

भारतीय वैज्ञानिकों ने दुनिया के सबसे खतरनाक फंगल सुपरबग कैंडिडा ऑरिस की एक ऐसी चाल का खुलासा किया है, जो एंटीफंगल दवाओं के खिलाफ लड़ाई को और कठिन बना सकती है।
रिसर्च से पता चला है कि यह जानलेवा फंगस केवल जीन में छोटे बदलाव (म्यूटेशन) ही नहीं करता, बल्कि अपने गुणसूत्रों के हिस्सों की अतिरिक्त प्रतियां बनाकर और नए छोटे गुणसूत्र तैयार करके भी दवाओं के असर को कमजोर कर देता है। यही वजह है कि कई बार इलाज के दौरान दवाएं बेअसर साबित हो जाती हैं और संक्रमण दोबारा उभर सकता है।
शोध में यह भी सामने आया कि अस्पतालों में इस्तेमाल होने वाली सामान्य जांचें कई बार इस छिपी हुई प्रतिरोधक क्षमता को पहचान नहीं पातीं, जिससे उपचार विफल होने का खतरा बढ़ जाता है।
विश्व स्वास्थ्य संगठन पहले ही कैंडिडा ऑरिस को सबसे खतरनाक फंगल रोगजनकों में शामिल कर चुका है। दुनिया में हर साल 30 करोड़ से अधिक लोग फंगल संक्रमण से प्रभावित होते हैं।
नेचर कम्युनिकेशन्स में प्रकाशित यह भारतीय अध्ययन संकेत देता है कि अब केवल जीन नहीं, बल्कि फंगस के गुणसूत्रों की संरचना पर भी नजर रखना जरूरी होगा। शोधकर्ताओं को उम्मीद है कि यह खोज भविष्य में अधिक सटीक जांच, प्रभावी उपचार और अस्पतालों में संक्रमण रोकने की नई रणनीतियों का रास्ता खोल सकती है।
क्या कोई फंगस अपने ही गुणसूत्रों में फेरबदल करके दवाओं को मात दे सकता है? भारतीय वैज्ञानिकों ने इस चौंकाने वाले सवाल का जवाब खोज निकाला है।
उनके द्वारा किए नए अध्ययन से पता चला है कि दुनिया के सबसे खतरनाक 'सुपरबग्स' में शामिल ‘कैंडिडा ऑरिस’ केवल अपने जीन में छोटे-छोटे बदलाव (म्यूटेशन) के भरोसे ही नहीं रहता, बल्कि वो अपने गुणसूत्रों (क्रोमोसोम) के हिस्सों की अतिरिक्त प्रतियां बनाकर और नए गुणसूत्र तैयार करके भी एंटीफंगल दवाओं के खिलाफ अपनी प्रतिरोधक क्षमता बढ़ा लेता है। नतीजन दवाएं इसपर असर नहीं करती।
यह खोज बताती है कि फंगस दवाओं से बचने के लिए कहीं अधिक जटिल और चालाक रणनीति अपनाता है, जिससे इसके इलाज की मौजूदा चुनौतियां और बढ़ सकती हैं।
यह खोज इसलिए बेहद महत्वपूर्ण है क्योंकि विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) ने कैंडिडा ऑरिस को दुनिया के सबसे खतरनाक फंगल रोगजनकों में शामिल किया है। यह फंगस अस्पतालों में तेजी से फैल सकता है और गंभीर रूप से बीमार मरीजों के लिए जानलेवा साबित हो सकता है।
हर साल फंगल संक्रमण की चपेट में आ रहे 30 करोड़ से अधिक लोग
विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) के अनुसार, हर साल 30 करोड़ से अधिक लोग फंगल संक्रमण से प्रभावित होते हैं और इनमें बड़ी संख्या में मरीज गंभीर बीमारी व मौत का शिकार बनते हैं।
सबसे चिंताजनक बात यह है कि इंसानों, मवेशियों और खेती में एंटीफंगल दवाओं के अंधाधुंध इस्तेमाल ने फंगस को इतना मजबूत बना दिया है कि कई दवाएं अब बेअसर होती जा रही हैं। डब्ल्यूएचओ ने चेताया है कि यदि इस प्रवृत्ति पर तुरंत रोक नहीं लगी, तो भविष्य में सामान्य फंगल संक्रमण भी जानलेवा साबित हो सकते हैं।
यह अध्ययन जवाहरलाल नेहरू सेंटर फॉर एडवांस्ड साइंटिफिक रिसर्च (जेएनसीएएसआर), इंडियन इंस्टिट्यूट ऑफ साइंस एजुकेशन एंड रिसर्च (आईआईएसईआर), पोस्टग्रेजुएट इंस्टिट्यूट ऑफ मेडिकल एजुकेशन एंड रिसर्च, चंडीगढ़ और एमिटी यूनिवर्सिटी से जुड़े वैज्ञानिकों द्वारा किया गया है। इस अध्ययन के नतीजे प्रतिष्ठित जर्नल नेचर कम्युनिकेशन्स में प्रकाशित हुए हैं।
भारतीय मरीजों के नमूनों से मिला अहम सुराग
अपने इस अध्ययन में शोधकर्ताओं ने 2014 से 2021 के बीच भारत के अस्पतालों से जुटाए कैंडिडा ऑरिस के 79 नमूनों के पूरे जीनोम का विश्लेषण किया है।
जांच में पता चला कि यह फंगस अपने डीएनए के कुछ हिस्सों की बार-बार अतिरिक्त प्रतियां (सेगमेंटल डुप्लिकेशन) बनाता है। खासकर ईआरजी11 नामक जीन के आसपास ऐसा अधिक देखा गया। यही जीन उन एंटीफंगल दवाओं का मुख्य निशाना होता है जिन्हें 'एजोल' कहा जाता है। रिसर्च में यह भी सामने आया है कि जब जीन में पहले से मौजूद म्यूटेशन और उसकी अतिरिक्त प्रतियां एक साथ होती हैं, तो दवा का असर और भी ज्यादा कम हो जाता है।
वैज्ञानिकों ने एक और चौंकाने वाली बात देखी। फंगस कभी-कभी अपने अंदर अतिरिक्त छोटे गुणसूत्र भी बना लेता है। इनकी वजह से एक अजीब स्थिति पैदा होती है जिसे 'ईगल इफेक्ट' कहा जाता है। सामान्यतः कम मात्रा में दी गई कैस्पोफंगिन दवा से फंगस की वृद्धि रुक जाती है। लेकिन आश्चर्यजनक रूप से, दवा की मात्रा बढ़ाने पर वही फंगस फिर से बढ़ने लगता है।
जांच में भी छिप सकता है यह सुपरबग
शोधकर्ताओं के अनुसार, ऐसा इसलिए होता है क्योंकि फंगस अपनी कोशिका की दीवार और तनाव से जुड़ी जैविक प्रक्रियाओं में बदलाव कर खुद को बचा लेता है। हालांकि, प्रयोगशाला में जब यह अतिरिक्त गुणसूत्र गायब हो गए, तो फंगस फिर से दवा के प्रति संवेदनशील बनने लगा।
अध्ययन में यह भी सामने आया कि अस्पतालों में होने वाली सामान्य दवा-संवेदनशीलता जांच कई बार इस खतरनाक क्षमता को पकड़ नहीं पाती।
यानी जांच रिपोर्ट में फंगस दवा से नियंत्रित होता हुआ दिखाई दे सकता है, लेकिन वास्तव में इसकी कुछ जीवित कोशिकाएं अधिक दवा मिलने पर फिर से सक्रिय होकर बढ़ने लगती हैं। इससे इलाज विफल होने का खतरा बढ़ सकता है।
इलाज की रणनीति बदलने की जरूरत
शोधकर्ताओं का कहना है कि अब केवल जीन में होने वाले छोटे बदलावों को देखना पर्याप्त नहीं होगा। फंगस के गुणसूत्रों की संरचना में होने वाले बदलावों की भी नियमित निगरानी करनी होगी। साथ ही, एंटीफंगल दवाएं विकसित करने के साथ-साथ फंगस की इस चालाकी को मात देने के लिए दो या उससे अधिक दवाओं के सही तालमेल से इलाज की नई रणनीतियां बनानी होंगी।
यह अध्ययन बताता है कि कैंडिडा ऑरिस केवल जीन में म्यूटेशन के सहारे ही नहीं, बल्कि अपने पूरे जीनोम की बनावट बदलकर भी एंटीफंगल दवाओं के खिलाफ मजबूत प्रतिरोध विकसित कर सकता है। यह खोज साफ संकेत देती है कि यह केवल एक खतरनाक फंगस नहीं, बल्कि लगातार खुद को बदलने वाला 'सुपरबग' है।
ऐसे में इससे प्रभावी ढंग से निपटने के लिए जांच और इलाज की मौजूदा रणनीतियों में बदलाव करना होगा। शोधकर्ताओं का मानना है कि यह नई समझ भविष्य में अधिक सटीक जांच तकनीक, बेहतर उपचार और अस्पतालों में इस खतरनाक फंगल संक्रमण को रोकने की प्रभावी रणनीतियां विकसित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है।