

फर्मी टेलीस्कोप ने मिल्की वे के केंद्र से 20 जीईवी ऊर्जा वाली गामा किरणों का रहस्यमयी संकेत दर्ज किया।
यह संकेत डार्क मैटर के डब्ल्यूआईएमपी कणों के टकराव से मिलने वाले सैद्धांतिक अनुमान से मेल खाता है।
अध्ययन का दावा है कि यह डार्क मैटर के प्रत्यक्ष अवलोकन का संभावित पहला सबूत हो सकता है।
विशेषज्ञों का कहना है कि पुष्टि के लिए अन्य डार्क मैटर–समृद्ध क्षेत्रों, जैसे बौनी आकाशगंगाओं, में समान संकेत मिलने जरूरी हैं।
अभी तक ऐसी बौनी आकाशगंगाओं में 20 जीईवी गामा किरणें नहीं मिली हैं, इसलिए परिणाम अभी निर्णायक नहीं माना जा सकता।
ब्रह्मांड का एक बड़ा हिस्सा आज भी हमारी आंखे और वैज्ञानिक उपकरण सीधे तौर पर नहीं देख पाते। इसी अदृश्य हिस्से का सबसे रहस्यमयी हिस्सा है डार्क मैटर, जिसे पहली बार 1930 के दशक में खगोलशास्त्री फ्रिट्ज ज़्विकी ने प्रस्तावित किया था।
वैज्ञानिकों का मानना है कि डार्क मैटर ब्रह्मांड के कुल पदार्थ का लगभग 85 प्रतिशत हिस्सा है। इसे सीधे नहीं देखा जा सकता, लेकिन आकाशगंगाओं की गति और उन पर लगने वाले गुरुत्वाकर्षण के प्रभाव से इसके अस्तित्व का अनुमान लगाया जाता है।
कई दशक बीत जाने के बाद भी डार्क मैटर को केवल अप्रत्यक्ष रूप से ही जाना गया था। पर हाल ही में एक अध्ययन ने इस दिशा में नई उम्मीदें जगा दी हैं। बताया जा रहा है कि नासा के फर्मी गामा-रे टेलीस्कोप से मिले आंकड़ों में ऐसा संकेत दिखा है, जिसे कुछ वैज्ञानिक “डार्क मैटर का पहला प्रत्यक्ष सबूत” भी कह रहे हैं, हालांकि इसकी पुष्टि अभी बाकी है।
फर्मी के आंकड़ों में क्या मिला?
जापान की टोक्यो यूनिवर्सिटी के शोधकर्ता की टीम ने फर्मी टेलीस्कोप द्वारा मिल्की वे गैलेक्सी के केंद्र से जुटाए गए गामा-रे आंकड़ों का विश्लेषण किया। वैज्ञानिकों का मानना है कि आकाशगंगा का केंद्र डार्क मैटर से सबसे अधिक घना क्षेत्र है, इसलिए वहां इसके संकेत मिलने की संभावना सबसे ज्यादा रहती है।
शोधकर्ताओं ने देखा कि आकाशगंगा के केंद्र के चारों ओर 20 जीईवी ऊर्जा के गामा किरणों की एक हल्की-सी चमकदार परत दिखाई दे रही है। यह परत या “हेलो” पहले से किए जा रहे सैद्धांतिक अनुमानों से मेल खाती है। सिद्धांत के अनुसार यदि डार्क मैटर के वीकली इंटरैक्टिंग मैसिव पार्टिकल (डब्ल्यूआईएमपी) टकराते या नष्ट होते हैं, तो वे ठीक इसी तरह की गामा किरणें उत्पन्न कर सकते हैं।
डब्ल्यूआईएमपी को ऐसा कण माना जाता है जिनका द्रव्यमान प्रोटॉन से करीब 500 गुना अधिक हो सकता है। यदि यह सैद्धांतिक अनुमान सही है, तो फर्मी द्वारा देखे गए संकेत इस संभावना को और मजबूत बनाते हैं कि यह चमक वास्तव में डार्क मैटर के विनाश का परिणाम हो सकती है।
शोध पत्र में शोधकर्ता के हवाले से कहा गया है कि अब तक ज्ञात कोई भी खगोलीय स्रोत इन गामा किरणों के आकार और ऊर्जा को आसानी से नहीं समझा पाता। यह संकेत इस बात का मजबूत इशारा है कि हम पहली बार डार्क मैटर को देख रहे हों।
विशेषज्ञों की सावधानी और आगे की राह
हालांकि वैज्ञानिक समुदाय इस दावे को लेकर अभी सावधानी बरत रहा है। शोधकर्ताओं ने स्वयं भी स्वीकार किया है कि यह निष्कर्ष अभी शुरुआती दौर में है और इसे साबित करने के लिए स्वतंत्र और विस्तृत जांच जरूरी है।
इसी दिशा में अगला कदम यह है कि ऐसे ही 20 जीईवी गामा-रे संकेत उन अन्य क्षेत्रों में भी खोजे जाएं जहां डार्क मैटर की प्रचुरता अधिक मानी जाती है, जैसे हमारी आकाशगंगा के आसपास की बौनी आकाशगंगाएं। इन आकाशगंगाओं में आम तौर पर सामान्य तारों की संख्या कम होती है, इस कारण डार्क मैटर के प्रभाव को पहचानना अपेक्षाकृत आसान होता है।
हालांकि शुरुआती जांचों में इन बौनी आकाशगंगाओं से ऐसा कोई स्पष्ट संकेत अभी तक नहीं मिला है। यूनिवर्सिटी ऑफ सरे शोधकर्ताओं के हवाले से कहा गया है कि यदि मिल्की वे के केंद्र में जो संकेत देखा गया है वह वास्तव में डार्क मैटर से उत्पन्न होता, तो वही संकेत इन छोटी आकाशगंगाओं में भी दिखना चाहिए था।
फिलहाल यह खोज डार्क मैटर अध्ययन के क्षेत्र में निश्चित रूप से एक उत्साहजनक कदम है, लेकिन इसे अंतिम प्रमाण नहीं माना जा सकता। यदि भविष्य में अन्य क्षेत्रों में भी इसी तरह की गामा किरणें मिलती हैं, तो यह डार्क मैटर के प्रत्यक्ष अवलोकन का पहला पक्का सबूत हो सकता है। तब तक, यह परिणाम वैज्ञानिक जिज्ञासा को और गहरा करता है और शोधकर्ताओं को ब्रह्मांड के इस अदृश्य रहस्य को समझने की दिशा में आगे बढ़ने के लिए प्रेरित करता है।