भारत के वैज्ञानिकों ने विकसित की आयनमंडल के अध्ययन की नई तकनीक

जमीन और अंतरिक्ष से मिले आंकड़ों को जोड़कर तैयार किया गया सटीक मॉडल, संचार और नेविगेशन सेवाओं को मिलेगा फायदा
इस शोध से उपग्रह संचालन, रेडियो संचार, जीपीएस और भारत की नाविक प्रणाली की सटीकता में सुधार होगा।
इस शोध से उपग्रह संचालन, रेडियो संचार, जीपीएस और भारत की नाविक प्रणाली की सटीकता में सुधार होगा।फोटो साभार: आईस्टॉक
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सारांश
  • भारतीय वैज्ञानिकों ने पहली बार भारत के ऊपर टॉपसाइड आयनमंडल का अधिक सटीक मॉडल तैयार करने की नई तकनीक विकसित की है।

  • नई तकनीक में जमीन और अंतरिक्ष से प्राप्त आंकड़ों को जोड़कर इलेक्ट्रॉन घनत्व का अधिक वास्तविक आकलन किया गया है।

  • इस शोध से उपग्रह संचालन, रेडियो संचार, जीपीएस और भारत की नाविक प्रणाली की सटीकता में सुधार होगा।

  • नई पद्धति भूमध्य चुंबकीय क्षेत्र में आयनमंडल के जटिल व्यवहार को बेहतर ढंग से समझने और उसका अध्ययन करने में सहायक होगी।

  • वैज्ञानिकों का मानना है कि यह तकनीक अंतरिक्ष मौसम की बेहतर भविष्यवाणी करेगी और अन्य देशों में भी अपनाई जा सकेगी।

भारत के वैज्ञानिकों ने अंतरिक्ष विज्ञान के क्षेत्र में एक महत्वपूर्ण उपलब्धि हासिल की है। भारतीय भू-चुंबकत्व संस्थान (आईआईजी) के शोधकर्ताओं ने पहली बार भारत के ऊपर स्थित टॉपसाइड आयनमंडल का अधिक सटीक मॉडल तैयार करने की नई तकनीक विकसित की है।

इस तकनीक में जमीन और अंतरिक्ष से प्राप्त आंकड़ों को एक साथ जोड़कर आयनमंडल की वास्तविक स्थिति का बेहतर आकलन किया गया है। वैज्ञानिकों का मानना है कि इससे उपग्रह संचालन, रेडियो संचार, जीपीएस और नाविक जैसी नेविगेशन सेवाओं की विश्वसनीयता बढ़ेगी। साथ ही अंतरिक्ष मौसम की भविष्यवाणी भी पहले से अधिक सटीक हो सकेगी।

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इस शोध से उपग्रह संचालन, रेडियो संचार, जीपीएस और भारत की नाविक प्रणाली की सटीकता में सुधार होगा।

पृथ्वी की सुरक्षा और संचार में महत्वपूर्ण है आयनमंडल

आयनमंडल पृथ्वी के ऊपरी वायुमंडल का एक विशेष भाग है, जहां सूर्य से आने वाले विकिरण के कारण गैसों के कण आयनित हो जाते हैं। यही कारण है कि यह परत रेडियो तरंगों के प्रसार में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। लंबी दूरी की रेडियो संचार सेवाएं इसी परत की मदद से संचालित होती हैं। इसके अलावा उपग्रहों से भेजे जाने वाले संकेत और जीपीएस तथा भारत की नाविक जैसी नेविगेशन प्रणालियां भी आयनमंडल से प्रभावित होती हैं।

आयनमंडल में मौजूद इलेक्ट्रॉनों की संख्या हर समय बदलती रहती है। दिन और रात, मौसम तथा सौर गतिविधियों के कारण इसमें लगातार परिवर्तन होता है। इन बदलावों का सीधा असर रेडियो तरंगों और उपग्रह संकेतों पर पड़ता है। इसलिए आयनमंडल की सही जानकारी आधुनिक संचार और नेविगेशन प्रणालियों के लिए बेहद जरूरी मानी जाती है।

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पहले के मॉडल पूरी तरह सटीक नहीं थे

अब तक वैज्ञानिक आयनमंडल के ऊपरी हिस्से का अध्ययन करने के लिए ऐसे मॉडल का उपयोग करते थे, जिनमें टॉपसाइड स्केल हाइट को स्थिर मान लिया जाता था। ऐसा इसलिए किया जाता था क्योंकि इस क्षेत्र के बारे में पर्याप्त और भरोसेमंद आंकड़े उपलब्ध नहीं थे। लेकिन वास्तविक स्थिति में यह मान अलग-अलग ऊंचाइयों पर बदलता रहता है। इस कारण पहले के मॉडल कई बार वास्तविक परिस्थितियों को पूरी तरह नहीं दिखा पाते थे।

भारतीय क्षेत्र में यह चुनौती और भी बड़ी थी, क्योंकि यहां भूमध्य चुंबकीय क्षेत्र के कारण आयनमंडल का व्यवहार काफी जटिल होता है। ऐसे में अधिक सटीक मॉडल की आवश्यकता लंबे समय से महसूस की जा रही थी।

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नई तकनीक से मिली बेहतर तस्वीर

इस समस्या को दूर करने के लिए भारतीय भू-चुंबकत्व संस्थान के वैज्ञानिकों ने नई पद्धति विकसित की। उन्होंने जमीन पर लगे आयनोसोंड उपकरणों से प्राप्त आंकड़ों को कॉस्मिक रेडियो ऑक्ल्टेशन मिशन से मिले अंतरिक्ष आधारित आंकड़ों के साथ जोड़ा। इन दोनों स्रोतों की मदद से वैज्ञानिकों ने ऊंचाई के अनुसार बदलने वाले टॉपसाइड स्केल हाइट का अध्ययन किया और उसके आधार पर इलेक्ट्रॉन घनत्व का अधिक सटीक प्रोफाइल तैयार किया।

इस नई तकनीक से आयनमंडल के ऊपरी हिस्से की वास्तविक स्थिति पहले की तुलना में अधिक स्पष्ट रूप से सामने आई है। इससे वैज्ञानिकों को यह समझने में भी मदद मिलेगी कि अलग-अलग ऊंचाइयों पर इलेक्ट्रॉन घनत्व किस प्रकार बदलता है।

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उपग्रह और नेविगेशन सेवाओं को होगा फायदा

यह नई तकनीक उन उपग्रहों के लिए विशेष रूप से उपयोगी होगी, जो पृथ्वी से लगभग एक हजार किलोमीटर तक की ऊंचाई पर कार्य करते हैं। दुनिया के अधिकांश लो अर्थ ऑर्बिट (एलईओ) उपग्रह इसी क्षेत्र में संचालित होते हैं। यदि इस ऊंचाई तक आयनमंडल की सही जानकारी उपलब्ध होगी तो उपग्रहों का संचालन अधिक सुरक्षित और प्रभावी बनाया जा सकेगा।

इसके अलावा जीपीएस और भारत की नाविक प्रणाली की सटीकता भी बढ़ेगी। विमानन, समुद्री परिवहन, रक्षा सेवाओं और आपदा प्रबंधन जैसे क्षेत्रों में भी इसका सीधा लाभ मिलेगा। बेहतर आयनमंडलीय मॉडल के कारण रेडियो संचार में आने वाली बाधाओं को भी कम किया जा सकेगा।

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अंतरिक्ष मौसम की भविष्यवाणी होगी ज्यादा सटीक

वैज्ञानिकों का कहना है कि यह नई तकनीक अंतरिक्ष मौसम के अध्ययन में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगी। सूर्य की गतिविधियों के कारण अंतरिक्ष मौसम में होने वाले बदलाव कई बार उपग्रहों, बिजली प्रणालियों और संचार नेटवर्क को प्रभावित करते हैं।

यदि आयनमंडल की स्थिति का सटीक अनुमान पहले से मिल जाए तो इन प्रभावों से बचाव के लिए समय रहते आवश्यक कदम उठाए जा सकते हैं।

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अन्य देशों में भी अपनाई जा सकेगी तकनीक

यह शोध प्रतिष्ठित एजीयू की पत्रिका रेडियो साइंस में प्रकाशित हुआ है। वैज्ञानिकों का मानना है कि भारत में विकसित यह तकनीक दुनिया के अन्य क्षेत्रों में भी अपनाई जा सकती है। इससे वैश्विक स्तर पर आयनमंडल के अध्ययन और अंतरिक्ष मौसम की निगरानी को नई दिशा मिलेगी।

विशेषज्ञों के अनुसार यह उपलब्धि भारत की वैज्ञानिक क्षमता का एक और महत्वपूर्ण उदाहरण है। आने वाले समय में यह तकनीक देश की संचार, नेविगेशन और अंतरिक्ष सेवाओं को अधिक सुरक्षित, सटीक और विश्वसनीय बनाने में अहम भूमिका निभाएगी।

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