मध्य प्रदेश: दूषित पेयजल में भोपाल भी पीछे नहीं, 6 साल में भोपाल-इंदौर में 5 लाख से अधिक लोग हुए बीमार

कैग की रिपोर्ट में इंदौर व भोपाल में दूषित पेयजल के मामलों पर गहरी चिंता जताई गई
भोपाल की एक कॉलोनी में नालियों के ऊपर से गुजरती पानी सप्लाई की लाइन। फोटो: राकेश मालवीय
भोपाल की एक कॉलोनी में नालियों के ऊपर से गुजरती पानी सप्लाई की लाइन। फोटो: राकेश मालवीय
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सारांश
  • मध्य प्रदेश के भोपाल और इंदौर में दूषित पेयजल के कारण पिछले छह वर्षों में 5 लाख से अधिक लोग बीमार हुए हैं।

  • भोपाल में गंभीर पैचिस के चार लाख से ज्यादा मामले सामने आए हैं।

  • सीएजी की रिपोर्ट के अनुसार, पानी की गुणवत्ता की जांच के बावजूद प्रशासन ने कोई ठोस कदम नहीं उठाया।

  • बजट होने के बावजूद नगर निगमों ने पर्याप्त खर्च नहीं किया, जिससे स्थिति गंभीर बनी हुई है।

मध्य प्रदेश के इंदौर में दूषित पानी के कारण हुई 15 मौतों के बाद भले ही यह मुद्दा गरम हो, पर आंकड़े बताते हैं कि मध्यप्रदेश के दो सबसे बड़े शहर प्रदू​षित पेयजल के कारण लंबे समय से बीमार हो रहे हैं। इंदौर और भोपाल दोनों को मिलाकर छह साल की अवधि में 5 लाख 45 हजार लोगों की जलजनित बीमारियों से पीड़ित होना पाया गया है। इसमें भी प्रदेश की राजधानी भोपाल की स्थिति ज्यादा खराब है। यहां पर छह साल के अंदर गंभीर पैचिस के चार लाख से ज्यादा मामले सामने आए हैं।  

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भोपाल की एक कॉलोनी में नालियों के ऊपर से गुजरती पानी सप्लाई की लाइन। फोटो: राकेश मालवीय

भारत के नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (सीएजी) की इन दोनों ही शहरों में जल प्रबंधन पर 2019 में एक रिपोर्ट जारी की गई है। यह रिपोर्ट 2013 से 2018 तक के आंकड़े सामने रखती है। इस रिपोर्ट के अनुसार नगर पालिक निगम भोपाल के अंदर गंभीर पैचिस संबंधी मामले प्रतिवेदित किए गए हैं। 2013 से 2018 तक इनकी कुल संख्या 4,39,104 है, जबकि इसी अवधि में इंदौर में पैचिस के 40447 मामले दर्ज किए गए हैं। दूषित पानी का एक परिणाम टाइफाइड के रूप में सामने आता है। भोपाल में इस अवधि मं टाइफाइड के 39481 मामले सामने आए थे जबकि इंदौर में इसी ​अ​वधि में 1462 मरीज प्रतिवेदित किए गए थे। वायरल हैपेटाइटिस के मामले भी भोपाल में 23875 थे जबकि इंदौर में 625 मामले दर्ज किए गए थे।

आंकड़ों और बीमारियों में विरोधाभास

बीमारियों के लिए समय पर पानी की जांच करना और रिपोर्ट पर कदम उठाना बेहद जरूरी है। कैग की रिपोर्ट के अनुसार भोपाल और इंदौर में पानी की जांच के लिए नमूने तो लिए गए, इनका दूषित होना भी पाया गया, लेकिन इन पर कार्रवाई होने की कोई भी बात प्रशासन कैग को कोई अभिलेख उपलब्ध नहीं करवा पाया। रिपोर्ट के अनुसार वर्ष 2013 से 18 तक भोपाल में 299692 तक इंदौर में 74889 पानी के नमूने विभिन्न जल स्त्रोतों से एकत्र कर जांचे गए। भोपाल में 433 जैविक नमूने प्रतिकूल पाए गए, वहीं इंदौर में पानी का स्तर ज्यादा गंभीर पाया गया।

रिपोर्ट के अनुसार इंदौर में 3074 भौतिक, 147 रासायनिक तथा 827 में जीवाण्विक नमूने मानक स्तर 10500 से नीचे पाए गए। आपको बात दें कि पानी के नमूनों की जांच पानी के की जांच के लिए उसके भौतिक विश्लेषण, रासायनिक विश्लेषण, जीवाण्विक विश्लेषण और जैविक विश्लेषण किया जाता है। इंदौर में कम नमूने लिए जाने के बाद भी गुणवत्ताहीन पानी के नमूने ज्यादा पाए गए हैं, वहीं भोपाल में ज्यादा नमूनों के बाद भी स्थिति इंदौर से ज्यादा अच्छी बताई गई, वहीं भोपाल में बीमारियों के ज्यादा मामले पाए गए हैं।

राज्य अनुसंधान प्रयोगशाला की रिपोर्ट को ही संदिग्ध माना

पानी की गुणवत्ता का आकलन करने के लिये लेखापरीक्षा द्वारा नगर पालिक निगमों के अधिकारियों के साथ संयुक्त रूप से पानी के अगस्त एवं सितम्बर 2018 पानी के 54 नमूने लिए गए। भोपाल से 30 नमूने (स्रोत से 03, जलशोधन संयंत्र से 06, उच्च स्तरीय टंकियों से 06 तथा 15 नमूने उपभोक्ताओं से) एवं नगर पालिक निगम, इन्दौर से 24 नमूने (स्रोत से 02, जलशोधन संयंत्र से 04, उच्च स्तरीय टंकियों से 06 तथा 12 नमूने उपभोक्ताओं से) लिए गए। नमूनों की जांच स्वतंत्र रूप से राज्य अनुसंधान प्रयोगशाला (एस.आर.एल.), भोपाल से कराई गई। भोपाल के दो नमूनों में गंदलापन बी.आई. एस. 10500 मानदंडों के प्रतिकूल, तीन में फिक्ल कॉलीफार्म मानक शून्य के विरूद्ध 30 से 60 की संख्या में था। इन्दौर के पांच जल नमूनों में मानदंड के अनुसार नहीं था। पर इस दल की जांच को यह नगर पालिक निगम ने खारिज ही कर दिया। रिपोर्ट में लिखा गया है कि नमूने लिए जाने की प्रक्रिया तथा जांच दोषपूर्ण है।

इंदौर में 1215 करोड़ और भोपाल में 156 करोड़ खर्च नहीं हो पाए

ऐसा नहीं है कि बेहतर व्यवस्था के लिए नगर निगम के पास बजट नहीं था। पांच साल का विश्लेषण बताता है कि दोनों ही शहरों में ​में इन व्यवस्थाओं के लिए जितना बजट प्राप्त हुआ, उतना व्यय नहीं हो पाया है, हर साल बजट बचा ही रह गया। पांच साल में भोपाल नगर निगम को लगभग 1119 करोड़ का बजट आवंटन हुआ, जिसमें से 963 करोड़ रुपए ही खर्च हो पाए। 156 करोड़ रुपए बचे रह गए। संचालनालय एंव नगर पालिक निगम बजट के अनुसार इसी अवधि में इंदौर नगर निगम को 2352 करोड़ रुपए की प्राप्ति बताई गई जिसमें से 1137 करोड़ रुपए ही खर्च हुए। 1215 करोड़ रुपए बचे रह गए।

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