राजौरी में गहराया कचरा संकट: जुर्माना बेअसर, रिपोर्ट में खुली प्रशासन की पोल

रिपोर्ट के मुताबिक राजौरी नगर परिषद पर 5.45 करोड़ रुपए का पर्यावरणीय मुआवजा लगाया गया था, लेकिन जमीनी स्तर पर स्थिति जस की तस बनी हुई है
प्लास्टिक कचरे के पहाड़ पर खाना ढूंढती गाएं; प्रतीकात्मक तस्वीर: आईस्टॉक
प्लास्टिक कचरे के पहाड़ पर खाना ढूंढती गाएं; प्रतीकात्मक तस्वीर: आईस्टॉक
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सारांश
  • देश के अलग-अलग हिस्सों में पर्यावरणीय लापरवाही की चिंताजनक तस्वीर सामने आई है।

  • जम्मू और कश्मीर प्रदूषण नियंत्रण समिति की रिपोर्ट ने राजौरी में कचरा प्रबंधन की गंभीर विफलता उजागर की है, जहां 5.45 करोड़ रुपये का पर्यावरणीय जुर्माना लगाने के बावजूद हालात में कोई सुधार नहीं हुआ और कचरा खुले में जलाने व नदियों में डालने जैसी खतरनाक प्रवृत्तियां जारी हैं।

  • वहीं दूसरी ओर नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल ने हापुड़ के खिचरा औद्योगिक क्षेत्र में प्रदूषण और जलभराव के मुद्दे पर कड़ा रुख अपनाते हुए संबंधित एजेंसियों से जवाब तलब किया है, जहां बिना ट्रीटमेंट के औद्योगिक अपशिष्ट के गंगा तक पहुंचने के आरोप सामने आए हैं।

  • दोनों मामलों से साफ संकेत मिलता है कि प्रशासनिक लापरवाही, कमजोर निगरानी और जवाबदेही की कमी पर्यावरण और जनस्वास्थ्य के लिए गंभीर खतरा बनती जा रही है, और अब अदालतों की सख्ती के बावजूद जमीनी स्तर पर ठोस कार्रवाई की सख्त जरूरत है।

जम्मू-कश्मीर में कचरा प्रबंधन को लेकर लापरवाही पर एक बार फिर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं। जम्मू कश्मीर प्रदूषण नियंत्रण समिति ने 22 अप्रैल 2026 को सबमिट रिपोर्ट में कहा है कि भारी जुर्माना लगाने के बावजूद राजौरी नगर परिषद ने कचरा प्रबंधन को बेहतर बनाने के लिए ठोस कदम नहीं उठाए हैं।

रिपोर्ट में बताया गया है कि 2 फरवरी 2026 को नगर परिषद पर 5.45 करोड़ रुपए का पर्यावरणीय मुआवजा लगाया गया था, लेकिन जमीनी स्तर पर स्थिति जस की तस बनी हुई है। अब 21 अप्रैल 2026 को जिला प्रशासन से इस राशि की वसूली सुनिश्चित करने को कहा गया है, ताकि जवाबदेही तय हो सके।

निरीक्षण के दौरान शहर के कई हिस्सों में कचरे के अंधाधुंध ढेर और खुले में जलाने की घटनाएं सामने आईं। बेला बस स्टैंड, सलानी ब्रिज से तारिक ब्रिज तक और जवाहर नगर जैसे इलाकों में हालात बेहद खराब पाए गए।

जुर्माने के बाद भी नहीं बदली तस्वीर

इसके साथ ही नई बस्तियों जैसे कहोएरा और बेला कॉलोनी में तो कचरा सीधे मनवर तवी और पावर हाउस वॉटर कैनाल में डाला जा रहा है, जो आगे चलकर अब्दुल्ला पुल के पास मनावर तवी नदी में मिल जाता है।

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सबसे चिंताजनक बात यह रही कि बेला बस स्टैंड पर सामान्य कचरे के साथ बायोमेडिकल वेस्ट भी मिला, जो स्वास्थ्य के लिए बड़ा खतरा है। इसके अलावा पीरकांजू, तलवाल, पठानमोड़ा, फलयाना, मनहास मोहल्ला (जवाहर नगर), थुड़ी, खंडली ब्रिज सहित मनावर तवी व सख्तोह नदियों के किनारे बसे रिहायशी इलाकों में भी कचरा डंपिंग की गंभीर स्थिति देखी गई।

रिपोर्ट साफ संकेत देती है कि यदि जल्द से जल्द इस मामले में ठोस कार्रवाई नहीं हुई, तो यह लापरवाही पर्यावरण और स्वास्थ्य पर भारी पड़ सकती है।

हापुड़: नालों से गंगा तक पहुंच रहा 'जहर', एनजीटी ने यूपीएसआईडीए से मांगा जवाब

हापुड़ जिले के खिचरा औद्योगिक क्षेत्र में जलभराव और प्रदूषण की गंभीर समस्या पर नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (एनजीटी) ने कड़ा रुख अपनाया है।

23 अप्रैल 2026 को हुई सुनवाई के दौरान उत्तर प्रदेश राज्य औद्योगिक विकास प्राधिकरण (यूपीएसआईडीए) ने मौजूदा नालों को बदलकर नए स्टॉर्म वॉटर ड्रेनेज नेटवर्क के निर्माण पर कार्रवाई रिपोर्ट दाखिल करने के लिए एनजीटी से अतिरिक्त समय मांगा है। अब इस मामले में अगली सुनवाई 6 अगस्त 2026 को होगी।

इस मामले में उत्तर प्रदेश प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (यूपीपीसीबी) ने इलाके की जांच करने के बाद  22 अप्रैल 2026 को अपनी रिपोर्ट एनजीटी में प्रस्तुत की थी। यह रिपोर्ट नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (एनजीटी) के 28 जनवरी 2026 को दिए आदेश पर तैयार की गई है।

रिपोर्ट में क्या कुछ आया था सामने

इस रिपोर्ट में खामियों की गंभीर तस्वीर सामने आई थी। रिपोर्ट के अनुसार, खिचरा औद्योगिक क्षेत्र में मौजूदा ड्रेनेज व्यवस्था नाकाफी है। इसकी वजह से पानी की निकासी बाधित होती है और जलभराव की स्थिति बनती है।

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बोर्ड ने स्पष्ट सिफारिश की है कि पूरे स्टॉर्म वॉटर ड्रेन नेटवर्क को हटाकर आधुनिक स्टॉर्म वॉटर ड्रेनेज सिस्टम स्थापित किया जाए, ताकि पानी का प्रवाह सुचारू रहे और क्षेत्र में जलभराव की समस्या खत्म हो सके।

गौरतलब है कि इस मामले में ‘हेल्प एशिया फाउंडेशन’ ने अपनी याचिका में आरोप लगाया है कि खिचरा औद्योगिक क्षेत्र की कई इकाइयां बिना ट्रीटमेंट के जहरीले अपशिष्ट खुले नालों, ग्रीन बेल्ट और खाली जमीनों में छोड़ रही हैं। ये दूषित पानी अंततः नालों के जरिए गंगा नदी में पहुंच रहा है और पर्यावरण के लिए गंभीर खतरा पैदा कर रहा है।

आवेदक का यह भी आरोप है कि इन उद्योगों में या तो एफ्लुएंट ट्रीटमेंट प्लांट (ईटीपी) मौजूद ही नहीं, और जहां हैं भी वहां भी ठीक से काम नहीं कर रहे। इसकी वजह से बिना ट्रीट किया हानिकारक अपशिष्ट खुले में बहाया जा रहा है।

अब सबकी निगाहें यूपीसीडा की अगली कार्रवाई रिपोर्ट पर टिकी हैं, जिससे यह तय होगा कि इस औद्योगिक क्षेत्र में जलनिकासी और प्रदूषण की समस्या पर कितनी प्रभावी रोक लग पाती है।

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