

भारत में मियादी बुखार का प्रकोप गंभीर रूप ले चुका है। 2023 में इसके 49 लाख से अधिक मामले सामने आए थे, जबकि 7,850 लोगों को अपनी जान से हाथ धोना पड़ा था।
इसमें से करीब 29 मामले दिल्ली, महाराष्ट्र और कर्नाटक में दर्ज किए गए थे।
मियादी बुखार गंदे पानी और दूषित भोजन से फैलने वाला बैक्टीरियल संक्रमण है। इसके लक्षण आमतौर पर संक्रमण के एक से तीन सप्ताह बाद दिखते हैं। इन लक्षणों में तेज बुखार, सिरदर्द, पेट दर्द और अत्यधिक थकान आदि शामिल हैं।
अध्ययन में यह भी सामने आया है कि बच्चों में संक्रमण और मृत्यु दर अधिक है, जिससे स्थिति बनी हुई चिंताजनक है। आंकड़ों के मुताबिक पांच साल से कम आयु के करीब 3.21 लाख बच्चों को इस बीमारी के चलते अस्पताल में भर्ती करना पड़ा। मतलब कि अस्पताल में भर्ती होने वाले कुल मरीजों में से 44 फीसदी ऐसे बच्चे थे, जिनकी आयु पांच वर्ष से कम थी।
निष्कर्ष यह भी दर्शाते हैं कि एंटीबायोटिक दवाओं के प्रति बढ़ता प्रतिरोध इसके इलाज को और मुश्किल बना रहा है।
भारत में मियादी बुखार यानी टाइफाइड अब भी स्वास्थ्य के लिए एक गंभीर चुनौती बना हुआ है। एक नए अध्ययन में खुलासा हुआ है कि 2023 में देश भर में मियादी बुखार के 49,30,326 मामले सामने आए थे। वहीं 7,850 जिंदगियां इस बीमारी ने निगल ली थी।
इस दौरान देश में जितने भी मामले सामने आए थे उनका करीब 29 फीसदी बोझ दिल्ली, महाराष्ट्र और कर्नाटक पर पड़ा था। अध्ययन से यह भी पता चला है कि एंटीबायोटिक दवाओं के प्रति बढ़ता प्रतिरोध इसके इलाज को और मुश्किल बना रहा है। यह अध्ययन लंदन स्कूल ऑफ हाइजीन एंड ट्रॉपिकल मेडिसिन और वेल्लोर स्थित क्रिश्चियन मेडिकल कॉलेज समेत कई अन्य संस्थानों से जुड़े वैज्ञानिकों द्वारा किया गया है, जिसके नतीजे जर्नल द लैंसेट रीजनल हेल्थ: साउथईस्ट एशिया में प्रकाशित हुए हैं।
गौरतलब है कि मियादी बुखार गंदे पानी और दूषित भोजन से फैलने वाला बैक्टीरियल संक्रमण है। इसके लक्षण आमतौर पर संक्रमण के एक से तीन सप्ताह बाद दिखते हैं। इन लक्षणों में तेज बुखार, सिरदर्द, पेट दर्द और अत्यधिक थकान आदि शामिल हैं। हालांकि इस बीमारी के लिए इलाज के लिए एंटीबायोटिक मौजूद हैं, लेकिन जिस तरह से दवाएं बेअसर हो रही हैं, उससे खतरा कई गुना बढ़ रहा है।
बच्चे सबसे अधिक प्रभावित
अध्ययन में यह भी सामने आया है कि पांच से नौ वर्ष के बच्चों में टाइफाइड और दवा-प्रतिरोधी मामलों की संख्या सबसे अधिक है, जबकि छह महीने से चार साल तक के बच्चों में अस्पताल में भर्ती होने और मृत्यु का जोखिम सबसे अधिक पाया गया।
अध्ययन के मुताबिक पांच साल से कम आयु के करीब 3.21 लाख बच्चों को इस बीमारी के चलते अस्पताल में भर्ती कराना पड़ा। मतलब कि अस्पताल में भर्ती होने वाले कुल मरीजों में से 44 फीसदी ऐसे बच्चे थे, जिनकी आयु पांच वर्ष से कम थी।
वहीं पांच वर्ष से कम आयु के 2,600 बच्चों की इस बीमारी से मृत्यु हो गई। इसी तरह पांच से नौ साल के करीब 2.65 लाख बच्चों की इस बीमारी की वजह से अस्पताल में भर्ती करना पड़ा था। इस दौरान करीब 2,900 बच्चों की मौत हो गई, जो कुल मौतों का करीब 36 फीसदी है।
दवा बेअसर, खतरा ज्यादा
निष्कर्ष दर्शाते हैं कि 2023 में टाइफाइड की वजह से देशभर में 730,000 मरीजों को अस्पताल में भर्ती करना पड़ा था। चिंता की बात है कि इनमें से करीब 82 फीसदी यानी छह लाख मामले ऐसे थे, जिनमें फ्लोरोक्विनोलोन नामक एंटीबायोटिक दवाएं काम नहीं कर रही थी।
यानी इस बीमारी के इलाज में अब दवाएं भी बेअसर होती जा रही हैं। मतलब कि इन दवाओं के प्रति बढ़ते प्रतिरोध से समस्या कहीं ज्यादा गंभीर रूप ले रही है। वैज्ञानिकों ने पाया है कि दिल्ली, महाराष्ट्र और कर्नाटक में न सिर्फ टाइफाइड के मामले ज्यादा हैं, बल्कि दवा-प्रतिरोधी (फ्लोरोक्विनोलोन-प्रतिरोध) संक्रमण और मौतों की दर भी सबसे अधिक है।
यह अध्ययन सर्विलांस फॉर एंटरिक फीवर इन इंडिया (2017–2020) और ग्लोबल बर्डन ऑफ डिजीज 2021 जैसे बड़े डेटाबेस पर आधारित है। साथ इस अध्ययन में शोधकर्ताओं ने जुलाई 2025 तक प्रकाशित अध्ययनों की समीक्षा की है।
शोधकर्ताओं ने भारत में साल 1977 से 2024 तक साल्मोनेला टाइफी में दवा-प्रतिरोध पर किए गए अपने हालिया व्यापक विश्लेषण के नतीजों को भी शामिल किया। उपलब्ध आंकड़ों से पता चला है कि फ्लोरोक्विनोलोन नामक एंटीबायोटिक के प्रति प्रतिरोध लगातार ऊंचा बना रहा, 1989 से 2024 के बीच यह 60 फीसदी से ज्यादा रहा और 2017 में 94 फीसदी के शिखर पर पहुंच गया था। मतलब फ्लोरोक्विनोलोन के प्रति प्रतिरोध लगातार बढ़ रहा है।
फ्लोरोक्विनोलोन-प्रतिरोध से जुड़ी थी 4,700 मौतें
अध्ययन में यह भी पाया गया कि फ्लोरोक्विनोलोन -प्रतिरोध से जुड़ी मौतों की संख्या करीब 4,700 दर्ज की गई। हालांकि राहत की बात यह है कि तीसरी पीढ़ी की सेफालोस्पोरिन और एजिथ्रोमाइसिन, जो टाइफाइड के इलाज की अहम दवाएं हैं उनके प्रति प्रतिरोध अभी कम है। साथ ही, पिछले तीन दशकों में मल्टीड्रग रेसिस्टेंस में धीरे-धीरे कमी आई है।
वैज्ञानिकों का कहना है कि इससे बचाव के महज नियमित टीकाकरण पर निर्भर रहना काफी नहीं होगा, क्योंकि इससे बड़े उम्र के लोगों तक सुरक्षा पहुंचने में दशकों लग सकते हैं, जबकि इस आयु वर्ग में भी बीमारी का बोझ काफी है।
शोधकर्ताओं ने एंटीमाइक्रोबियल रेसिस्टेंस (एएमआर) पर लगाम लगाने के लिए दवाओं के जिम्मेदार इस्तेमाल, संक्रमण नियंत्रण के सख्त उपाय और दवा उपयोग व प्रतिरोध की बेहतर निगरानी को भी बेहद जरूरी बताया है।
इस अध्ययन का संदेश बेहद स्पष्ट है, अगर अभी ठोस कदम न उठाए गए, तो टाइफाइड और दवा-प्रतिरोध भारत के लिए और बड़ी स्वास्थ्य आपदा बन सकता है।