

प्रतिष्ठित जर्नल एनपीजी एजिंग में प्रकाशित एक नई रिसर्च के मुताबिक, यदि भविष्य में विज्ञान बुढ़ापे की लगभग सभी बीमारियों जैसे कैंसर, हृदय रोग और डिमेंशिया पर भी पूरी तरह विजय हासिल कर ले, तब भी इंसान अमर नहीं हो सकेगा।
इसकी सबसे बड़ी वजह शरीर की कोशिकाओं में जीवनभर जमा होने वाले डीएनए के छोटे-छोटे बदलाव, यानी सोमैटिक म्यूटेशन हैं।
गणितीय मॉडल पर आधारित इस रिसर्च के मुताबिक, आदर्श परिस्थितियों में भी मानव की अधिकतम उम्र 146 से 194 वर्ष के बीच ही सीमित रह सकती है।
रिसर्च में यह भी सामने आया कि मस्तिष्क और हृदय की वे कोशिकाएं, जो दोबारा नहीं बनतीं, उम्र की अंतिम सीमा तय करने में सबसे बड़ी भूमिका निभाती हैं। हालांकि वैज्ञानिकों का कहना है कि यह अमरता पर अंतिम फैसला नहीं, बल्कि उम्र बढ़ने की जटिल प्रक्रिया को समझने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है।
उनका लक्ष्य इंसान को अमर बनाना नहीं, बल्कि उसके अंतिम वर्षों को अधिक स्वस्थ, सक्रिय और सम्मानजनक बनाना है।
अमरत्व एक ऐसी चाह है जिसकी आकांक्षा युगों से मानव को रही है। सभ्यताएं बदलती रहीं, साम्राज्य मिटते रहे, लेकिन मृत्यु को हराने की यह चाह कभी खत्म नहीं हुई।
भारत में समुद्र मंथन से निकले 'अमृत' की कथा हो, अश्वत्थामा, हनुमान और परशुराम जैसे चिरंजीवियों का उल्लेख हो, प्राचीन मिस्र के वे फराओ हों जिन्होंने मृत्यु के बाद भी अनंत जीवन की उम्मीद में अपने लिए विशाल पिरामिड बनवाए, या फिर चीन के पहले सम्राट चिन शी हुआंग, जिन्होंने अमरत्व का अमृत खोजने के लिए दूर-दूर तक अपने दूत भेजे।
सच कहें तो हर सभ्यता ने किसी न किसी रूप में मृत्यु को मात देने का सपना देखा है। हजारों वर्षों बाद आधुनिक विज्ञान भी उसी अनंत सवाल का जवाब तलाश रहा है।
क्या आपने कभी सोचा है कि अगर विज्ञान इतनी तरक्की कर ले कि बुढ़ापे की हर बीमारी का इलाज ढूंढ निकाले, तो भी क्या हम हमेशा के लिए जी पाएंगे? हाल ही में हुए एक नए वैज्ञानिक अध्ययन ने इसका बड़ा ही भावुक और दिलचस्प जवाब दिया है- नहीं, इंसान कभी अमर नहीं हो सकता।
यह सही है कि वैज्ञानिकों खोजों की वजह से इंसान की औसत जीवन प्रत्याशा बढ़ी है, कई घातक बीमारियों का इलाज खोज जा चुका है और बुढ़ापे की रफ्तार धीमी करने पर भी शोध जारी है।
क्या सचमुच मुमकिन है अमर होना?
लेकिन रूस के स्कोलकोवो इंस्टीट्यूट ऑफ साइंस एंड टेक्नोलॉजी (स्कोलटेक) और एआईआरआई के वैज्ञानिकों ने अपनी नई रिसर्च में दावा किया है कि यदि भविष्य में विज्ञान बुढ़ापे के लगभग सभी कारणों और ह्रदय रोग, कैंसर, डिमेंशिया जैसी तमाम घातक बीमारियों पर भी विजय हासिल कर ले, तब भी मनुष्य हमेशा जीवित नहीं रह पाएगा।
वैज्ञानिकों के मुताबिक इसकी सबसे बड़ी वजह शरीर की कोशिकाओं में जीवनभर होने वाले सोमैटिक म्यूटेशन, यानी डीएनए में होने वाले वे छोटे-छोटे बदलाव हैं, जो समय के साथ बढ़ते जाते हैं।
शरीर के भीतर हर दिन लिखी जा रही बुढ़ापे की कहानी
सरल शब्दों में कहें तो हमारे शरीर की हर कोशिका समय-समय पर विभाजित होती है। जैसे-जैसे हमारी उम्र बढ़ती है, हमारे शरीर की कोशिकाओं में डीएनए की टूट-फूट और छोटी-मोटी गलतियां जमा होने लगती हैं।
हमारा शरीर इन्हें ठीक करने की कोशिश तो करता है, लेकिन हर बार कामयाब नहीं होता। यही नन्हे बदलाव धीरे-धीरे जमा होकर शरीर को अंदर से कमजोर करने लगते हैं। इन्हें ही सोमैटिक म्यूटेशन कहा जाता है।
रिसर्च से पता चला है कि इनमें से अधिकांश नुकसानदेह नहीं होते, लेकिन समय के साथ इनका लगातार जमा होना कोशिकाओं की कार्यक्षमता को कमजोर करता है और कैंसर सहित कई उम्र संबंधी बीमारियों के जोखिम बढ़ाता जाता है।
आखिर कितने साल जी सकता है इंसान?
अपनी इस रिसर्च में वैज्ञानिकों ने एक गणितीय मॉडल तैयार कर यह जानने का प्रयास किया कि अगर बुढ़ापे के बाकी सभी कारणों जैसे कैंसर, हृदय रोग, डिमेंशिया और उम्र बढ़ने से जुड़ी अन्य प्रक्रियाएं को हटा दिया जाए, तो महज सोमैटिक म्यूटेशन के बावजूद इंसान अधिकतम कितने समय तक जीवित रह सकता है? इस रिसर्च के नतीजे प्रतिष्ठित नेचर जर्नल एनपीजी एजिंग में प्रकाशित हुए हैं।
वैज्ञानिक मॉडल के अनुसार, ऐसी आदर्श स्थिति में भी इंसानों की अधिकतम उम्र करीब 146 से 194 वर्ष के बीच रहेगी। कुछ लोग इससे अधिक भी जी सकते हैं, लेकिन किसी भी स्थिति में इंसान हमेशा के लिए अमर नहीं होगा।
वैज्ञानिकों ने स्पष्ट किया है कि यह किसी व्यक्ति की उम्र की वास्तविक भविष्यवाणी नहीं, बल्कि यह समझने का वैज्ञानिक तरीका है कि केवल डीएनए में होने वाले बदलाव उम्र बढ़ने को कितनी सीमा तक प्रभावित करते हैं।
क्यों लंबी उम्र तक शरीर का साथ नहीं देते ये अंग?
अध्ययन में एक दिलचस्प तथ्य भी सामने आया है कि शरीर के सभी अंग एक समान गति से बूढ़े नहीं होते। त्वचा और लीवर जैसे अंग लगातार नई कोशिकाएं बनाकर पुरानी कोशिकाओं की जगह ले सकते हैं। इसलिए वे लंबे समय तक काम करते रहने में सक्षम हैं। इसके उलट मस्तिष्क की तंत्रिका कोशिकाएं (न्यूरॉन) और हृदय की मांसपेशियों की कोशिकाएं (कार्डियोमायोसाइट्स) लगभग दोबारा नहीं बनतीं।
इनमें जीवनभर सोमैटिक म्यूटेशन जमा होते रहते हैं और यही अंततः मानव जीवन की अधिकतम सीमा तय करने वाले सबसे बड़े कारक बन जाते हैं।
बुढ़ापे की पहेली में अभी बाकी हैं कई और कड़ियां
वैज्ञानिकों के अनुसार, स्टडी से पता चला है कि केवल सोमैटिक म्यूटेशन उम्र बढ़ने की पूरी कहानी बयां नहीं करते। यदि अकेले इनके आधार पर मनुष्य करीब 150 से 190 वर्ष तक जीवित रह सकता है, जबकि आज अधिकांश लोगों की आयु इससे काफी कम है, तो स्पष्ट है कि उम्र बढ़ने के पीछे कई अन्य जैविक प्रक्रियाएं भी समान रूप से जिम्मेदार हैं।
इनमें माइटोकॉन्ड्रिया की कार्यक्षमता में कमी, प्रोटीन संतुलन का बिगड़ना, टेलोमेयर का छोटा होना और एपिजेनेटिक बदलाव जैसे कई कारक शामिल हैं।
लंबी जिंदगी से ज्यादा जरूरी: 'बेहतर सेहतमंद जिंदगी'
वैज्ञानिकों ने स्पष्ट किया है कि इस अध्ययन का मकसद इंसानों को अमर बनाना नहीं, बल्कि उम्र बढ़ने की इस जटिल पहेली को सुलझाना है। वे यह समझना चाहते हैं कि शरीर का कौन सा हिस्सा सबसे पहले साथ छोड़ता है, ताकि उस पर काम करके इंसान की ढलती उम्र को दुखद नहीं, बल्कि स्वस्थ और खुशहाल बनाया जा सके।
उनके मुताबिक यह मॉडल उम्र बढ़ने की विभिन्न जैविक प्रक्रियाओं का मात्रात्मक आकलन करने का नया तरीका प्रस्तुत करता है। इससे यह समझने में मदद मिलेगी कि कौन-सी प्रक्रिया मानव जीवन को सबसे अधिक सीमित करती है और किन क्षेत्रों पर दवाओं तथा नई उपचार तकनीकों के विकास में सबसे पहले ध्यान देना चाहिए।
देखा जाए तो यह अध्ययन अमरता की उम्मीदों पर विराम लगाने के बजाय उम्र बढ़ने को समझने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है। संदेश साफ है, लंबी उम्र का सपना केवल एक चमत्कारी दवा से पूरा नहीं होगा। मानव जीवन की सीमा तय करने में कई जैविक प्रक्रियाएं मिलकर काम करती हैं। यदि इन्हें एक-एक करके समझा और नियंत्रित किया जा सके, तो शायद इंसान हमेशा के लिए नहीं, लेकिन आज की तुलना में कहीं अधिक स्वस्थ और लंबा जीवन जरूर जी सकेगा।
सच कहें तो भले ही अमरता प्रकृति के नियमों के खिलाफ हो, लेकिन विज्ञान की यह कोशिश इंसान के उन आखिरी सालों को मुस्कुराने का एक मौका जरूर दे सकती है।