

प्लास्टिक के नुकसान से लोग अनजान नहीं हैं, लेकिन इसकी जानकारी हमेशा सही व्यवहार में नहीं बदलती।
नागालैंड विश्वविद्यालय के एक नए अध्ययन के मुताबिक, प्लास्टिक कचरे से निपटने में आसपास के लोगों की आदतों, सामाजिक अपेक्षाओं और सामुदायिक सोच की अहम भूमिका है।
कोहिमा, दीमापुर और चुमौकेदिमा में किए गए अध्ययन में सामने आया कि लोग प्लास्टिक के पर्यावरणीय नुकसान को लेकर काफी जागरूक हैं, लेकिन कचरे को सही तरीके से अलग करने और उसका निपटान करने की सुविधाओं को लेकर स्थिति कमजोर है। सर्वेक्षण में पर्यावरणीय नुकसान की समझ का औसत अंक पांच में से 4.77 रहा, जबकि कचरा प्रबंधन की सुविधाओं और उसे अलग करने के आत्मविश्वास से जुड़े पहलुओं पर औसत अंक 2.7 से 3.2 के बीच रहे।
शोधकर्ताओं के मुताबिक, केवल जागरूकता अभियान चलाने से प्लास्टिक प्रदूषण पर लगाम नहीं लगाई जा सकती। इसके लिए कचरा संग्रहण और पृथक्करण की बेहतर व्यवस्था, नियमों का प्रभावी पालन और सामुदायिक भागीदारी जरूरी है।
नागालैंड की स्थानीय परंपराओं, ग्राम परिषदों, धार्मिक संगठनों और युवा समूहों के माध्यम से सामूहिक जिम्मेदारी की भावना को मजबूत किया जा सकता है। इसका मुख्य संदेश यही है कि प्लास्टिक कचरे की समस्या का समाधान तभी संभव है, जब बेहतर सुविधाओं के साथ समाज की सोच और रोजमर्रा की आदतों में भी बदलाव आए।
प्लास्टिक कचरा आज पर्यावरण के सामने खड़ी सबसे बड़ी चुनौतियों में से एक है। यह सही है कि इसके नुकसान से लोग अनजान नहीं हैं, फिर भी प्लास्टिक का जिम्मेदारी से इस्तेमाल करने और उसके कचरे का सही निपटान करने की आदत हर जगह नहीं बन पाई है। आखिर ऐसा क्यों है? नागालैंड विश्वविद्यालय के एक नए अध्ययन ने इस सवाल का अहम जवाब तलाशने की कोशिश की है।
अध्ययन के मुताबिक, प्लास्टिक कचरे को लेकर लोगों का व्यवहार केवल उनकी व्यक्तिगत सोच या जागरूकता से तय नहीं होता, बल्कि इस पर आसपास के लोगों की आदतों, सामाजिक अपेक्षाओं और सामुदायिक मान्यताओं का भी गहरा असर पड़ता है।
शोधकर्ताओं का कहना है कि प्लास्टिक प्रदूषण से निपटने के लिए लोगों को जागरूक करना जरूरी है, लेकिन केवल जागरूकता अभियान चलाने से समस्या हल नहीं होगी। इसके लिए समुदायों के बीच भरोसेमंद संस्थाओं, स्थानीय नेतृत्व और सामूहिक भागीदारी को मजबूत करना भी उतना ही जरूरी है।
यह अध्ययन नागालैंड के कोहिमा, दीमापुर और चुमौकेदिमा जिलों में किया गया। शोधकर्ताओं ने जून से दिसंबर 2025 के बीच 226 लोगों से सर्वेक्षण के जरिए जानकारी जुटाई। इसके अलावा, 131 लोगों से सवालों के जवाब लिए गए और 10 अन्य प्रतिभागियों के साथ गहन साक्षात्कार किए गए।
इस अध्ययन के निष्कर्ष प्रतिष्ठित जर्नल एनवायर्नमेंटल एंड सस्टेनेबिलिटी इंडीकेटर्स में प्रकाशित हुए हैं।
अध्ययन में सामने आया है कि किसी व्यक्ति के आसपास के लोग प्लास्टिक कचरे को किस तरह संभालते हैं और समाज उससे किस तरह के व्यवहार की अपेक्षा करता है, इसका उसके अपने व्यवहार से सबसे मजबूत संबंध था।
यानी जब परिवार, पड़ोस और समुदाय में कचरे को अलग-अलग रखने, प्लास्टिक का कम इस्तेमाल करने और उसे उचित जगह पर डालने की आदत होती है, तो दूसरे लोगों के भी ऐसा करने की संभावना बढ़ सकती है।
प्लास्टिक कचरे को लेकर व्यक्तिगत सोच का भी लोगों के व्यवहार से संबंध मिला। सांस्कृतिक मूल्यों और परंपराओं की भूमिका के संकेत भी सामने आए, हालांकि शोधकर्ताओं ने स्पष्ट किया कि इन मूल्यों को मापने के लिए इस्तेमाल किए गए पैमाने की विश्वसनीयता कम थी। इसलिए यह साबित नहीं माना जा सकता कि सांस्कृतिक मूल्य स्वतंत्र रूप से लोगों के व्यवहार को बदलते हैं।
अध्ययन के निष्कर्ष बताते हैं कि पर्यावरण संरक्षण को केवल व्यक्तिगत जिम्मेदारी मानकर नहीं देखा जा सकता। इसके लिए ऐसे सामाजिक माहौल की जरूरत है, जहां जिम्मेदार व्यवहार को प्रोत्साहन मिले और लोग एक-दूसरे से अच्छी आदतें सीख सकें।
नागालैंड विश्वविद्यालय के कुलपति प्रोफेसर जगदीश कुमार पटनायक का इस बारे में कहना है, यह अध्ययन प्लास्टिक कचरे की बढ़ती चुनौती से निपटने में सामुदायिक मान्यताओं, सांस्कृतिक मूल्यों और सामूहिक जिम्मेदारी की महत्वपूर्ण भूमिका को रेखांकित करता है।
उनके मुताबिक, कचरे के सतत प्रबंधन के लिए पर्याप्त बुनियादी ढांचे और प्रभावी संस्थागत व्यवस्थाओं के साथ-साथ समुदाय की सक्रिय भागीदारी और व्यवहार में लगातार बदलाव भी जरूरी है। उन्होंने बताया कि इस तरह का शोध स्थानीय जरूरतों के अनुरूप और समुदाय आधारित समाधान तैयार करने में मदद कर सकता है।
अध्ययन का एक महत्वपूर्ण पहलू लोगों के बीच जागरूकता और उनके वास्तविक व्यवहार के बीच का अंतर है। शोधकर्ताओं के अनुसार, सर्वेक्षण में शामिल लोगों ने माना कि प्लास्टिक पर्यावरण के लिए नुकसानदेह है। इस सवाल पर उनकी औसत प्रतिक्रिया 5 में से 4.77 रही, जो पर्यावरणीय नुकसान को लेकर उनकी मजबूत समझ को दर्शाती है।
लेकिन जब बात कचरे के उचित निपटान की सुविधाओं और उसे अलग-अलग करने के आत्मविश्वास की आई, तो तस्वीर बदल गई। इन पहलुओं पर लोगों के औसत अंक 2.7 से 3.2 के बीच रहे।
इसका मतलब है कि प्लास्टिक के नुकसान को समझना और उसके कचरे को सही तरीके से संभाल पाना दो अलग-अलग बातें हैं। लोगों को यह पता हो सकता है कि प्लास्टिक पर्यावरण को नुकसान पहुंचाता है, लेकिन यदि उनके पास कचरा अलग रखने, जमा करने और उचित जगह तक पहुंचाने की सुविधाएं नहीं हैं, तो केवल जानकारी उनके व्यवहार को बदलने के लिए पर्याप्त नहीं होगी।
अध्ययन से जुड़े शोधकर्ता प्रोफेसर प्रभाकर शर्मा ने प्रेस विज्ञप्ति में बताया कि लोगों ने जागरूकता की कमी, अपर्याप्त बुनियादी ढांचे और नियमों को प्रभावी ढंग से लागू न किए जाने को जिम्मेदार कचरा प्रबंधन की प्रमुख बाधाओं के रूप में पहचाना।
अध्ययन में यह भी पाया गया कि कचरा निपटान को लेकर लोगों का व्यवहार केवल उनकी अपनी इच्छा या नियंत्रण पर निर्भर नहीं करता, बल्कि समुदाय की सोच और अपेक्षाएं भी उसे प्रभावित करती हैं। हालांकि, इसका मतलब यह नहीं कि कचरा प्रबंधन की सुविधाएं जरूरी नहीं हैं। लोगों ने सुविधाओं की कमी को एक बड़ी समस्या बताया।
शोधकर्ताओं के मुताबिक, कचरा एकत्र करने से लेकर उसे अलग-अलग करने की बेहतर व्यवस्था के साथ-साथ लोगों की सोच और व्यवहार में बदलाव लाने के लिए सामुदायिक स्तर पर भी प्रयास जरूरी हैं।
रिसर्च में स्थानीय संस्कृति और परंपराओं के महत्व को भी समझने की कोशिश की गई। प्रतिभागियों ने बताया कि नागालैंड की पारंपरिक मान्यताओं और सामुदायिक प्रथाओं में स्वच्छता तथा जिम्मेदारी से जीवन जीने को महत्व दिया जाता है।
हालांकि, ये परंपराएं आज के प्लास्टिक कचरे की बढ़ती मात्रा और उसकी जटिलताओं से निपटने के लिए विकसित नहीं हुई थीं। इसके बावजूद, शोधकर्ताओं का मानना है कि इन परंपराओं में मौजूद सामूहिक जिम्मेदारी और स्वच्छता के मूल्यों को आधुनिक पर्यावरणीय चुनौतियों से जोड़कर उपयोगी बनाया जा सकता है।
इसके लिए ग्राम परिषदों, धार्मिक संगठनों और युवा समूहों जैसी स्थानीय संस्थाओं की मदद ली जा सकती है। इन संस्थाओं का समुदाय के साथ पहले से जुड़ाव और लोगों का भरोसा प्लास्टिक कचरे के उचित प्रबंधन को बढ़ावा देने में मददगार हो सकता है।
मसलन, यदि किसी समुदाय में स्वच्छता को सामूहिक जिम्मेदारी के रूप में देखा जाता है, तो इसी भावना को प्लास्टिक कचरे को अलग-अलग जमा करने, सिंगल यूज प्लास्टिक को कम करने और सामुदायिक सफाई अभियान चलाने से जोड़ा जा सकता है।
अध्ययन से जुड़े शोधकर्ता प्रोफेसर ज्ञानेंद्र नाथ तिवारी का कहना है, लोगों ने जागरूकता बढ़ाने, कचरा प्रबंधन के बुनियादी ढांचे में सुधार और नियमों को सख्ती से लागू करने जैसे उपाय सुझाए। इसके अलावा, कम इस्तेमाल, दोबारा इस्तेमाल और पुनर्चक्रण यानी रिड्यूस, रीयूज और रीसाइकिल को बढ़ावा देने, सामुदायिक सफाई अभियान चलाने और प्रोत्साहन देने की भी सिफारिश की गई।
उनके मुताबिक, इन सुझावों से स्पष्ट है कि प्लास्टिक कचरे की समस्या का समाधान किसी एक उपाय से नहीं, बल्कि कई स्तरों पर मिलकर काम करने से निकलेगा।
ऐसे में शोधकर्ताओं ने निष्कर्ष निकाला कि प्लास्टिक प्रदूषण से निपटने के लिए तीन स्तरों पर एक साथ काम करने की जरूरत है। पहला, कचरे के संग्रहण और पृथक्करण की पर्याप्त सुविधाएं उपलब्ध कराई जाएं। दूसरा, स्थानीय संस्थाओं और समुदायों की मदद से जिम्मेदार व्यवहार को बढ़ावा दिया जाए। तीसरा, नियमों का प्रभावी पालन सुनिश्चित किया जाए।
शोधकर्ताओं ने यह भी स्पष्ट किया है कि इस अध्ययन की अपनी कुछ सीमाएं भी हैं। इसमें लोगों द्वारा खुद बताए गए व्यवहार पर भरोसा किया गया है, इसलिए यह जरूरी नहीं कि उनके जवाब वास्तविक व्यवहार की पूरी तस्वीर पेश करते हों।
अध्ययन से यह भी साबित नहीं होता कि सामाजिक मान्यताएं सीधे तौर पर लोगों के व्यवहार में बदलाव लाती हैं। इसके अलावा, सर्वेक्षण में शामिल लोगों में युवाओं और पुरुषों की हिस्सेदारी अपेक्षाकृत अधिक थी। इसलिए इसके निष्कर्षों को पूरे नागालैंड की आबादी का प्रतिनिधि नहीं माना जा सकता।
ऐसे में शोधकर्ताओं ने भविष्य में लंबे समय तक लोगों के व्यवहार का अध्ययन करने, उनके जवाबों की तुलना वास्तविक गतिविधियों से करने और यह समझने की सिफारिश की है कि कचरा प्रबंधन की सुविधाएं सामाजिक मान्यताओं को किस तरह प्रभावित करती हैं।
कुल मिलाकर अध्ययन का संदेश बेहद स्पष्ट है, प्लास्टिक प्रदूषण के खिलाफ जंग केवल लोगों को यह बताकर नहीं जीती जा सकती कि प्लास्टिक नुकसानदेह है। इसके लिए ऐसी व्यवस्था बनानी होगी, जिसमें सही काम करना आसान हो और समुदाय भी उसे अपनी साझा जिम्मेदारी समझे। जब बेहतर सुविधाओं के साथ समाज की भागीदारी जुड़ेगी, तभी जागरूकता रोजमर्रा की आदतों में बदल सकेगी।