनारे मिली। यह धारा नांबोर और गरमपानी वन्यजीव अभयारण्यों से होकर बहती है। आसपास घना जंगल था और धारा पर पेड़ों की छाया पड़ती थी। ऐसे ही शांत, कम रोशनी वाले वन क्षेत्र इस प्रजाति का प्राकृतिक आवास हैं।

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मैदानी सर्वेक्षण के दौरान शोधकर्ताओं ने पांच नर नमूने पकड़े। इनके शरीर, पंखों, पेट के हिस्सों और प्रजनन अंगों का बारीकी से अध्ययन किया गया। इसी जांच ने वैज्ञानिकों को यह समझने में मदद की कि उनके सामने मौजूद जीव डिस्फेया वॉली नहीं, बल्कि एक अलग और अब तक अनपहचानी प्रजाति है।

तस्वीरों से हुई मादा की पहचान

इस पूरी खोज का एक दिलचस्प पहलू मादा डैमसेलफ्लाई की पहचान है। नर के नमूने वैज्ञानिकों के पास मौजूद थे, इसलिए उनकी शारीरिक बनावट का प्रयोगशाला में विस्तार से अध्ययन किया जा सका। लेकिन मादा का औपचारिक विवरण तैयार करने में नागरिक वैज्ञानिकों और प्रकृति प्रेमियों की खींची गई उच्च गुणवत्ता वाली तस्वीरें बेहद काम आईं।

यह इस बात का शानदार उदाहरण है कि जैव विविधता की खोज अब केवल प्रयोगशालाओं और जंगलों में वैज्ञानिकों तक सीमित नहीं है। ऑनलाइन जैव विविधता मंचों पर साझा की गई तस्वीरें भी नई प्रजातियों की पहचान और वैज्ञानिक अनुसंधान में महत्वपूर्ण योगदान दे सकती हैं।

नीले रंग की खास पहचान, पंखों का अलग अंदाज

नई प्रजाति को उसकी करीबी रिश्तेदार डिस्फेया वॉली से अलग पहचानना आसान है, बशर्ते उसके पंखों और पेट पर बने निशानों को ध्यान से देखा जाए।

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दोनों प्रजातियों के नर के पेट पर नीले रंग के खास हिस्से दिखाई देते हैं। लेकिन डिस्फेया आसामेंसिस के पंखों के आधार पर गहरा, अपारदर्शी काला रंग होता है। इसके अगले पंखों का काला हिस्सा पिछले पंखों की तुलना में छोटा होता है। पंखों के सिरे भी संकरे और अपारदर्शी होते हैं।

इसके उलट डिस्फेया वॉली के दोनों पंखों के आधार पर काले रंग का हिस्सा लगभग बराबर होता है और उनके सिरे लगभग पारदर्शी दिखाई देते हैं। नई प्रजाति के पेट के ऊपरी हिस्से पर नीले रंग की विस्तृत और बारीक बनावट भी इसे दूसरी प्रजातियों से अलग बनाती है।

नाम में छिपी है असम की पहचान

इस नई प्रजाति का नाम असामेंसिस असम राज्य के नाम पर रखा गया है। यह नाम उस क्षेत्र को सम्मान देता है, जहां पहली बार इसके नमूने मिले। शोधकर्ताओं का मानना है कि इसका फैलाव केवल करबी आंगलोंग तक सीमित न होकर पूर्वोत्तर के दूसरे इलाकों में भी हो सकता है।

नई खोज के साथ संरक्षण की बड़ी चुनौती

इस खोज ने जहां असम की प्राकृतिक संपदा का गौरव बढ़ाया है, वहीं एक गंभीर चेतावनी भी दी है। जिस इलाके में इस प्रजाति का पहला नमूना मिला, वहां खेती के विस्तार और शहरीकरण के कारण जंगल तेजी से घटे हैं।

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छायादार जंगलों की छोटी-छोटी धाराएं इस डैमसेलफ्लाई का घर हैं। जंगल कटने, जलस्रोतों के स्वरूप में बदलाव और मानवीय गतिविधियों का सीधा असर ऐसे जीवों पर पड़ सकता है।

शोधकर्ताओं के मुताबिक, अब इन वनधाराओं और उनके आसपास के जंगलों को बचाना, साथ ही इस प्रजाति की आबादी पर लगातार नजर रखना जरूरी है। करबी आंगलोंग की यह खोज हमें याद दिलाती है कि प्रकृति के खजाने में अभी बहुत कुछ अनदेखा और अनजाना है। जरूरत सिर्फ इतनी है कि जंगलों को समझने के साथ-साथ उन्हें बचाने की कोशिश भी की जाए।