

स्टैनफोर्ड के वैज्ञानिकों ने पहली बार दुनिया भर में दुर्लभ मेंटल भूकंपों का नक्शा तैयार किया।
मेंटल भूकंप क्रस्ट के नीचे उत्पन्न होते हैं, गहरे होते हुए भी पृथ्वी की सतह पर बहुत कम झटके महसूस कराते हैं।
वैज्ञानिकों ने एसएन व एलजी तरंगों के अनुपात का विश्लेषण कर इन गहरे भूकंपों की पहचान करने का नया तरीका विकसित किया।
1990 से 46,000 भूकंपों में से 459 की पुष्टि मेंटल भूकंप के रूप में हुई, वास्तविक संख्या इससे अधिक हो सकती है।
इस खोज से क्रस्ट-मेंटल सीमा, ऊपरी मेंटल व्यवहार, और भूकंपों के जुड़े चक्र को समझने में महत्वपूर्ण योगदान मिला।
स्टैनफोर्ड यूनिवर्सिटी के वैज्ञानिकों ने एक महत्वपूर्ण खोज की है। उन्होंने दुनिया का पहला वैश्विक नक्शा तैयार किया है जो एक दुर्लभ प्रकार के भूकंप को दिखाता है। ये भूकंप पृथ्वी की ऊपरी परत यानी क्रस्ट में नहीं, बल्कि उससे नीचे स्थित मेंटल में होते हैं। यह अध्ययन प्रसिद्ध वैज्ञानिक पत्रिका साइंस में प्रकाशित हुआ है।
इस नई खोज से वैज्ञानिकों को यह समझने में मदद मिलेगी कि मेंटल में भूकंप कैसे और क्यों आते हैं। इससे भविष्य में सामान्य भूकंपों को समझने में भी सहायता मिल सकती है।
पृथ्वी की परतें क्या हैं?
पृथ्वी तीन मुख्य परतों से बनी है - क्रस्ट (ऊपरी परत), मेंटल (मध्य परत) और कोर (अंदरूनी भाग)। क्रस्ट पतली और कठोर परत है जिस पर हम रहते हैं। इसके नीचे मेंटल है, जो लगभग 1,800 मील मोटी है। मेंटल बहुत गर्म और अर्ध-ठोस होता है।
क्रस्ट और मेंटल के बीच की सीमा को मोहो (मोहरोविसिक असंतता) कहा जाता है। आमतौर पर अधिकतर भूकंप इसी मोहो के ऊपर, यानी क्रस्ट में आते हैं।
मेंटल भूकंप क्या होते हैं?
सामान्य भूकंप छह से 18 मील की गहराई में होते हैं। लेकिन मेंटल भूकंप इससे भी अधिक गहराई में, मोहो के नीचे उत्पन्न होते हैं। पहले वैज्ञानिकों को शक था कि मेंटल इतना कठोर नहीं है कि वहां भूकंप आ सके। लेकिन पिछले कुछ वर्षों में मिले प्रमाणों से यह स्पष्ट हुआ कि दुर्लभ मामलों में मेंटल में भी भूकंप आते हैं।
ये भूकंप बहुत गहरे होते हैं, इसलिए धरती की सतह पर इनका असर कम महसूस होता है। फिर भी, ये पृथ्वी की आंतरिक संरचना को समझने के लिए बहुत महत्वपूर्ण हैं।
ये भूकंप कहां पाए गए?
नए नक्शे से पता चला कि मेंटल भूकंप पूरी दुनिया में होते हैं, लेकिन कुछ क्षेत्रों में अधिक पाए जाते हैं। विशेष रूप से ये भूकंप हिमालय क्षेत्र में अधिक देखे गए हैं। इसके अलावा बेरिंग स्ट्रेट के आसपास भी इनकी संख्या ज्यादा है। ये दोनों क्षेत्र भूगर्भीय गतिविधियों के लिए पहले से ही प्रसिद्ध हैं।
वैज्ञानिकों ने कैसे पहचाने ये भूकंप?
मेंटल भूकंप की पहचान करना आसान नहीं था। इसलिए वैज्ञानिकों ने एक नई विधि विकसित की।
वैज्ञानिकों ने दो प्रकार की भूकंपीय तरंगों का अध्ययन किया -
एसएन तरंगें - ये मेंटल के ऊपरी भाग से गुजरती हैं।
एलजी तरंगें - ये क्रस्ट के अंदर आसानी से फैलती हैं।
अगर किसी भूकंप में एसएन और एलजी तरंगों का अनुपात अलग होता है, तो इससे पता चलता है कि वह भूकंप मेंटल में उत्पन्न हुआ है।
वैज्ञानिकों ने 1990 से अब तक के 46,000 से अधिक भूकंपों का अध्ययन किया। उनमें से 459 भूकंपों को मेंटल भूकंप के रूप में पहचाना गया।
खोज का महत्व
हालांकि मेंटल भूकंप सतह पर ज्यादा नुकसान नहीं पहुंचाते, लेकिन ये बहुत महत्वपूर्ण जानकारी देते हैं। इनसे पता चलता है क्रस्ट और मेंटल की सीमा कैसी है। मेंटल के अंदर चट्टानें कैसे व्यवहार करती हैं। भूकंप कैसे शुरू होते हैं, पृथ्वी के अंदर गर्मी और दबाव का क्या प्रभाव होता है।
कुछ मेंटल भूकंप बड़े क्रस्ट भूकंपों के बाद आते हैं। जबकि कुछ मेंटल के अंदर गर्मी और पदार्थ के घूमने के कारण हो सकते हैं।
भविष्य की दिशा
वैज्ञानिकों का मानना है कि भविष्य में और अधिक सिस्मिक सेंसर लगाए जाएंगे। इससे और भी मेंटल भूकंपों का पता चल सकेगा। विशेष रूप से दूरस्थ क्षेत्रों जैसे तिब्बती पठार में अधिक शोध की जरूरत है।
इस नई खोज से यह समझ बढ़ेगी कि पृथ्वी की अलग-अलग परतें एक साथ मिलकर कैसे काम करती हैं। हो सकता है कि क्रस्ट और मेंटल के भूकंप एक बड़े चक्र का हिस्सा हों।
स्टैनफोर्ड के वैज्ञानिकों की यह खोज पृथ्वी विज्ञान के क्षेत्र में एक बड़ी उपलब्धि है। पहली बार मेंटल भूकंपों का वैश्विक नक्शा तैयार किया गया है।
इससे वैज्ञानिकों को पृथ्वी की गहराई में छिपी प्रक्रियाओं को समझने में मदद मिलेगी। भविष्य में यह शोध भूकंपों के बेहतर अध्ययन और जोखिम की समझ को भी मजबूत करेगा। इस प्रकार, मेंटल भूकंप भले ही दुर्लभ हों, लेकिन वे हमारी पृथ्वी को समझने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम साबित हो रहे हैं।