दवाओं को मात दे रहा फंगस: हर साल 30 करोड़ लोग बन रहे संक्रमण का शिकार: डब्ल्यूएचओ

इंसानों, मवेशियों और खेती में एंटीफंगल दवाओं के अंधाधुंध इस्तेमाल ने फंगस को और खतरनाक बना दिया है, जिससे वैश्विक स्वास्थ्य पर नया संकट गहरा रहा है।
फोटो: डिएना गेरलाच/ विश्व स्वास्थ्य संगठन
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सारांश
  • कोविड-19 के जख्म अभी पूरी तरह भरे भी नहीं हैं कि दुनिया एक और खामोश लेकिन तेजी से फैलते स्वास्थ्य संकट की चपेट में आती दिख रही है। इस बार खतरा किसी नए वायरस का नहीं, बल्कि ऐसे फंगस का है जो दवाओं को मात देकर हर साल करोड़ों लोगों को संक्रमित कर रहा है।

  • विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) के अनुसार, हर साल 30 करोड़ से अधिक लोग फंगल संक्रमण से प्रभावित होते हैं और इनमें बड़ी संख्या में मरीज गंभीर बीमारी व मौत का शिकार बनते हैं।

  • सबसे चिंताजनक बात यह है कि इंसानों, मवेशियों और खेती में एंटीफंगल दवाओं के अंधाधुंध इस्तेमाल ने फंगस को इतना मजबूत बना दिया है कि कई दवाएं अब बेअसर होती जा रही हैं। डब्ल्यूएचओ ने चेताया है कि यदि इस प्रवृत्ति पर तुरंत रोक नहीं लगी, तो भविष्य में सामान्य फंगल संक्रमण भी जानलेवा साबित हो सकते हैं।

  • इसी खतरे से निपटने के लिए संगठन ने पहली बार एक व्यापक वैश्विक रणनीति जारी की है, जिसमें जागरूकता बढ़ाने, सस्ती और सुलभ जांच व उपचार सुनिश्चित करने, निगरानी तंत्र मजबूत करने तथा मानव, पशु, कृषि और पर्यावरण को साथ लेकर 'वन हेल्थ' दृष्टिकोण अपनाने पर जोर दिया गया है। यह ब्लूप्रिंट दुनिया को एक संभावित वैश्विक स्वास्थ्य संकट से बचाने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है।

एक महामारी का घाव अभी पूरी तरह भरा भी नहीं है और दुनिया एक नए स्वास्थ्य संकट की दहलीज पर पहुंच गई है। कोविड-19 और एंटीबायोटिक प्रतिरोध (एएमआर) के बाद अब फंगल संक्रमण और एंटीफंगल दवाओं के प्रति बढ़ता प्रतिरोध दुनिया भर में स्वास्थ्य के लिए गंभीर चुनौती बनता जा रहा है।

समस्या किस कदर गंभीर है इसका अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि दुनिया में हर साल 30 करोड़ से अधिक लोग फंगल संक्रमण का शिकार बनते हैं।

इनमें से कई मरीज गंभीर रूप से बीमार पड़ते हैं, लंबे समय तक स्वास्थ्य समस्याओं से जूझते रहते हैं और बड़ी संख्या में लोगों को अपनी जान से हाथ तक धोना पड़ता है। इतना ही नहीं इन बीमारियों का असर लोगों की काम करने की क्षमता और वैश्विक अर्थव्यवस्था पर भी पड़ता है।

जब दवाएं ही खोने लगें असर…

सच कहें तो हम और आप जिसे त्वचा की एक मामूली खुजली या आम सा इन्फेक्शन समझकर भूल जाते हैं। दवा की दुकान पर जाते हैं, कोई भी क्रीम या गोली लेते हैं और राहत की उम्मीद में बैठ जाते हैं।

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लेकिन पर्दे के पीछे, इसी लापरवाही के बीच एक ऐसा खामोश और जानलेवा संकट आकार ले रहा है जो हर साल दुनिया के करोड़ों लोगों की जिंदगी को अपनी गिरफ्त में ले रहा है। यह सिर्फ एक बीमारी का आंकड़ा नहीं है, करोड़ों ऐसे हंसते-खेलते परिवार हैं जिनकी खुशियां, जिंदगी भर की कमाई और उम्मीदें इस अनदेखे दुश्मन की वजह से तबाही की कगार पर पहुंच जाती है।

इसी खतरे को देखते हुए विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) ने एक बेहद महत्वपूर्ण वैश्विक रणनीति जारी की है, जिसे इस अदृश्य संकट के खिलाफ इंसानी इतिहास की एक बड़ी 'सुरक्षा ढाल' माना जा रहा है।

क्यों बढ़ रहा खतरा?

सच कहें तो आज सबसे बड़ा डर इस बात का नहीं कि बीमारी फैल रही है, बल्कि डर इस बात का है कि हमारे पास मौजूद हथियार अब इस जंग में नाकाम साबित हो रहे हैं। इसे विज्ञान की भाषा में 'एंटीफंगल रेसिस्टेंस' कहते हैं, जिसका सीधा मतलब यह है कि जिन दवाइयों को फंगस को खत्म करना था, अब फंगस ने उनसे लड़ना सीख लिया है।

यह संकट हमने खुद खड़ा किया है। इंसानों के इलाज में, बेजुबान जानवरों को दी जाने वाली दवाओं में और फसलों को कीड़ों से बचाने के लिए खेतों में छिड़के जाने वाले रसायनों में, हमने इन एंटीफंगल दवाओं का इतना अंधाधुंध इस्तेमाल किया कि आज यह फंगस हमारे लिए अजेय होता जा रहा है। जब दवाएं अपना असर खो देती हैं, तो अस्पताल के बिस्तर पर पड़ा एक मामूली सा मरीज भी मौत के मुंह में समा जाता है।

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डब्ल्यूएचओ ने चेताया है कि यदि एंटीफंगल दवाओं का जिम्मेदारी से उपयोग नहीं किया गया तो आने वाले समय में कई सामान्य संक्रमण भी जानलेवा साबित हो सकते हैं। ऐसे में अगर हमें अपनी आने वाली पीढ़ियों और इस धरती को बचाना है, तो इन जीवनरक्षक दवाओं का इस्तेमाल बेहद जिम्मेदारी से करना होगा।

स्वास्थ्य नीतियों की अनदेखी ने बढ़ाया खतरा

यह बेहद हैरान करने वाली बात है कि इतनी गंभीर चुनौती होने के बावजूद अधिकांश देशों ने फंगल संक्रमण को अपनी स्वास्थ्य नीतियों, एंटीमाइक्रोबियल रेसिस्टेंस (एएमआर) रणनीतियों और वन हेल्थ कार्यक्रमों में इसे पर्याप्त महत्व नहीं दिया है। यह खतरा हमेशा फाइलों के नीचे दबा रहा।

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विश्व स्वास्थ्य संगठन के एंटीमाइक्रोबियल रेसिस्टेंस विभाग के कार्यवाहक निदेशक, डॉक्टर जीन पियरे न्येमाजी ने कहा कि, "अब यह स्पष्ट हो चुका है कि एंटीफंगल प्रतिरोध भी एएमआर संकट का अहम हिस्सा है, जिसे अब और नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।"

उन्होंने उम्मीद जताई कि यह नई रणनीति दुनिया के तमाम देशों को इस अंधेरे से बाहर निकालकर एक सुरक्षित और सुरक्षित रास्ते पर ले जाएगी।

दुनिया को बचाने के लिए डब्ल्यूएचओ की नई रणनीति

बता दें कि इस रणनीति को किसी बंद कमरे में बैठकर तैयार नहीं किया गया है। इसे बुनने के लिए दुनिया भर के 150 से अधिक डॉक्टरों, वैज्ञानिकों और सबसे महत्वपूर्ण, उन मरीजों का दर्द करीब से महसूस करने वाले सामाजिक कार्यकर्ताओं की राय ली गई है।

इसका सबसे बड़ा मकसद दुनिया के उन बेहद गरीब और पिछड़े इलाकों तक मदद पहुंचाना है, जहां के अस्पतालों में न तो इस बीमारी को पहचानने के लिए सही मशीनें हैं और न ही मरीजों को देने के लिए सही दवाइयां।

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इस बीमारी से जीतने के लिए स्वास्थ्य संगठन ने एक साथ चार मोर्चों पर काम करने का फैसला किया है। सबसे पहले, देश के कोने-कोने में बैठे डॉक्टरों और स्वास्थ्य कर्मियों को इस बीमारी की गंभीरता के लिए जागरूक किया जाएगा।

चार मोर्चों पर लड़ी जाएगी फंगस के खिलाफ जंग

साथ ही, इस बात पर पूरा जोर होगा कि गरीब से गरीब इंसान तक फंगल इन्फेक्शन की सही जांच और असरदार दवाइयां मुफ्त या बेहद सस्ती दरों पर पहुंच सकें।

दुनिया भर में ऐसी आधुनिक प्रयोगशालाओं का एक मजबूत जाल बिछाया जाएगा जो किसी भी महामारी के फैलने से पहले ही उसकी आहट को पहचान सकें। और सबसे जरूरी, यह लड़ाई सिर्फ अस्पतालों तक सीमित नहीं रहेगी, इसे खेतों, मिट्टी और पर्यावरण तक ले जाया जाएगा ताकि उस जड़ पर वार किया जा सके जहां से यह फंगस इंसानी शरीर में प्रवेश करता है।

डब्ल्यूएचओ ने इस ब्लूप्रिंट में 12 प्रमुख प्राथमिकताओं की भी पहचान की है, जिनके आधार पर देश अपने संसाधनों और जरूरतों के अनुसार निवेश और हस्तक्षेप तय कर सकते हैं।

डब्ल्यूएचओ के तकनीकी अधिकारी हातिम सती का कहना है, फंगल संक्रमण और एंटीफंगल प्रतिरोध को अब भी अधिकांश राष्ट्रीय स्वास्थ्य योजनाओं और निगरानी प्रणालियों में पर्याप्त महत्व नहीं मिला है। यह नया ब्लूप्रिंट देशों को इस चुनौती से प्रभावी ढंग से निपटने के लिए एक व्यावहारिक और वैज्ञानिक रूपरेखा उपलब्ध कराता है।

बता दें कि यह ब्लूप्रिंट नीति-निर्माताओं, स्वास्थ्य कार्यक्रमों के प्रबंधकों, वैज्ञानिकों, दवा और जांच तकनीक विकसित करने वाले संस्थानों, वित्तीय सहयोग देने वाले संगठनों, स्वास्थ्यकर्मियों और मरीजों के हित में काम करने वाले समूहों के लिए तैयार की गई है। इसका उद्देश्य फंगल संक्रमण और एंटीफंगल प्रतिरोध को वैश्विक स्वास्थ्य एजेंडे में वह प्राथमिकता दिलाना है, जिसकी लंबे समय से कमी महसूस की जा रही थी।

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ऐसे में यह रिपोर्ट महज सरकारों के लिए एक निर्देश नहीं है, बल्कि यह उन डॉक्टरों, वैज्ञानिकों और बेबस मरीजों के हक में लड़ने वाले हर उस इंसान के लिए एक उम्मीद की नई किरण है, जो एक ऐसी दुनिया का ख्वाब देखता है जहां कोई भी इंसान इलाज और दवा के अभाव में दम न तोड़े।

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