

वैज्ञानिकों ने ऐसी नई तकनीक विकसित की, जो बिना छंटाई के मिश्रित प्लास्टिक कचरे से 90 प्रतिशत से अधिक शुद्ध हाइड्रोजन तैयार करती है।
नई प्रक्रिया पारंपरिक गैसीकरण तकनीक की तुलना में 300 से 400 डिग्री सेल्सियस कम तापमान पर सफलतापूर्वक काम करती है।
प्रक्रिया के दौरान अधिकांश कार्बन कार्बन डाइऑक्साइड बनने के बजाय ठोस कार्बोनेट में बदल जाता है, जिससे प्रदूषण काफी कम होता है।
यह तकनीक प्लास्टिक कचरे के बेहतर उपयोग के साथ स्वच्छ हाइड्रोजन उत्पादन को बढ़ावा देकर ऊर्जा और पर्यावरण दोनों को लाभ पहुंचा सकती है।
फिलहाल तकनीक प्रयोगशाला स्तर पर सफल रही है, लेकिन बड़े पैमाने पर उपयोग से पहले इसकी लागत और क्षमता पर अध्ययन जारी है।
दुनिया भर में प्लास्टिक कचरा एक बड़ी समस्या बन चुका है। पानी की बोतलें, खरीदारी के बैग, खाने के डिब्बे और पुरानी कारों के प्लास्टिक के हिस्से वर्षों तक कचरे के ढेर में पड़े रहते हैं। इनका निपटान आसान नहीं होता। प्लास्टिक का दोबारा इस्तेमाल यानी रीसाइक्लिंग भी मुश्किल है, क्योंकि अलग-अलग तरह के प्लास्टिक को पहले छांटना पड़ता है। यह काम समय लेने वाला और महंगा होता है।
इसी बीच वैज्ञानिकों ने एक नई तकनीक विकसित की है, जो बिना प्लास्टिक को अलग किए उससे स्वच्छ हाइड्रोजन गैस बना सकती है। यह तकनीक भविष्य में स्वच्छ ऊर्जा और प्लास्टिक कचरे की समस्या, दोनों का समाधान देने में मदद कर सकती है। यह शोध प्रोसीडिंग्स ऑफ द नेशनल एकेडमी ऑफ साइंस में प्रकाशित किया गया है।
दुनिया में बहुत कम प्लास्टिक हो रहा है रीसाइकिल
वैज्ञानिकों के अनुसार, दुनिया में बनने वाले प्लास्टिक कचरे का केवल लगभग 9 प्रतिशत ही रीसाइकिल हो पाता है। करीब 79 प्रतिशत प्लास्टिक लैंडफिल यानी कचरा स्थलों में जमा हो जाता है, जबकि लगभग 12 प्रतिशत प्लास्टिक को जला दिया जाता है। प्लास्टिक जलाने से बड़ी मात्रा में कार्बन डाइऑक्साइड निकलती है, जिससे जलवायु परिवर्तन की समस्या और बढ़ती है।
इसलिए ऐसी तकनीक की जरूरत लंबे समय से महसूस की जा रही थी, जो प्लास्टिक कचरे का बेहतर उपयोग कर सके और पर्यावरण को भी नुकसान न पहुंचाए।
बिना छंटाई के बनेगी हाइड्रोजन
अमेरिका के यूसीएलए सैमुएली स्कूल ऑफ इंजीनियरिंग और दक्षिण कोरिया की इवाह वूमन्स यूनिवर्सिटी के वैज्ञानिकों ने मिलकर एक नई रासायनिक प्रक्रिया विकसित की है। इस प्रक्रिया को "अल्कलाइन थर्मल ट्रीटमेंट (एटीटी)" कहा जाता है।
इस तकनीक की सबसे बड़ी खासियत यह है कि इसमें तीन सामान्य प्रकार के प्लास्टिक - पीईटी, पॉलीएथिलीन (पीई) और पॉलीप्रोपाइलीन (पीपी) -को अलग-अलग छांटने की जरूरत नहीं पड़ती। इन्हें एक साथ मशीन में डालकर उच्च शुद्धता वाली हाइड्रोजन गैस तैयार की जा सकती है। वैज्ञानिकों को प्रयोग के दौरान 90 प्रतिशत से अधिक शुद्ध हाइड्रोजन प्राप्त हुई।
कम तापमान में पूरी होती है प्रक्रिया
पारंपरिक गैसीकरण तकनीक में प्लास्टिक को बहुत अधिक तापमान पर गर्म करना पड़ता है। इससे ऊर्जा की खपत भी ज्यादा होती है और कार्बन डाइऑक्साइड भी निकलती है।
नई तकनीक में यह प्रक्रिया लगभग 300 से 400 डिग्री सेल्सियस कम तापमान पर पूरी हो जाती है। इससे ऊर्जा की बचत होती है और पर्यावरण पर भी कम असर पड़ता है। वैज्ञानिकों का कहना है कि यह तकनीक पहले समुद्री शैवाल जैसे जैविक पदार्थों से हाइड्रोजन बनाने के लिए विकसित की गई थी। अब इसे प्लास्टिक कचरे के लिए सफलतापूर्वक अपनाया गया है।
विशेष तैयारी के बाद बढ़ी सफलता
शोध के दौरान वैज्ञानिकों ने पाया कि पीई और पीपी जैसे प्लास्टिक शुरुआत में कम हाइड्रोजन बना रहे थे। इसका कारण उनकी मजबूत रासायनिक संरचना थी।
इस समस्या को दूर करने के लिए वैज्ञानिकों ने इन प्लास्टिक को मुख्य प्रक्रिया से पहले थोड़ी देर हवा में गर्म किया। इससे उनके भीतर ऑक्सीजन वाले रासायनिक समूह बन गए और वे सोडियम हाइड्रॉक्साइड के साथ आसानी से प्रतिक्रिया करने लगे। इसके बाद तीनों प्रकार के प्लास्टिक से अच्छी मात्रा में हाइड्रोजन तैयार होने लगी।
कार्बन डाइऑक्साइड की जगह बना ठोस पदार्थ
इस तकनीक की एक और महत्वपूर्ण विशेषता यह है कि इसमें निकलने वाला अधिकांश कार्बन हवा में कार्बन डाइऑक्साइड के रूप में नहीं जाता। सोडियम हाइड्रॉक्साइड इस कार्बन को पकड़कर सोडियम कार्बोनेट नामक ठोस पदार्थ में बदल देता है।
शोध के अनुसार, प्लास्टिक में मौजूद 75 प्रतिशत से अधिक कार्बन ठोस कार्बोनेट या अन्य स्थिर पदार्थों के रूप में सुरक्षित रहता है। केवल 13 प्रतिशत से भी कम कार्बन गैस के रूप में निकलता है। बाद में सोडियम कार्बोनेट को कैल्शियम कार्बोनेट में बदलकर लंबे समय तक सुरक्षित रखा जा सकता है।
अभी प्रयोगशाला तक सीमित है तकनीक
वैज्ञानिकों का मानना है कि यह तकनीक भविष्य में हाइड्रोजन आधारित ऊर्जा और सर्कुलर इकोनॉमी को बढ़ावा दे सकती है। यदि इसे बड़े स्तर पर सफल बनाया गया, तो प्लास्टिक कचरे की छंटाई का खर्च कम होगा और रीसाइक्लिंग आसान बन सकती है।
हालांकि फिलहाल यह तकनीक केवल प्रयोगशाला में सफल हुई है। अब वैज्ञानिक इसकी क्षमता बढ़ाने, लागत कम करने और बड़े पैमाने पर इसके उपयोग की संभावनाओं का अध्ययन कर रहे हैं। यदि आगे के परीक्षण सफल रहे, तो आने वाले वर्षों में प्लास्टिक कचरे से स्वच्छ हाइड्रोजन बनाने का यह तरीका दुनिया के लिए एक महत्वपूर्ण समाधान बन सकता है।