बारिश की आवाज 'सुन' सकते हैं पौधे, क्या है आवाज, कंपन और अंकुरण का विज्ञान?

स्टडी से पता चला है कि बीज बारिश की आवाज को महसूस कर सकते हैं वो इसे पहचानकर अपने विकास की प्रक्रिया को 40 फीसदी तक तेज कर देते हैं।
प्रतीकात्मक तस्वीर: आईस्टॉक
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सारांश
  • जब बारिश की पहली बूंद मिट्टी को छूती है, तो वह सिर्फ धरती को ही नहीं, उसके भीतर सोए जीवन को भी जगा देती है। नई वैज्ञानिक स्टडी बताती है कि बीज बारिश की आवाज को “सुन” सकते हैं और यही आवाज उनके लिए जीवन शुरू करने का संकेत बन जाती है।

  • मैसाचुसेट्स इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी (एमआईटी) से जुड़े वैज्ञानिकों ने अध्ययन में पाया है कि खासकर धान के बीज बारिश की ध्वनि मिलने पर 30 से 40 फीसदी तक तेजी से अंकुरित होते हैं।

  • दरअसल, बारिश की बूंदों से पैदा होने वाली ध्वनि-तरंगें मिट्टी और पानी के भीतर कंपन पैदा करती हैं। ये कंपन बीज के अंदर मौजूद सूक्ष्म कणों, स्टैटोलिथ को हिलाते हैं, जो बीज को यह संकेत देते हैं कि अब बढ़ने का सही समय है।

  • यानी बीज सिर्फ पानी का इंतजार नहीं करते, बल्कि वे यह भी “महसूस” करते हैं कि आसपास का माहौल उनके उगने के लिए अनुकूल है।

  • यह खोज बताती है कि पौधे उतने निष्क्रिय नहीं हैं, जितना हम सोचते हैं। वे अपने आसपास की दुनिया को सुनते, समझते और उसके अनुसार प्रतिक्रिया देते हैं। बारिश की टप-टप दरअसल एक संदेश है, जो मिट्टी के अंधेरे में छिपे बीजों को जीवन की ओर पहला कदम बढ़ाने के लिए पुकारती है।

जब बारिश की पहली बूंद मिट्टी को छूती है, तो सिर्फ धरती ही नहीं महकती, मिट्टी के भीतर छिपे बीज भी जाग उठते हैं। बारिश की टप-टप करती यह बूंदें जहां इंसानों को सुकून देती हैं, वहीं यही आवाज बीजों के लिए जागने, उठने और जीवन शुरू करने का संकेत बन जाती है। लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि ऐसा क्यों होता है?

विज्ञान कहता है, मिट्टी में दबे बीज बारिश की गिरती हुई बूंदों से पैदा होने वाली हल्की कंपन को महसूस कर सकते हैं। ये कंपन उन्हें ‘नींद’ यानी सुप्त अवस्था से बाहर आने का इशारा देती है। बीज भी बारिश की आहट को जैसे पहले ही समझ लेते हैं और आने वाले पानी का 'स्वागत' करने के लिए अंकुरित होने लगते हैं।

अमेरिका के मैसाचुसेट्स इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी (एमआईटी) के वैज्ञानिकों ने पहली बार साबित किया है कि बीज बारिश की आवाज को पहचान सकते हैं और उसके जवाब में तेजी से उगने लगते हैं।

प्रतिष्ठित जर्नल साइंटिफिक रिपोर्ट्स में प्रकाशित इस स्टडी के मुताबिक, खासकर धान के बीज बारिश की ध्वनि मिलने पर 40 फीसदी तक तेजी से अंकुरित होते हैं।

बीजों का बारिश से संवाद

क्या बारिश की बूंदों से बनने वाली ध्वनि तरंगें बीजों को प्रभावित कर सकती हैं। इसे समझने के लिए वैज्ञानिकों ने धान के करीब 8,000 बीजों पर प्रयोग किया। इनमें से कुछ बीजों को पानी में डाला गया और कुछ बीजों पर लगातार हल्की, मध्यम और तेज पानी की बूंदें गिराई गई, ताकि प्राकृतिक बारिश जैसा माहौल बनाया जा सके। वहीं कुछ बीजों को बिना किसी ध्वनि के नम माहौल दिया गया।

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नतीजे चौंकाने वाले थे, जिन बीजों पर 'बारिश की आवाज पड़ी', वे अन्य बीजों की तुलना में 30 से 40 फीसदी तक तेजी से अंकुरित होने लगे।

वैज्ञानिकों के अनुसार, जब बारिश होती है, तो उसकी आवाज बीजों तक यह संकेत पहुंचाती है कि आसपास का माहौल अनुकूल है, यानी अब जड़ें फैलाने और बढ़ने का सही समय है। खासतौर पर पानी या मिट्टी में मौजूद बीज इस ध्वनि को बेहतर तरीके से महसूस कर पाते हैं, क्योंकि पानी में ध्वनि तरंगें हवा की तुलना में ज्यादा प्रभावी ढंग से फैलती हैं।

इसका मतलब यह है कि पौधे अपने आसपास के माहौल को समझने के लिए सिर्फ रोशनी, नमी या गुरुत्वाकर्षण पर ही निर्भर नहीं हैं, बल्कि वे 'आवाज' का भी इस्तेमाल करते हैं।

सच कहें तो पौधे हमारी सोच से कहीं ज्यादा संवेदनशील होते हैं। जीवित रहने के लिए उन्होंने अपने आसपास के माहौल को महसूस करना और उसके अनुसार प्रतिक्रिया देना सीख लिया है।

यही वजह है कि कुछ पौधे छूने पर तुरंत बंद हो जाते हैं, तो कुछ हानिकारक गंध मिलने पर अपने पत्ते समेट लेते हैं। और सबसे आम बात अधिकतर पौधे रोशनी की ओर बढ़ते हैं, ताकि सूरज की ऊर्जा से बेहतर तरीके से बढ़ सकें। इसी तरह पौधे गुरुत्वाकर्षण को भी महसूस कर सकते हैं।

क्यों होता है ऐसा? क्या है इसके पीछे का विज्ञान

वैज्ञानिकों ने पाया कि जैसे हमारे कान के अंदर मौजूद महीन क्रिस्टल 'ओटोलिथ' शरीर के संतुलन और गति को समझने में मदद करते हैं, वैसे ही पौधों की जड़ों में ‘स्टैटोलिथ’ नाम के बेहद छोटे कण होते हैं, जो आमतौर पर स्टार्च से बने होते हैं।

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ये कण पौधों को महसूस करने में मदद करते हैं कि नीचे की दिशा कौन-सी है, ताकि जड़ें सही दिशा में बढ़ सकें। बता दें कि जब स्टैटोलिथ कोशिका के अंदर नीचे की ओर बैठते हैं, तो पौधे को संकेत मिलता है कि जड़ों को उसी दिशा में बढ़ना है। वैज्ञानिकों के मुताबिक पौधे गुरुत्वाकर्षण को महसूस कर सकते हैं। यही वजह है कि उनकी जड़ें हमेशा नीचे की ओर बढ़ती हैं, जबकि तना ऊपर की ओर जाता है।

पौधे यह दिशा कैसे समझते हैं? इसके लिए उनकी कोशिकाओं में मौजूद स्टैटोलिथ मदद करते हैं। ये छोटे कण कोशिका के तरल हिस्से (साइटोप्लाज्म) से भारी होते हैं, इसलिए पानी में रेत की तरह नीचे की ओर बैठ जाते हैं। जब स्टैटोलिथ कोशिका के सबसे नीचे टिक जाते हैं, तो यह पौधे के लिए एक संकेत होता है कि नीचे किस दिशा में है। इसी के आधार पर जड़ें नीचे और तना ऊपर बढ़ता है।

आवाज, कंपन और अंकुरण का विज्ञान

दिलचस्प बात यह है कि अगर ये स्टैटोलिथ हिल जाएं या अपनी जगह से हट जाएं, तो यह भी बीज को तेजी से बढ़ने का संकेत दे सकता है।

इस शोध में एक नया और रोमांचक पहलू सामने आया कि ये स्टैटोलिथ सिर्फ दिशा ही नहीं बताते, बल्कि आवाज के कंपन को भी महसूस कर सकते हैं। ऐसे में जब बारिश की बूंदें जमीन या पानी पर गिरती हैं, तो वे शक्तिशाली ध्वनि-तरंगें पैदा करती हैं।

ये तरंगें बीज के भीतर हलचल पैदा कर देती हैं और स्टैटोलिथ को हिला देती हैं। यही हलचल बीज के लिए एक 'संकेत' बन जाती है कि अब बढ़ने का सही समय है।

कितना तेज होता है बारिश की टप-टप का असर?

वैज्ञानिकों के अनुसार, पानी के अंदर बारिश की आवाज का दबाव इतना अधिक होता है कि वह कुछ मीटर दूर खड़े जेट इंजन जितना प्रभाव पैदा कर सकता है।

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पानी या मिट्टी में मौजूद बीज इस ध्वनि को बेहतर तरीके से महसूस कर पाते हैं, क्योंकि पानी में ध्वनि तरंगें हवा की तुलना में ज्यादा प्रभावी ढंग से फैलती हैं। इसका असर खासतौर पर उन बीजों पर ज्यादा होता है जो सतह के करीब होते हैं, जहां नमी और बाहर निकलने की संभावना सबसे बेहतर होती है।

यह खोज बताती है कि बारिश सिर्फ पानी ही नहीं लाती, बल्कि एक भौतिक संकेत भी देती है, जिसे बीज पहचानते हैं। संभव है कि हवा, कीड़ों की हलचल या पेड़ों की सरसराहट जैसी प्राकृतिक आवाजें भी पौधों के विकास को प्रभावित करती हों।

क्या पौधे सच में ‘सुनते’ हैं?

वैज्ञानिक मानते हैं कि पौधे कानों से नहीं, बल्कि कंपन (वाइब्रेशन) के जरिए अपने आसपास की दुनिया को महसूस करते हैं। पिछले अध्ययनों में भी यह पाया गया है कि कुछ पौधे कीड़ों के पत्ते खाने की आवाज पर प्रतिक्रिया देते हैं, और मधुमक्खियों की भनभनाहट से परागण में मदद मिलती है।

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2014 में प्रकाशित एक अध्ययन में पाया गया कि जब पौधों को इल्ली (सूंडी) के पत्ते चबाने की आवाज सुनाई देती है, तो वे अपनी पत्तियों में ज्यादा कड़वे रसायन बनाने लगते हैं।

यह अध्ययन हमारी उस सोच को बदल देता है कि पौधे केवल चुपचाप खड़े रहते हैं। असल में वे अपने आसपास की दुनिया को सुनते, समझते और महसूस करते हैं। वे संकेतों को समझते हैं और सही समय पर प्रतिक्रिया देते हैं। इन्हीं संकेतों में एक संकेत बारिश की बूंदों का भी होता है, जो पौधों के लिए एक सन्देश होता है, जिसे सुनकर बीज मिट्टी के अंधेरे से बाहर आने की तैयारी करते हैं।

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