

अड्यार और तेल नदी मामलों में नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (एनजीटी) के समक्ष सामने आए दो अहम प्रकरण देश में नदियों और आर्द्रभूमियों के बिगड़ते पर्यावरणीय संकट और उनके पुनर्जीवन की चुनौती को रेखांकित करते हैं।
एक ओर चेन्नई की अड्यार नदी के लिए 14 एसटीपी, 89 किलोमीटर सीवर लाइन और 605 प्रदूषण स्रोतों के डायवर्जन जैसी व्यापक पुनर्जीवन योजना पेश की गई है, वहीं दूसरी ओर बिहार की तेल नदी और उसकी सहायक आर्द्रभूमियों पर अतिक्रमण, गाद और अवैध अवरोधों को लेकर एनजीटी ने कई विभागों को नोटिस जारी कर जवाब तलब किया है।
अड्यार नदी के मामले में रिपोर्ट ने भयावह प्रदूषण स्तर उजागर किए हैं, जहां कई हिस्सों में घुली ऑक्सीजन शून्य और बीओडी 140 मिलीग्राम प्रति लीटर तक पहुंच गई है, जिससे इकोलॉजिकल रेस्टोरेशन की तत्काल जरूरत स्पष्ट होती है।
वहीं तेल नदी मामले में याचिका में आरोप है कि प्रशासनिक लापरवाही और गलत सर्वे के कारण आर्द्रभूमियों का प्राकृतिक जल संतुलन बिगड़ गया है, जिससे बाढ़ और स्थायी जलभराव जैसी गंभीर समस्याएं पैदा हो रही हैं।
दोनों मामलों में एनजीटी की सक्रियता यह संकेत देती है कि नदियों और आर्द्रभूमियों का संरक्षण अब केवल पर्यावरणीय मुद्दा नहीं, बल्कि शासन और जवाबदेही का बड़ा परीक्षण बन चुका है।
चेन्नई रिवर्स रेस्टोरेशन ट्रस्ट (सीआरआरटी) ने नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (एनजीटी) को सौंपी अपनी ताजा रिपोर्ट में साफ कहा है कि तमिलनाडु सरकार राज्य की नदियों और जलस्रोतों की सेहत को सुधारने के लिए पूरी तरह प्रतिबद्ध है। इस दिशा में अड्यार नदी के पुनर्जीवन के लिए एक व्यापक और महत्वाकांक्षी योजना शुरू की गई है।
यह योजना अड्यार नदी के उद्गम गुडुवनचेरी से लेकर बंगाल की खाड़ी में इसके संगम तक पूरी नदी को कवर करती है। योजना का लक्ष्य नदी की पारिस्थितिकी को बेहतर बनाना और जैव विविधता को फिर से जीवंत करना है।
बढ़ता प्रदूषण बन रहा संकट
रिपोर्ट के मुताबिक, नदी में प्रदूषण की बड़ी वजह बने 76 ‘वेट आउटफॉल’ चिन्हित किए गए हैं, जहां से गंदा पानी सीधे नदी में गिर रहा है।
हालात इतने गंभीर हैं कि कई हिस्सों में जैविक ऑक्सीजन मांग (बीओडी) 30 से 140 मिलीग्राम प्रति लीटर तक पहुंच चुकी है, जबकि पानी में घुली ऑक्सीजन का स्तर शून्य दर्ज किया गया है, जिससे पता चला है कि नदी के कुछ हिस्सों में पारिस्थितिकी की बहाली (इकोलॉजिकल रेस्टोरेशन) की जरूरत है।
इस परियोजना का उद्देश्य प्रदूषण को प्रभावी तरीके से कम करना और नदी की सुरक्षा सुनिश्चित करना है। इसके लिए सस्टेनेबल तरीके अपनाए जाएंगे ताकि राष्ट्रीय मानकों के अनुसार जल गुणवत्ता हासिल की जा सके। साथ ही नदियों में न्यूनतम पर्यावरणीय प्रवाह बनाए रखा जाएगा, जिससे जल गुणवत्ता सुधरे और जलीय जीवन सुरक्षित रह सके।
बिछाई जाएगी 89 किलोमीटर लंबी सीवर लाइन
इस परियोजना में कई ठोस कदम प्रस्तावित किए गए हैं, जिनमें 605 प्रदूषण स्रोतों को रोककर उनका डायवर्जन करना शामिल है।
इसके अलावा नदी के दोनों किनारों पर 89 किलोमीटर लंबी सीवर लाइन बिछाई जाएगी। दूषित पानी के उपचार के लिए 110 एमएलडी क्षमता वाले 14 सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट (एसटीपी) लगाए जाएंगे। साथ ही नदी के किनारों पर चार पार्क विकसित किए जाएंगे और बड़े पैमाने पर वृक्षारोपण भी किया जाएगा।
अदालत में साझा जानकारी के मुताबिक इस परियोजना को चरणबद्ध तरीके से लागू किया जाएगा, 6 महीने में योजना विकास, 30 महीने में निर्माण और उसके बाद 15 वर्षों तक संचालन व रखरखाव शामिल है।
यह पूरी पहल पब्लिक-प्राइवेट पार्टनरशिप (पीपीपी) मॉडल के तहत चेन्नई रिवर्स ट्रांसफॉर्मेशन कंपनी और पी एंड सी अड्यार वाटर प्रोजेक्ट्स प्राइवेट लिमिटेड के सहयोग से लागू की जा रही है।
गौरतलब है नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल ने 18 जून 2024 को अंग्रेजी अखबार द हिन्दू में प्रकाशित एक रिपोर्ट के आधार पर इस मामले में स्वतः संज्ञान लिया है। रिपोर्ट में बताया गया है कि कोट्टूरपुरम और ईको पार्क के पास सीवेज प्रदूषण के कारण बड़ी संख्या में मरी हुई मछलियां पाई गई थी।
बिहार: तेल नदी अतिक्रमण मामले में एनजीटी ने कई विभागों सहित राष्ट्रीय स्वच्छ गंगा मिशन को भेजा नोटिस
नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (एनजीटी) की पूर्वी पीठ ने बिहार के सारण जिले में तेल नदी पर अतिक्रमण और उसके पुनर्जीवन से जुड़े मामले पर गंभीर रुख अपनाया है। इस मामले में सुनवाई के दौरान ट्रिब्यूनल ने कई संबंधित विभागों को नोटिस जारी करने का आदेश दिया है।
अदालत ने बिहार के ग्रामीण विकास विभाग, जल संसाधन विभाग, बिहार राज्य आर्द्रभूमि प्राधिकरण, सारण के जिला मजिस्ट्रेट, बिहार राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड और जिला वन अधिकारी को पक्षकार बनाते हुए नोटिस जारी करने के निर्देश दिए हैं। साथ ही, याचिकाकर्ता की मांग पर राष्ट्रीय स्वच्छ गंगा मिशन (एनएमसीजी) को भी इस मामले में प्रतिवादी के रूप में शामिल करने का आदेश दिया है।
एनजीटी ने इन सभी पक्षों को एक महीने के भीतर अपना जवाब दाखिल करने को कहा है। इस मामले में अगली सुनवाई 21 जुलाई 2026 को होगी।
यह मामला वेटरन्स फोरम फॉर ट्रांसपेरेंसी इन पब्लिक लाइफ द्वारा 6 मार्च 2026 को दायर याचिका में उठाया गया, जिसे 15 अप्रैल 2026 को नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (एनजीटी) की वेबसाइट पर अपलोड किया गया था। इस याचिका में मांग की गई थी कि सारण जिले के जलालपुर, रेवेलगंज और छपरा सागर ब्लॉकों से होकर गुजरने वाली तेल नदी को अतिक्रमण और अवरोधों से मुक्त कर पुनर्जीवित किया जाए। साथ ही याचिका में तटवर्ती क्षेत्रों में वृक्षारोपण की भी मांग की गई है।
गौरतलब है कि तेल नदी का उद्गम भटकेसरी, गमरहिया और मंगोलपुर नामक तीन आद्रभूमियों से होता है। यह नदी कई गांवों से होकर बहते हुए इनाई गांव के पास घाघरा (सरयू) नदी में मिल जाती है।
अतिक्रमण, प्रदूषण, जलवायु संकट से जूझती आद्रभूमियां
याचिका में यह भी कहा गया है कि तेल नदी और उसकी सहायक धाराएं अब गाद से भर गई हैं। साथ ही जलकुंभी, खरपतवार और अतिक्रमण के चलते इनका प्रवाह मार्ग इतना संकरा हो गया है कि वे घागरा के अतिरिक्त पानी का निकास नहीं कर पा रहीं। इससे क्षेत्र में बाढ़ और स्थाई जलजमाव जैसी स्थिति पैदा हो गई है।
भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) की रिपोर्ट का हवाला देते हुए याचिका में बताया गया है कि सारण जिले में 543 आद्रभूमियां हैं, जो 21,170 हेक्टेयर क्षेत्र में फैली हैं। ये जिले के कुल भौगोलिक क्षेत्र का करीब 8 फीसदी हिस्सा हैं। लेकिन तेल नदी तीन प्रमुख आद्रभूमियां चैनलों (पाइन्स) से जुड़ी हैं और मानसून में आपस में अतिरिक्त पानी को ट्रांसफर करती हैं और संतुलन को बनाए रखती हैं।
आरोप है कि ये तीनों आर्द्रभूमियां अव्यवस्थित निर्माण, प्रदूषण व कचरे के निपटान, अतिक्रमण और भूमि भराई, आक्रामक प्रजातियों के प्रसार, जलवायु परिवर्तन तथा जल प्रवाह में बदलाव के चलते गंभीर रूप से प्रभावित हुई हैं। इसकी वजह से क्षेत्र में बाढ़ जैसी स्थिति पैदा हो गई है और जलभराव स्थाई रूप से बना हुआ है। इससे फसलें और कृषि गतिविधियां बुरी तरह प्रभावित हो रही हैं।
प्रशासन पर लगे गंभीर आरोप
याचिका में यह भी कहा गया है कि आवेदक ने तेल नदी तथा गमरहिया, भटकेसरी और मंगोलपुर आर्द्रभूमियों की मौजूदा स्थिति को लेकर संबंधित अधिकारियों को पत्र भेजा था। लेकिन समस्या के समाधान के बजाय अधिकारियों ने तेल नदी की मुख्य धारा में भौतिक अवरोध (डैम) बना दिया, जिससे स्थिति और बिगड़ गई।
यह भी आरोप है कि बिहार राज्य आर्द्रभूमि प्राधिकरण ने भटकेसरी, मंगोलपुर और गमरहिया आर्द्रभूमियों की सीमा निर्धारण के लिए मनमाने और केवल कागजी सर्वे किए, जो जमीनी हकीकत से मेल नहीं खाते। साथ ही, सर्वे ऑफ इंडिया के नक्शों और स्पेस एप्लीकेशन सेंटर एटलस 2021 के आंकड़ों को भी नजरअंदाज किया गया। इसकी वजह से आर्द्रभूमियों के वास्तविक प्रभाव क्षेत्र की पहचान नहीं हो सकी।
एनजीटी ने मामले की गंभीरता को देखते हुए सभी पक्षों से विस्तृत जवाब तलब किया है और तेल नदी के संरक्षण को लेकर आगे की कार्यवाही पर नजर बनाए रखने के संकेत दिए हैं।