

सिकरहना नदी तटबंध विवाद पर सुप्रीम कोर्ट ने तकनीकी मामलों में न्यायिक हस्तक्षेप से इनकार करते हुए 25 फरवरी 2026 को पटना उच्च न्यायालय के फैसले को बरकरार रखा और विशेष अनुमति याचिका खारिज कर दी।
अदालत ने स्पष्ट किया कि तटबंध निर्माण जैसे विषय विशेषज्ञ संस्थाओं और संबंधित विभागों के अधिकार क्षेत्र में आते हैं।
239 करोड़ रुपये की इस परियोजना पर पर्यावरणीय और सामाजिक प्रभावों को लेकर स्थानीय किसानों व मछुआरों ने गंभीर सवाल उठाए हैं, लेकिन न्यायालय ने उन्हें अपनी आपत्तियां प्रशासनिक व तकनीकी मंचों पर रखने की सलाह दी है।
सर्वोच्च न्यायालय ने 25 फरवरी 2026 को एक अहम फैसले में पटना उच्च न्यायालय के निर्णय को बरकरार रखते हुए उस विशेष अनुमति याचिका (एसएलपी) को खारिज कर दिया, जिसमें पश्चिम चंपारण में सिकरहना नदी पर तटबंध निर्माण को चुनौती दी गई थी।
उच्च न्यायालय ने पहले ही यह स्पष्ट किया था कि ऐसे मामलों में, जिनमें तकनीकी और विशेषज्ञता की आवश्यकता होती है, अदालतें सीधे हस्तक्षेप नहीं करतीं। अदालत ने माना था कि यह विषय विशेषज्ञ संस्थाओं और संबंधित अधिकारियों के अधिकार क्षेत्र में आता है। सर्वोच्च न्यायालय ने भी उच्च न्यायालय की इस राय से सहमति जताई कि सिकरहना नदी पर तटबंध का निर्माण विशेषज्ञों और संबंधित विभागों का विषय है।
साथ ही, याचिकाकर्ताओं को सलाह दी कि वे अपनी आपत्तियां संबंधित अधिकारियों और हितधारकों (स्टेकहोल्डर्स) के समक्ष उठाएं। इसके साथ ही याचिका का निपटारा कर दिया गया।
पर्यावरण और सामाजिक प्रभाव को लेकर उठे सवाल
दरअसल, सिकरहना नदी पर 239 करोड़ रुपए की लागत से तटबंध निर्माण की योजना को मंजूरी दी गई थी। निर्माण शुरू होने से पहले ही कुछ निजी पक्षकारों ने हाईकोर्ट में याचिका दायर की।
उनका कहना था कि वे नदी के किनारे बसे गांवों के किसान और मछुआरे हैं, जिनके घर और खेती की जमीन नदी की सक्रिय धारा और प्रस्तावित तटबंध के बीच स्थित हैं।
याचिकाकर्ताओं ने आरोप लगाया कि तटबंध की रूपरेखा एक पुरानी तकनीकी रिपोर्ट पर आधारित है।
उनका दावा था कि इससे नदी किनारे बसे ग्रामीण बेघर हो जाएंगे, घर और खेती योग्य जमीन डूब सकती है। साथ ही उन्होंने यह भी कहा कि परियोजना से पहले कोई नया तकनीकी आकलन, पर्यावरण प्रभाव मूल्यांकन, सामाजिक प्रभाव अध्ययन या पुनर्वास एवं पुनर्स्थापन योजना नहीं बनाई गई।
सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले के साथ फिलहाल तटबंध के निर्माण का रास्ता साफ हो गया है, हालांकि प्रभावित समुदायों के सवाल अब संबंधित प्रशासनिक और तकनीकी मंचों पर उठाए जाएंगे।