

उत्तर प्रदेश में बूढ़ी गंगा नदी के संरक्षण के लिए बाढ़भूमि के सीमांकन का काम शुरू हो चुका है। यह कार्य मई 2026 तक पूरा करने का लक्ष्य है।
नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल को इस प्रगति की जानकारी दी गई है। इस प्रक्रिया से नदी के प्राकृतिक मार्ग की रक्षा होगी और अतिक्रमण पर रोक लगेगी।
उत्तर प्रदेश में बूढ़ी गंगा नदी के संरक्षण और उसके प्राकृतिक प्रवाह को सुरक्षित रखने की दिशा में एक अहम कदम आगे बढ़ा है।
सिंचाई एवं जल संसाधन विभाग (गंगा) के मुख्य अभियंता की 19 जनवरी 2026 की रिपोर्ट के मुताबिक, बूढ़ी गंगा की बाढ़भूमि (फ्लडप्लेन) के सीमांकन का काम जमीन पर शुरू हो चुका है और इसे मई 2026 तक पूरा करने का लक्ष्य रखा गया है। इस प्रगति की जानकारी नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (एनजीटी) को भी सौंप दी गई है।
रिपोर्ट में बताया गया है कि रुड़की स्थित राष्ट्रीय जल विज्ञान संस्थान (एनआईएच) ने 29 सितंबर 2025 को बूढ़ी गंगा की बाढ़भूमि से जुड़ी अंतिम रिपोर्ट मेरठ के कार्यकारी अभियंता को सौंप दी थी। इसमें नदी की सीमाओं के निर्देशांक पहले जैसे ही रखे गए हैं, केवल नक्शों में कुछ मामूली सुधार किए गए हैं। साथ ही यह भी बताया गया कि मुजफ्फरनगर, मेरठ और हापुड़ जिलों में बाढ़भूमि के सीमांकन की परियोजना तैयार हो चुकी है और यह काम 31 मई 2026 तक पूरा करने का लक्ष्य रखा गया है।
सीमांकन रिपोर्ट के आधार पर सिंचाई एवं जल संसाधन विभाग ने जमीनी स्तर पर बाढ़भूमि की वास्तविक पहचान का काम शुरू कर दिया है। यह कार्य संबंधित जिला प्रशासन के सहयोग से चरणबद्ध तरीके से किया जा रहा है। विभाग का कहना है कि पूरी प्रक्रिया वैज्ञानिक, पारदर्शी और कानूनी नियमों के अनुसार चल रही है।
नदी के उद्गम को लेकर भी साझा की गई जानकारी
गौरतलब है कि नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल ने 14 अक्टूबर 2025 को उत्तर प्रदेश सरकार को निर्देश दिया था कि वह बूढ़ी गंगा की बाढ़भूमि के भौतिक सीमांकन में हुई प्रगति पर विस्तृत रिपोर्ट दाखिल करे। सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता ने यह सवाल भी उठाया था कि नदी के उद्गम स्थल को सही ढंग से दर्ज नहीं किया गया है।
रिपोर्ट में यह भी बताया गया है कि 12 दिसंबर 2025 को हुई एक अहम बैठक में मेरठ में बूढ़ी गंगा के भौतिक सीमांकन की परियोजना को राज्य बाढ़ नियंत्रण परिषद की स्थाई कार्यकारी समिति ने मंजूरी दे दी है। यह बैठक जल संसाधन एवं बाढ़ नियंत्रण विभाग के मंत्री की अध्यक्षता में हुई थी। अब जैसे ही बजट आवंटित होगा, काम तेजी से शुरू कर दिया जाएगा।
रिपोर्ट में बूढ़ी गंगा के उद्गम को लेकर भी स्थिति स्पष्ट की गई है। नदी का प्रारंभ बिंदु मुजफ्फरनगर जिले के देवला गांव के पास मध्य गंगा नहर पर बने सिफन के ऊपरी हिस्से को बताया गया है। बूढ़ी गंगा एक अस्थाई नदी है, जिसमें मानसून में ही पानी बहता है। इसका कोई स्थाई जलस्रोत नहीं है।
बिजनौर में गंगा नदी पर बने बैराज से मध्य गंगा नहर प्रणाली को सिंचाई के लिए पानी दिया जाता है। कई बार मानसून के मौसम से अलग भी बैराज के पास जमीन से धीरे-धीरे रिसाव होता है।
यही रिसा हुआ पानी छोटी धाराओं में इकट्ठा होकर अंततः बूढ़ी गंगा में प्रवाहित होने लगता है। सरकार का दावा है कि बाढ़भूमि के सीमांकन से नदी के प्राकृतिक मार्ग की रक्षा होगी, अतिक्रमण पर रोक लगेगी और भविष्य में बाढ़ व पर्यावरणीय नुकसान से बचाव में मदद मिलेगी।
ऐसे में बूढ़ी गंगा के संरक्षण की यह प्रक्रिया अब निर्णायक मोड़ पर पहुंचती दिख रही है।