जापान से भारत तक दुनिया भर में फैल रहा दवा-प्रतिरोधी फंगस 'कैंडिडा ऑरिस’ का खतरा

भारतीय वैज्ञानिकों के नेतृत्व में किए नए अध्ययन से पता चला है कि यह फंगस न सिर्फ तेजी से फैल रहा है, बल्कि समय के साथ और ज्यादा खतरनाक भी होता जा रहा है।
फंगस 'कैंडिडा ऑरिस’; फोटो: आईस्टॉक
फंगस 'कैंडिडा ऑरिस’; फोटो: आईस्टॉक
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सारांश
  • कैंडिडा ऑरिस, एक दवा-प्रतिरोधी फंगस, तेजी से दुनिया भर में फैल रहा है और अस्पतालों के लिए गंभीर खतरा बन गया है।

  • यह फंगस इंसानी त्वचा पर आसानी से पनपता है और एंटीफंगल दवाओं को बेअसर कर देता है। जलवायु परिवर्तन और बढ़ते तापमान इसके फैलने की बड़ी वजह हो सकते हैं।

  • हैरान करने वाली बात यह है कि हर साल करीब 65 लाख लोग गंभीर फंगल संक्रमणों की चपेट में आते हैं। चिंता इससे भी बड़ी है कि एंटीफंगल इलाज और दवाओं के बावजूद इनमें मौत की दर अक्सर 50 फीसदी से ऊपर रहती है।

  • कैंडिडा ऑरिस इन संक्रमणों में सबसे चिंताजनक बनकर उभरा है, क्योंकि यह एंटीफंगल दवाओं को बेअसर कर देता है और अस्पतालों के माहौल में लंबे समय तक टिके रहने में माहिर है।

  • विश्व स्वास्थ्य संगठन की रिपोर्ट के मुताबिक वैश्विक स्तर पर जलवायु में आते बदलावों और बढ़ते तापमान के साथ फंगल डिजीज (फंफूद से होने वाली बीमारियों) का खतरा भी बढ़ रहा है।

यह सुनने में भले ही अजीब लगे, लेकिन एक फंगस, यानी कवक आज दुनिया भर के अस्पतालों के लिए बड़ा सिरदर्द बनता जा रहा है। इसका नाम है 'कैंडिडा ऑरिस'। भारतीय वैज्ञानिकों के नेतृत्व में किए नए अध्ययन से पता चला है कि यह फंगस न सिर्फ तेजी से फैल रहा है, बल्कि समय के साथ और ज्यादा खतरनाक भी होता जा रहा है।

गौरतलब है कि कैंडिडा ऑरिस एक दवा-प्रतिरोधी फंगस है, जिसकी सबसे खतरनाक खासियत यह है कि यह इंसानी त्वचा पर आसानी से पनप जाता है और लंबे समय तक बना रहता है।

यह अध्ययन दिल्ली विश्वविद्यालय के वल्लभभाई पटेल चेस्ट इंस्टीट्यूट, अमेरिका के नेशनल इंस्टीट्यूट्स ऑफ हेल्थ से जुड़े नेशनल इंस्टिट्यूट ऑफ एलर्जी एंड इन्फेक्शस डिजीज और हैकनसैक मेरिडियन सेंटर फॉर डिस्कवरी एंड इनोवेशन के वैज्ञानिकों द्वारा किया गया है। इस अध्ययन के नतीजे प्रतिष्ठित जर्नल माइक्रोबायोलॉजी एंड मॉलिक्यूलर बायोलॉजी रिव्युज में प्रकाशित हुए हैं। वैज्ञानिकों ने चेताया है कि दुनिया अभी फंगल बीमारियों के खतरे को पूरी तरह समझ ही नहीं पाई है।

संक्रमण का शिकार बनते 65 लाख लोग

अध्ययन के मुताबिकआक्रामक फंगल संक्रमण अब दुनिया में तेजी से फैल रहे हैं और पहले से अधिक जानलेवा बनते जा रहे हैं।

हैरान करने वाली बात यह है कि हर साल करीब 65 लाख लोग गंभीर फंगल संक्रमणों की चपेट में आते हैं। चिंता इससे भी बड़ी है कि एंटीफंगल इलाज और दवाओं के बावजूद इनमें मौत की दर अक्सर 50 फीसदी से ऊपर रहती है। कैंडिडा ऑरिस इन संक्रमणों में सबसे चिंताजनक बनकर उभरा है, क्योंकि यह एंटीफंगल दवाओं को बेअसर कर देता है और अस्पतालों के माहौल में लंबे समय तक टिके रहने में माहिर है।

कई वैज्ञानिकों का यह भी मानना है कि जलवायु परिवर्तन भी इसके उभरने और फैलने की एक बड़ी वजह हो सकता है।

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फंगस 'कैंडिडा ऑरिस’; फोटो: आईस्टॉक

विश्व स्वास्थ्य संगठन की रिपोर्ट के मुताबिक वैश्विक स्तर पर जलवायु में आते बदलावों और बढ़ते तापमान के साथ फंगल डिजीज (फंफूद से होने वाली बीमारियों) का खतरा भी बढ़ रहा है। एंटी-फंगल रेसिस्टेन्स यानी फफूंद-रोधी प्रतिरोध से निपटने के लिये विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्लूएचओ) ने 19 खतरनाक फफूंदों की सूची तैयार की है जोकि इंसानी स्वास्थ्य के लिए बड़ा खतरा हैं।

जापान से दुनिया भर में फैला खतरा

कैंडिडा ऑरिस को पहली बार 2009 में जापान में एक मरीज के कान के नमूने में पहचाना गया था। तब इसकी पहचान एक अलग प्रजाति के रूप में की गई थी, लेकिन इसके बाद यह फंगस तेजी से दुनिया के कई हिस्सों में फैल गया। भारत में इसे 2014 में एक बड़े सार्वजनिक स्वास्थ्य खतरे के रूप में पहचाना गया।

इसमें दिल्ली विश्वविद्यालय के वल्लभभाई पटेल चेस्ट इंस्टीट्यूट की प्रोफेसर और अध्ययन से जुड़े शोधकर्ताओं अनुराधा चौधरी ने प्रमुख भूमिका निभाई थी। डॉक्टर चौधरी को फंगल खतरों की पहचान और उनसे निपटने में विशेषज्ञ माना जाता है।

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कैंडिडा ऑरिस की सबसे बड़ी ताकत उसकी अनोखी कोशिका-दीवार है, जो दूसरे फंगस की तुलना में अलग और खास होती है। शर्करा से भरपूर इसकी यह संरचना उसे दवाओं से बचने और इंसानी शरीर के साथ आसानी से चिपकने में मदद करती है।

क्यों इतना खतरनाक है यह फंगस?

हैरानी की बात है कि कैंडिडा ऑरिस ने जीवित रहने के लिए कई चालाक जैविक तरीके विकसित कर लिए हैं। यह फंगस अपनी बनावट में बदलाव कर सकता है। यह जरूरत पड़ने पर खमीर जैसी अवस्था से धागेनुमा रूप में बदलकर फैल सकता है, कई कोशिकाओं के झुंड बना सकता है, और अपने आसपास के माहौल के हिसाब से अपने जीन की अभिव्यक्ति भी बदल लेता है।

स्टडी से पता चला है कि यह फंगस इंसानी त्वचा पर आसानी से बस जाता है। अब तक मिले आणविक प्रमाण बताते हैं कि इसकी कोशिका-दीवार के प्रोटीन गोंद की तरह इंसानी कोशिकाओं से चिपक जाते हैं, और यही नहीं, यह निर्जीव सतहों पर भी मजबूती से टिक सकता है।

दवाएं हैं, लेकिन काफी नहीं

नतीजे दर्शाते हैं कि यह प्लास्टिक, धातु और अस्पताल की सतहों तक से चिपक जाता है। इतना ही नहीं, जब शरीर की प्रतिरक्षा प्रणाली इससे लड़ने की कोशिश करती है, तो यह फंगस चालाकी से इम्यून सिस्टम को चकमा देने के तरीके भी विकसित कर लेता है। फिर भी, शोधकर्ताओं का कहना है कि नई वैक्सीन और इलाज की बेहतर रणनीतियां विकसित की जा सकती हैं।

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फिलहाल फंगल संक्रमण से निपटने के लिए एंटीफंगल दवाओं के चार वर्ग उपलब्ध हैं, जिन्हें बीसवीं सदी के दूसरे हिस्से में विकसित किया गया था। हालांकि, इन दवाओं का असर अलग-अलग स्तर का है। राहत की बात यह है कि तीन नई दवाएं परीक्षण के दौर में हैं या हाल ही में मंजूर हुई हैं।

पहचान ही सबसे बड़ी चुनौती

इस फंगस की पहचान करना भी आसान नहीं है। अधिकांश पारंपरिक लैब टेस्ट इसे किसी और सामान्य यीस्ट समझ लेते हैं, जिससे इलाज में देर हो जाती है और मरीज की हालत बिगड़ सकती है। हालांकि वैज्ञानिकों का कहना है कि अब इस खतरे को लेकर जागरूकता बढ़ रही है। नई रिसर्च, बेहतर जांच तकनीक, वैक्सीन और इम्यून-आधारित इलाज की दिशा में काम तेज हुआ है।

शोधकर्ताओं के शब्दों में, “हमें ऐसी नई प्रभावी एंटीफंगल दवाओं की जरूरत है, जो व्यापक स्तर पर काम करें, बेहतर डायग्नोस्टिक टेस्ट हों, और उच्च जोखिम वाले मरीजों के लिए वैक्सीन व इम्यून-आधारित उपचार विकसित किए जाएं।“

इसके साथ ही, भविष्य में प्रयासों का फोकस फंगल संक्रमणों के बारे में जागरूकता बढ़ाने और बेहतर निगरानी तंत्र विकसित करने पर होना चाहिए। खासकर जिन देशों में संसाधन पर्याप्त नहीं हैं वहां निगरानी और रिपोर्टिंग को मजबूत करना बेहद जरूरी है। शोधकर्ताओं को उम्मीद है कि ये कदम फंगल संक्रमण से प्रभावित मरीजों के इलाज और स्वास्थ्य परिणामों में सुधार करने में मदद करेंगे।

कैंडिडा ऑरिस भले ही दिखता नहीं, लेकिन स्पष्ट है कि इसका खतरा वास्तविक और गंभीर है। अब सवाल यह नहीं कि यह फंगस कितना खतरनाक है, सवाल यह है कि दुनिया इससे लड़ने के लिए कितनी तेजी से तैयार होती है।

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