

नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (एनजीटी) के सामने आए दो अलग-अलग मामलों ने शहरी प्रदूषण प्रबंधन और प्रशासनिक लापरवाही की गंभीर हकीकत उजागर कर दी है।
एक तरफ लुधियाना में 15 साल से नियमों को ताक पर रखकर बिना ट्रीटमेंट सीवेज बहाया जा रहा है और जिम्मेदार डेवलपर अब तक मुआवजा तक नहीं चुका पाया, तो दूसरी ओर गाजियाबाद में नालों की सफाई से निकली गाद को लेकर एजेंसियां जिम्मेदारी एक-दूसरे पर डालती नजर आ रही हैं।
गाजियाबाद नगर निगम ने अपने दायरे से बाहर का हवाला देकर अधिकांश इलाकों की जिम्मेदारी औद्योगिक विकास प्राधिकरण पर डाल दी है।
इन दोनों मामलों ने साफ कर दिया है कि पर्यावरणीय नियम कागजों में सख्त जरूर हैं, लेकिन जमीन पर उनका पालन अभी भी लापरवाही, टालमटोल और जवाबदेही की कमी का शिकार है, जिसका खामियाजा आम लोगों को प्रदूषण और स्वास्थ्य जोखिम के रूप में भुगतना पड़ रहा है।
लुधियाना की एक रिहायशी कॉलोनी में सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट (एसटीपी) से जुड़ी लापरवाही का मामला नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (एनजीटी) के सामने आया है। 20 अप्रैल 2026 को हुई सुनवाई में पंजाब प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (पीपीसीबी) के वकील ने एनजीटी को बताया कि 2011 से यह एसटीपी नियमों के मुताबिक नहीं चल रहा इसके बावजूद डेवलपर ने पर्यावरणीय मुआवजे के रूप में अब तक एक भी रुपया जमा नहीं किया है।
इस पर ट्रिब्यूनल ने प्रोजेक्ट प्रोपोनेंट ‘डायनामिक इंफ्रा डेवलपर’ को पर्यावरणीय मुआवजा लगाए जाने के मुद्दे पर अपना पक्ष रखने का एक और मौका दिया। इस मामले में अगली सुनवाई 4 अगस्त 2026 को होगी।
यह मामला गार्डन सिटी रेजिडेंशियल वेलफेयर सोसायटी, देहलों रोड, धरौर, साहनेवाल (लुधियाना) की ओर से दायर किया गया है। शिकायत में आरोप लगाया गया है कि कॉलोनी विकसित करने वाले डेवलपर 'डायनामिक इंफ्रा डेवलपर' ने एसटीपी को चालू ही नहीं किया। इसके बजाय सेप्टिक टैंक बनाकर बिना ट्रीट किया सीवेज और दूसरा गन्दा पानी अवैध रूप से बहाया जा रहा है। यह भी आरोप है कि सेप्टिक टैंक के ओवरफ्लो होने से इलाके में गंभीर स्वास्थ्य समस्याएं पैदा हो रही हैं।
पंजाब प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड ने 23 फरवरी 2026 की अपनी रिपोर्ट में साफ कहा था कि ट्रीटमेंट प्लांट निर्धारित मानकों पर खरा नहीं उतर रहा है और इस पर पर्यावरणीय मुआवजा भी लगाया जा चुका है। इसके बावजूद, अब तक भुगतान न होना पूरे मामले में लापरवाही और नियमों की अनदेखी को उजागर करता है।
कुल मिलाकर यह मामला न केवल पर्यावरणीय नियमों के उल्लंघन की कहानी बयां करता है, बल्कि यह भी दिखाता है कि जिम्मेदार एजेंसियों के निर्देशों के बावजूद जमीनी स्तर पर कार्रवाई कितनी धीमी और अधूरी है। अब नजरें अगली सुनवाई पर टिकी हैं, जहां यह तय होगा कि प्रदूषण फैलाने की कीमत आखिर कौन और कब चुकाएगा।
गाद पर सियासत: नगर निगम ने झाड़ा पल्ला, उत्तर प्रदेश स्टेट इंडस्ट्रियल डेवलपमेंट अथॉरिटी पर डाली जिम्मेदारी
नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (एनजीटी) में 21 अप्रैल 2026 को दाखिल रिपोर्ट में गाजियाबाद नगर निगम ने कहा कि उसके अधिकार क्षेत्र में नालों की सफाई यानी गाद निकालने (डिसिल्टिंग) के दौरान निकाले गए कीचड़ (स्लज) का उठान और निपटान तय नियमों के अनुसार किया जाता है।
गौरतलब है कि यह मामला टाइम्स ऑफ इंडिया में 13 जुलाई, 2025 को छपी एक खबर के आधार पर उठाया गया है।
खबर में आरोप लगाया गया है कि गाजियाबाद के कुछ हिस्सों में नालों की सफाई के दौरान निकाले गए कीचड़ के जमा होने और उसके गलत तरीके से डिस्पोज करने की वजह से गंदगी फैल गई। इससे लोगों की आवाजाही में रुकावट आई और खासकर मानसून के मौसम में पर्यावरण को लेकर चिंताएं बढ़ गईं।
रिपोर्ट के मुताबिक गाजियाबाद नगर निगम ने खबर में बताई गई जगहों के बारे में डिटेल्ड फील्ड वेरिफिकेशन और इंटरडिपार्टमेंटल असेसमेंट किया। इस संयुक्त निरीक्षण के बाद, पता चला कि खबर और कोर्ट की कार्रवाई में बताई गई जगहों में से, महज एक जगह (काला पत्थर रोड, इंदिरापुरम, गाजियाबाद) ही गाजियाबाद नगर निगम के अधिकार क्षेत्र में आती है, जबकि बाकी जगहें उत्तर प्रदेश स्टेट इंडस्ट्रियल डेवलपमेंट अथॉरिटी के अधिकार क्षेत्र में हैं।
नगर निगम ने स्पष्ट किया कि काला पत्थर रोड पर समय पर डिसिल्टिंग की गई और निकला हुआ स्लज तुरंत हटाकर निर्धारित प्रक्रिया के तहत उसका निपटान कर दिया गया। वहां अब किसी तरह का अवशेष नहीं है।
हर साल मानसून से पहले सफाई का दावा
रिपोर्ट के मुताबिक, नगर निगम हर साल मानसून से पहले और दौरान नालों की नियमित सफाई करता है और यह सुनिश्चित करता है कि निकाला गया गाद सड़कों या सार्वजनिक स्थानों पर लंबे समय तक न पड़ा रहे।
वहीं, जिन समस्याओं का जिक्र खबर में किया गया, वे मुख्यतः औद्योगिक इलाकों से जुड़ी हैं, जिनकी देखरेख की जिम्मेदारी उत्तर प्रदेश स्टेट इंडस्ट्रियल डेवलपमेंट अथॉरिटी की है। नगर निगम ने इस संबंध में उत्तर प्रदेश स्टेट इंडस्ट्रियल डेवलपमेंट अथॉरिटी और अन्य संबंधित एजेंसियों को कई बार पत्र लिखकर तत्काल कार्रवाई की मांग की है।
नगर निगम ने स्पष्ट क्या कि उन्होंने सम्बंधित अधिकारियों को अवगत कराया है कि नालों के किनारे भारी मात्रा में कीचड़ और गाद जमा है। साथ ही औद्योगिक अपशिष्ट के कारण प्रदूषण और जाम की समस्या लगातार बढ़ रही है। ऐसे में, खबर में बताई दिक्कतों को दोबारा होने से रोकने के लिए इस कीचड़ को समय पर वैज्ञानिक तरीके से हटाना बेहद जरूरी है।