गाजियाबाद के खोड़ा में सीवेज प्लांट पर सुप्रीम कोर्ट का कड़ा रुख, अतिक्रमण हटाने का दिया आदेश

सुप्रीम कोर्ट ने 66 एमएलडी क्षमता वाले सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट की जमीन से अतिक्रमण हटाकर तय समय-सीमा में निर्माण पूरा करने का निर्देश दिया है।
प्रतीकात्मक तस्वीर
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सारांश
  • सुप्रीम कोर्ट और नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल ने दो अहम मामलों में कड़ा रुख अपनाते हुए साफ कर दिया है कि पर्यावरण और जनस्वास्थ्य से जुड़ी परियोजनाओं में टालमटोल बर्दाश्त नहीं की जाएगी।

  • सुप्रीम कोर्ट ने गाजियाबाद के खोड़ा में प्रस्तावित 66 एमएलडी क्षमता वाले सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट की जमीन से अतिक्रमण तुरंत हटाने और तय समय-सीमा में निर्माण पूरा करने का आदेश दिया है।

  • अदालत ने राज्य सरकार से स्पष्ट टाइमलाइन मांगी और चेताया कि गंदे पानी के उपचार जैसी बुनियादी जरूरतों में देरी स्वीकार नहीं होगी।

  • वहीं एनजीटी ने दिल्ली सरकार को यमुना बाढ़ क्षेत्र के सीमांकन में हो रही देरी पर फटकार लगाते हुए दो सप्ताह के भीतर नई और व्यावहारिक समय-सीमा के साथ रिपोर्ट दाखिल करने को कहा है। अधिकरण ने स्पष्ट किया कि बाढ़ क्षेत्र का चिन्हांकन कागजों तक सीमित न रहे, बल्कि जमीन पर समयबद्ध तरीके से पूरा हो।

देश की सर्वोच्च अदालत सुप्रीम कोर्ट ऑफ इंडिया ने 24 फरवरी 2026 को उत्तर प्रदेश सरकार को सख्त निर्देश दिए

अदालत ने अपने आदेश में कहा कि गाजियाबाद के खोड़ा में प्रस्तावित सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट (एसटीपी) के लिए तय जमीन को सभी अतिक्रमणों से तुरंत मुक्त कराया जाए और इस पर किसी तरह का अतिक्रमण नहीं होना चाहिए, ताकि संयंत्र का निर्माण जल्द से जल्द शुरू हो सके।

यह मामला गाजियाबाद जिले की खोड़ा नगर पालिका में 66 एमएलडी (मिलियन लीटर प्रतिदिन) क्षमता वाले सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट की स्थापना से जुड़ा है। यह प्लांट इलाके के गंदे पानी के उपचार के लिए बेहद अहम माना जा रहा है, क्योंकि यहां सीवर और प्रदूषण की समस्या लंबे समय से बनी हुई है।

जमीन सौंपी गई, लेकिन विवाद बना रोड़ा

उत्तर प्रदेश सरकार की ओर से अदालत में दी गई रिपोर्ट के अनुसार, राज्य सरकार ने संबंधित डिपार्टमेंट से एक रिपोर्ट मांगी थी।

इस रिपोर्ट के मुताबिक 13 फरवरी 2026 को खोड़ा नगर पालिका परिषद के अधिशासी अधिकारी ने नोएडा प्राधिकरण से खरीदी गई 16,000 वर्ग मीटर जमीन एसटीपी निर्माण के लिए उत्तर प्रदेश जल निगम (अर्बन) को सौंप दी है।

हालांकि, जमीन की सीमांकन प्रक्रिया के दौरान स्थानीय निवासियों ने एक हिस्से से सड़क की मांग उठाते हुए आपत्ति दर्ज की। इस कारण विवाद खड़ा हो गया।

जिला प्रशासन ने अदालत को बताया कि विवाद को सुलझाने की प्रक्रिया जारी है। विवाद खत्म होते ही निर्माण कार्य तुरंत शुरू कर दिया जाएगा और 24 महीनों में प्लांट तैयार कर लिया जाएगा।

सुप्रीम कोर्ट की नाराजगी

अदालत ने अपने 3 दिसंबर 2025 को दिए पिछले आदेश का हवाला देते हुए कहा कि उत्तर प्रदेश सरकार को समय-सीमा स्पष्ट करते हुए हलफनामा दाखिल करने को कहा गया था। लेकिन जो हलफनामा पेश किया गया, उसमें इस बात का जिक्र नहीं है कि एसटीपी कब तक स्थापित होगा।

साथ ही अदालत ने यह भी सवाल उठाया कि जिस जमीन को एसटीपी के लिए चिन्हित कर जल निगम को सौंप दिया गया है, उस पर सड़क का दावा आखिर किस आधार पर किया जा रहा है।

समयबद्ध कार्रवाई का निर्देश

सुप्रीम कोर्ट ने राज्य सरकार को निर्देश दिया है कि वह नया हलफनामा दाखिल कर स्पष्ट समय-सीमा बताए और यह सुनिश्चित करे कि जमीन पूरी तरह विवाद और अतिक्रमण से मुक्त हो।

अदालत ने साफ कर दिया है कि सार्वजनिक स्वास्थ्य और पर्यावरण से जुड़े इस अहम प्रोजेक्ट में किसी तरह की देरी बर्दाश्त नहीं की जाएगी।

यमुना बाढ़ क्षेत्र की सीमांकन प्रक्रिया में तेजी लाने का आदेश, एनजीटी ने दो सप्ताह में मांगी नई रिपोर्ट

27 फरवरी 2026 को नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (एनजीटी) ने दिल्ली सरकार को बड़ा निर्देश देते हुए कहा कि यमुना के बाढ़ क्षेत्र के सीमांकन की प्रक्रिया की दोबारा समीक्षा की जाए और जमीनी स्तर पर चिन्हांकन का काम तेज किया जाए।

अधिकरण ने स्पष्ट किया कि राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र दिल्ली सरकार (जीएनसीटीडी) दो सप्ताह के भीतर नई रिपोर्ट दाखिल करे, जिसमें इस काम को पूरा करने के लिए पहले से कम और व्यावहारिक समय-सीमा बताई जाए।

क्या है पूरा मामला?

एनजीटी के सामने दायर याचिकाओं में वजीराबाद से पल्ला तक यमुना नदी के 22 किलोमीटर लंबे हिस्से के बाढ़ क्षेत्र की सीमाएं तय करने का मुद्दा उठाया गया था। बाढ़ क्षेत्र का सही सीमांकन न केवल पर्यावरण की सुरक्षा के लिए जरूरी है, बल्कि बाढ़ के खतरे को कम करने और अवैध निर्माण रोकने के लिए भी अहम है।

दिल्ली क्षेत्र के बाढ़ मैदान पर प्रभाव का वैज्ञानिक आकलन करने के लिए यह अध्ययन सेंट्रल वाटर एंड पावर रिसर्च स्टेशन (सीडब्ल्यूपीआरएस) को सौंपा गया है। यह संस्था बाढ़ क्षेत्र की वास्तविक स्थिति और संभावित जोखिमों का वैज्ञानिक विश्लेषण करेगी।

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दूसरे राज्यों में तेजी, दिल्ली में देरी क्यों?

एनजीटी ने यह भी नोट किया कि अन्य राज्यों में सर्वे ऑफ इंडिया से जानकारी मिलने के बाद जमीनी सत्यापन, खंभे लगाने और बाढ़ क्षेत्र के चिन्हांकन का काम बिना देरी के पूरा कर लिया गया। ऐसे में दिल्ली में हो रही देरी पर अधिकरण ने सवाल उठाया है।

अधिकरण का संदेश साफ है, यमुना के बाढ़ क्षेत्र का सीमांकन केवल कागजों तक सीमित न रहे, बल्कि जमीन पर स्पष्ट और समयबद्ध तरीके से पूरा किया जाए।

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