जलाशय पाटकर खड़ी कर दीं इमारतें: नगर निगम की लापरवाही पर आर्द्रभूमि प्राधिकरण का बड़ा खुलासा

यह मामला पश्चिम बंगाल के दक्षिण 24 परगना जिले में 'उकिल भेरी' नामक जलाशय को अवैध रूप से भरकर उस पर प्लॉटिंग और निर्माण किए जाने से जुड़ा है।
जलाशय पाटकर खड़ी कर दीं इमारतें: नगर निगम की लापरवाही पर आर्द्रभूमि प्राधिकरण का बड़ा खुलासा
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सारांश
  • दक्षिण 24 परगना स्थित ‘उकिल भेरी’ जलाशय को भरकर अवैध निर्माण किए जाने का मामला अब गंभीर होता जा रहा है।

  • पश्चिम बंगाल राज्य आर्द्रभूमि प्राधिकरण ने नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (एनजीटी) में दायर अपने हलफनामे में खुलासा किया है कि जलाशय से अतिक्रमण हटाने के लिए कोलकाता नगर निगम से कई बार अनुरोध किए गए, लेकिन कोई प्रभावी कार्रवाई नहीं हुई।

  • संयुक्त समिति की जांच में सामने आया कि 2013 के बाद जलाशय के हिस्सों को अवैध रूप से भरकर वहां प्लॉटिंग, चारदीवारी और इमारतें खड़ी कर दी गईं।

  • समिति ने साफ सिफारिश की कि इन सभी निर्माणों को ध्वस्त कर जलाशय को उसकी मूल स्थिति में बहाल किया जाए।

  • रिपोर्ट में यह भी कहा गया कि जलाशय की सुरक्षा और पहचान सुनिश्चित करने के लिए भू-टैगिंग और सीमांकन जरूरी है। इसके बावजूद प्रशासनिक उदासीनता के कारण कार्रवाई ठप पड़ी रही।

  • अब मामला हाईकोर्ट और एनजीटी दोनों के सामने है, जहां पर्यावरण संरक्षण बनाम अवैध निर्माण का संघर्ष एक बड़े शहरी प्रशासनिक विफलता के रूप में उभर रहा है।

कोलकाता नगर निगम (केएमसी) की कथित लापरवाही के चलते दक्षिण 24 परगना जिले के मौजा निमोकपोक्तान स्थित ‘उकिल भेरी’ जलाशय पर अवैध कब्जे और निर्माण का मामला लगातार गहराता जा रहा है।

पश्चिम बंगाल राज्य आर्द्रभूमि प्राधिकरण (डब्ल्यूबीएसडब्ल्यूए) ने 22 मई 2026 को नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (एनजीटी) में दायर अपने जवाबी हलफनामे में कहा है कि जलाशय से अतिक्रमण हटाने के लिए कोलकाता नगर निगम से कई बार अनुरोध किया गया, लेकिन अब तक कोई कार्रवाई नहीं हुई है।

यह मामला उकिल भेरी नामक जलाशय को अवैध रूप से भरकर उस पर प्लॉटिंग और निर्माण किए जाने से जुड़ा है।

पश्चिम बंगाल राज्य आर्द्रभूमि प्राधिकरण ने अपनी रिपोर्ट में कहा है कि एनजीटी के आदेश पर गठित संयुक्त समिति ने 17 फरवरी 2022 को मौके का निरीक्षण किया था और नवंबर 2022 में अपनी अंतिम रिपोर्ट सौंपी थी।

मुख्य विवाद: क्या है पूरा मामला?

समिति ने पाया कि 2013 के बाद जलाशय को भरकर वहां प्लॉट बनाए गए और अवैध भवनों तथा चारदीवारी का निर्माण किया गया। रिपोर्ट में साफ कहा गया कि इन निर्माणों को ध्वस्त कर जलाशय को उसकी मूल स्थिति में बहाल किया जाना चाहिए।

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समिति ने यह भी सिफारिश की थी कि जलाशय को बहाल करने के बाद कोलकाता नगर निगम, पश्चिम बंगाल अंतर्देशीय मत्स्य अधिनियम, 1984 के तहत उसका प्रबंधन अपने हाथ में ले। साथ ही उकिल भेरी की सीमा को कंक्रीट के खंभों से चिह्नित कर भू-टैगिंग कराने की भी सिफारिश की गई थी। इसके लिए दक्षिण 24 परगना के अतिरिक्त जिला मजिस्ट्रेट (भूमि सुधार) की मदद लेने को कहा गया था।

समिति ने अपनी रिपोर्ट में कहा कि 2013 के बाद उकिल भेरी जलाशय के एक हिस्से को भरकर वहां अवैध इमारतें और चारदीवारी बनाई गईं। इसलिए इन निर्माणों को गिराकर जमीन को उसकी पुरानी स्थिति में बहाल किया जाना चाहिए।

क्यों 'उकिल भेरी' को बचाने में नाकाम रहा प्रशासन?

रिपोर्ट में स्पष्ट किया गया कि यह जलाशय कोलकाता नगर निगम (केएमसी) के अधिकार क्षेत्र में आता है। ऐसे में जलाशयों को भरने जैसी अवैध गतिविधियों के खिलाफ कार्रवाई करने का अधिकार कानूनी तौर पर कोलकाता नगर निगम के आयुक्त के पास है।

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इसके बावजूद पश्चिम बंगाल राज्य आर्द्रभूमि प्राधिकरण और राज्य के पर्यावरण विभाग द्वारा बार-बार अनुरोध किए जाने के बाद भी नगर निगम ने इन अवैध निर्माणों को हटाने की दिशा में कोई ठोस कदम नहीं उठाया है।

इस मामले में याचिकाकर्ता सब्यसाची मलिक चौधरी ने एनजीटी द्वारा गठित संयुक्त समिति की अंतिम रिपोर्ट की सिफारिशों को लागू करने की मांग करते हुए कलकत्ता हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया है। हालांकि यह रिट याचिका अभी भी हाईकोर्ट में लंबित है।

हाई कोर्ट ने 8 अप्रैल 2026 के अपने ताजा आदेश में कहा है कि जब तक अदालत द्वारा नियुक्त विशेष अधिकारी अपनी रिपोर्ट दाखिल नहीं कर देते, तब तक विवादित संपत्ति के कब्जे की मौजूदा स्थिति बरकरार रखी जाए।

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