इलाज के खर्च से टूटते परिवार: भारत में मियादी बुखार से पड़ रहा सालाना 12,000 करोड़ का आर्थिक बोझ

हर साल हजारों परिवार मियादी बुखार के इलाज पर इतना खर्च कर रहे हैं कि उनके लिए रोजमर्रा की जरूरतें पूरी करना भी मुश्किल हो रहा है
मियादी बुखार गंदे पानी और दूषित भोजन से फैलने वाला बैक्टीरियल संक्रमण है। प्रतीकात्मक तस्वीर: आईस्टॉक
मियादी बुखार गंदे पानी और दूषित भोजन से फैलने वाला बैक्टीरियल संक्रमण है। प्रतीकात्मक तस्वीर: आईस्टॉक
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सारांश
  • मियादी बुखार भारत में अब सिर्फ एक बीमारी नहीं, बल्कि एक ऐसा आर्थिक जाल बनता जा रहा है जिसमें हर साल हजारों परिवार फंसकर गरीब होते जा रहे हैं।

  • अध्ययन में सामने आया है कि मियादी बुखार की वजह से भारत को हर साल करीब 12,300 करोड़ रुपए का आर्थिक नुकसान हो रहा है। सबसे चिंताजनक बात यह है कि इस खर्च का 91 फीसदी बोझ सीधे मरीजों और उनके परिवारों को उठाना पड़ रहा है।

  • अध्ययन के मुताबिक, इलाज पर इतना ज्यादा खर्च हो रहा है कि 70 हजार से ज्यादा परिवार ‘कैटास्ट्रॉफिक हेल्थ कॉस्ट’ की स्थिति में पहुंच गए। इलाज का बढ़ता खर्च, बेअसर होती दवाएं और बच्चों में तेजी से फैलता संक्रमण इस संकट को और गहरा बना रहा है।

  • विशेषज्ञों का मानना है कि अगर समय रहते टीकाकरण, साफ पानी, सही एंटीबायोटिक इस्तेमाल और बेहतर स्वास्थ्य बीमा जैसी नीतियों पर तेजी से काम नहीं हुआ, तो यह बीमारी आने वाले वर्षों में भारत के लिए बड़ा स्वास्थ्य ही नहीं, बल्कि गंभीर आर्थिक संकट भी बन सकती है।

भारत में मियादी बुखार यानी टाइफाइड अब महज एक बीमारी नहीं, बल्कि हजारों परिवारों के लिए आर्थिक तबाही का कारण बनती जा रही है।

लंदन स्कूल ऑफ हाइजीन एंड ट्रॉपिकल मेडिसिन और वेल्लोर स्थित क्रिश्चियन मेडिकल कॉलेज से जुड़े वैज्ञानिकों द्वारा किए नए अध्ययन में सामने आया है कि मियादी बुखार की वजह से भारत को हर साल करीब 12,300 करोड़ रुपए का आर्थिक नुकसान हो रहा है। सबसे चिंताजनक बात यह है कि इस खर्च का 91 फीसदी बोझ सीधे मरीजों और उनके परिवारों को उठाना पड़ रहा है।

जब इलाज बन जाए आर्थिक आपदा

अध्ययन के मुताबिक, इलाज पर इतना ज्यादा खर्च हो रहा है कि 70 हजार से ज्यादा परिवार ‘कैटास्ट्रॉफिक हेल्थ कॉस्ट’ की स्थिति में पहुंच गए। इसका मतलब है कि परिवार अपनी आय का 40 फीसदी से ज्यादा हिस्सा सिर्फ इलाज पर खर्च कर रहे हैं, जिसके कारण उनके लिए खाना, घर और रोजमर्रा की जरूरतें पूरी करना भी मुश्किल हो रहा है।

इस अध्ययन के नतीजे जर्नल द लैंसेट रीजनल हेल्थ: साउथईस्ट एशिया में प्रकाशित हुए हैं।

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मियादी बुखार गंदे पानी और दूषित भोजन से फैलने वाला बैक्टीरियल संक्रमण है। प्रतीकात्मक तस्वीर: आईस्टॉक

गौरतलब है कि मियादी बुखार गंदे पानी और दूषित भोजन से फैलने वाला बैक्टीरियल संक्रमण है। इसके लक्षण आमतौर पर संक्रमण के एक से तीन सप्ताह बाद दिखते हैं।

इन लक्षणों में तेज बुखार, सिरदर्द, पेट दर्द और अत्यधिक थकान आदि शामिल हैं। हालांकि इस बीमारी के लिए इलाज के लिए एंटीबायोटिक मौजूद हैं, लेकिन जिस तरह से दवाएं बेअसर हो रही हैं, उससे खतरा कई गुना बढ़ रहा है।

इन राज्यों में सबसे ज्यादा खतरा

अध्ययन में यह भी सामने आया है कि मियादी बुखार का सबसे ज्यादा आर्थिक बोझ 10 साल से कम उम्र के बच्चों पर पड़ रहा है। साथ ही, देश में इसके आधे से ज्यादा मामले महाराष्ट्र, पश्चिम बंगाल, तमिलनाडु, उत्तर प्रदेश और आंध्र प्रदेश से सामने आ रहे हैं। इनमें भी विशेष रूप से शहरी इलाके कहीं ज्यादा प्रभावित हैं।

विशेषज्ञों का कहना है कि अगर इस आयु वर्ग और ज्यादा प्रभावित राज्यों पर फोकस किया जाए, तो टाइफाइड को नियंत्रित करने के लिए चलाए जाने वाले सरकारी स्वास्थ्य कार्यक्रम ज्यादा प्रभावी साबित हो सकते हैं। इससे कम संसाधनों में ज्यादा लोगों को बचाया जा सकेगा और परिवारों पर पड़ने वाला आर्थिक बोझ भी कम होगा।

एक और बड़ी चिंता एंटीबायोटिक दवाओं के प्रति बढ़ती प्रतिरोधक क्षमता (एंटीमाइक्रोबियल रेसिस्टेन्स) है। अध्ययन में इस बात का भी खुलासा हुआ है कि, टाइफाइड से होने वाले कुल खर्च का 87 फीसदी हिस्सा रोगाणुरोधी प्रतिरोध की वजह से बढ़ रहा है। इसका मतलब है कि दवाएं असर नहीं कर रही, इलाज लंबा चल रहा है और खर्च लगातार बढ़ रहा है।

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मियादी बुखार गंदे पानी और दूषित भोजन से फैलने वाला बैक्टीरियल संक्रमण है। प्रतीकात्मक तस्वीर: आईस्टॉक

जब दवाएं ही होने लगें बेअसर

ऐसे में अध्ययन से जुड़े विशेषज्ञों का कहना है कि अगर समय रहते जरूरी कदम न उठाए गए, तो मियादी बुखार भारत के लिए स्वास्थ्य संकट के साथ-साथ आर्थिक संकट भी बन सकता है। इस स्थिति से निपटने के लिए टाइफाइड वैक्सीन, एंटीबायोटिक दवाओं का सही इस्तेमाल, साफ पानी, स्वच्छ भोजन और बेहतर स्वास्थ्य बीमा जैसी कदम बेहद जरुरी हैं।

क्रिश्चियन मेडिकल कॉलेज, वेल्लोर और अध्ययन से जुड़े शोधकर्ता प्रोफेसर जैकब जॉन का कहना है, “दवा से ठीक न होने वाला टाइफाइड (ड्रग-रेसिस्टेन्स टाइफाइड) अस्पताल में भर्ती 80 फीसदी से ज्यादा मामलों की वजह बन रहा है। इसका मतलब यह सिर्फ स्वास्थ्य संकट नहीं, बल्कि भारतीय परिवारों के लिए बड़ा आर्थिक संकट भी है। अध्ययन से स्पष्ट है कि समस्या बहुत बड़ी है, लेकिन भारत के पास इसे हल करने की क्षमता भी उतनी ही बड़ी है।“

भारत सरकार पहले ही यूनिवर्सल इम्यूनाइजेशन प्रोग्राम में टाइफाइड वैक्सीन शामिल करने की सिफारिश कर चुकी है और आने वाले समय में इसे चरणबद्ध तरीके से लागू करने की योजना है।

विशेषज्ञों का मानना है कि अगर बड़े शहरों से बच्चों के लिए टीकाकरण शुरू किया जाए, तो इससे न सिर्फ हजारों जानें बचेंगी, बल्कि परिवारों पर पड़ने वाला भारी आर्थिक बोझ भी कम होगा।

2023 में सामने आए 49 लाख से अधिक मामले

इससे पहले जनवरी 2026 में प्रकाशित एक अन्य अध्ययन में सामने आया था कि भारत में 2023 के दौरान मियादी बुखार के 49,30,326 मामले सामने आए थे, जबकि 7,850 लोगों को इस बीमारी की वजह से अपनी जान से हाथ धोना पड़ा था। इस दौरान देश में जितने भी मामले सामने आए थे उनका करीब 29 फीसदी बोझ दिल्ली, महाराष्ट्र और कर्नाटक पर पड़ा था।

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अध्ययन में यह भी सामने आया है कि पांच से नौ वर्ष के बच्चों में टाइफाइड और दवा-प्रतिरोधी मामलों की संख्या सबसे अधिक है, जबकि छह महीने से चार साल तक के बच्चों में अस्पताल में भर्ती होने और मृत्यु का जोखिम सबसे अधिक पाया गया।

साफ पानी, टीकाकरण और सही नीति ही इलाज

अध्ययन के मुताबिक पांच साल से कम आयु के करीब 3.21 लाख बच्चों को इस बीमारी के चलते अस्पताल में भर्ती कराना पड़ा।

आंकड़ों पर नजर डालें तो दुनिया में मियादी बुखार के मामलों का बड़ा हिस्सा भारत में पाया जाता है, ऐसे में अगर भारत में टाइफाइड रोकने के कार्यक्रम सफल होते हैं, तो इससे पूरी दुनिया में इस बीमारी को नियंत्रित करने की कोशिशों पर बड़ा असर पड़ेगा।

कुल मिलकर कहें तो यह सिर्फ एक बीमारी की कहानी नहीं है, यह उन हजारों परिवारों की कहानी है जो हर साल इलाज के खर्च में गरीब होते जा रहे हैं। हमे समझना होगा कि मियादी बुखार से जंग सिर्फ अस्पतालों में नहीं, बल्कि साफ पानी, टीकाकरण और सही नीतियों से जीती जाएगी।

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