हर दिन 2 माइक्रोग्राम से ज्यादा प्लास्टिक कण सांस के साथ अंदर ले रहे हैं लोग: रिपोर्ट

अध्ययन के अनुसार, प्लास्टिक के कणों के लंबे समय तक संपर्क रहने पर हृदय रोग का खतरा 5-9 प्रतिशत और फेफड़ों के कैंसर का जोखिम 8-13 प्रतिशत बढ़ सकता है
अध्ययन में पाया गया कि हवा में मौजूद कुल माइक्रोप्लास्टिक कणों में लगभग 65 प्रतिशत हिस्सा वाहनों के टायर के घिसने से आता है।
अध्ययन में पाया गया कि हवा में मौजूद कुल माइक्रोप्लास्टिक कणों में लगभग 65 प्रतिशत हिस्सा वाहनों के टायर के घिसने से आता है।प्रतीकात्मक छवि, फोटो साभार: आईस्टॉक
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सारांश
  • जर्मनी के लाइपजिग शहर में किए गए अध्ययन के अनुसार हवा में मौजूद कुल सूक्ष्म धूल के कणों का लगभग 4 प्रतिशत प्लास्टिक है।

  • शोध के अनुसार शहर के व्यस्त ट्रैफिक क्षेत्रों में रहने वाला व्यक्ति प्रतिदिन लगभग 2.1 माइक्रोग्राम प्लास्टिक सांस के साथ अंदर लेता है।

  • अध्ययन में पाया गया कि हवा में मौजूद कुल माइक्रोप्लास्टिक कणों में लगभग 65 प्रतिशत हिस्सा वाहनों के टायर के घिसने से आता है।

  • वैज्ञानिकों ने दो सप्ताह तक हर मिनट लगभग 500 लीटर हवा को फिल्टर करके उसमें मौजूद माइक्रोप्लास्टिक और नैनोप्लास्टिक कणों का विश्लेषण किया।

  • लंबे समय तक ऐसे कणों के संपर्क में रहने से हृदय रोग का खतरा 5-9 प्रतिशत और फेफड़ों के कैंसर का खतरा 8-13 प्रतिशत बढ़ सकता है।

आज दुनिया भर में प्लास्टिक प्रदूषण एक बड़ी समस्या बन चुका है। अब तक अधिकतर चर्चा समुद्र और जमीन पर फैले प्लास्टिक को लेकर होती रही है। लेकिन हाल के वर्षों में वैज्ञानिकों ने पाया है कि बहुत छोटे प्लास्टिक कण हवा में भी मौजूद हैं। जर्मनी के लाइपजिग शहर में किए गए एक नए अध्ययन से पता चला है कि हवा में मौजूद धूल के कणों का एक हिस्सा प्लास्टिक से बना होता है। कम्युनिकेशन अर्थ एंड एनवायरमेंट में प्रकाशित यह अध्ययन बताता है कि लोग रोजाना सांस के साथ बहुत छोटे प्लास्टिक कण अपने शरीर में ले रहे हैं।

हवा में प्लास्टिक कैसे पहुंचता है?

हवा में मौजूद प्लास्टिक को माइक्रोप्लास्टिक और नैनोप्लास्टिक कहा जाता है। माइक्रोप्लास्टिक वे कण होते हैं जिनका आकार एक माइक्रोमीटर से एक मिलीमीटर के बीच होता है। नैनोप्लास्टिक इससे भी छोटे होते हैं, जिनका आकार एक माइक्रोमीटर से कम होता है।

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अध्ययन में पाया गया कि हवा में मौजूद कुल माइक्रोप्लास्टिक कणों में लगभग 65 प्रतिशत हिस्सा वाहनों के टायर के घिसने से आता है।

ये कण कई स्रोतों से हवा में पहुंचते हैं। सबसे बड़ा स्रोत सड़कों पर चलने वाले वाहनों के टायर का घिसना है। जब गाड़ियां सड़क पर चलती हैं तो टायर धीरे-धीरे घिसते हैं और उनके छोटे-छोटे कण हवा में फैल जाते हैं।

इसके अलावा कुछ अन्य स्रोत भी हैं जिनमें ब्रेक के घिसने से निकलने वाले कण, सिंथेटिक कपड़ों से निकलने वाले फाइबर, शहरों की धूल, प्लास्टिक कचरे के टूटने से बने कण तथा समुद्र में मौजूद प्लास्टिक भी लहरों और समुद्री हवा के कारण वापस वातावरण में पहुंच सकता है।

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लाइपजिग में किया गया अध्ययन

जर्मनी के वैज्ञानिकों ने लाइपजिग शहर में एक खास जगह पर दो हफ्तों तक हवा के नमूने लिए। यह जगह एक व्यस्त सड़क के पास थी, जहां ट्रैफिक ज्यादा रहता है। वैज्ञानिकों ने विशेष मशीनों की मदद से हर मिनट लगभग 500 लीटर हवा को फिल्टर के जरिए खींचा और उसमें मौजूद कणों को इकट्ठा किया।

बाद में इन फिल्टरों को प्रयोगशाला में जांचा गया। जांच के लिए एक आधुनिक तकनीक का इस्तेमाल किया गया जिसे पाइरोलिसिस गैस क्रोमैटोग्राफी–मास स्पेक्ट्रोमेट्री कहा जाता है। इस तकनीक में नमूनों को गर्म करके छोटे-छोटे रासायनिक टुकड़ों में तोड़ा जाता है और फिर मशीन उनकी पहचान करती है।

वैज्ञानिकों ने 11 प्रकार के सामान्य प्लास्टिक को पहचानने के लिए उनके रासायनिक “फिंगरप्रिंट” तैयार किए और हवा के नमूनों से उनकी तुलना की।

शोध के अनुसार शहर के व्यस्त ट्रैफिक क्षेत्रों में रहने वाला व्यक्ति प्रतिदिन लगभग 2.1 माइक्रोग्राम प्लास्टिक सांस के साथ अंदर लेता है।
शोध के अनुसार शहर के व्यस्त ट्रैफिक क्षेत्रों में रहने वाला व्यक्ति प्रतिदिन लगभग 2.1 माइक्रोग्राम प्लास्टिक सांस के साथ अंदर लेता है।स्रोत: कम्युनिकेशन अर्थ एंड एनवायरमेंट
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क्या कहता है अध्ययन?

इस अध्ययन से कुछ महत्वपूर्ण तथ्य सामने आए - हवा में मौजूद कुल सूक्ष्म धूल का लगभग चार प्रतिशत हिस्सा प्लास्टिक था। इन प्लास्टिक कणों में से लगभग 65 प्रतिशत टायर के घिसने से बने कण थे। बाकी कणों में पॉलीविनाइल क्लोराइड (पीवीसी), पॉलीएथिलीन (पीई) और पॉलीएथिलीन टेरेफ्थेलेट (पीईटी) जैसे प्लास्टिक शामिल थे। यह परिणाम दिखाते हैं कि शहरों में सड़क यातायात हवा में प्लास्टिक प्रदूषण का एक बड़ा कारण है।

लोग कितनी मात्रा में प्लास्टिक सांस के साथ लेते हैं

वैज्ञानिकों ने यह भी अनुमान लगाया कि एक व्यक्ति दिन भर में कितना प्लास्टिक सांस के साथ अंदर ले सकता है। उनके अनुसार यदि कोई व्यक्ति लगातार ऐसे इलाके में रहे जहां ट्रैफिक ज्यादा है, तो वह लगभग 2.1 माइक्रोग्राम प्लास्टिक प्रतिदिन सांस के साथ अंदर ले सकता है।

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एक साल में यह मात्रा लगभग 0.7 मिलीग्राम हो जाती है। यह मात्रा बहुत छोटी लग सकती है, लेकिन इतने छोटे कण शरीर के अंदर गहराई तक पहुंच सकते हैं।

प्लास्टिक के कणों का स्वास्थ्य पर असर

अध्ययन के अनुसार, नैनोप्लास्टिक कण फेफड़ों के अंदर गहराई तक पहुंच सकते हैं। इससे शरीर में कई प्रकार की प्रतिक्रियाएं हो सकती हैं, जैसे: सूजन (इन्फ्लेमेशन), ऑक्सीडेटिव स्ट्रेस, सांस संबंधी समस्याएं आदि का खतरा है। इन कणों की सतह पर भारी धातुएं और अन्य जहरीले रसायन भी चिपक सकते हैं, जिससे उनका नुकसान बढ़ सकता है।

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अध्ययन में पाया गया कि हवा में मौजूद कुल माइक्रोप्लास्टिक कणों में लगभग 65 प्रतिशत हिस्सा वाहनों के टायर के घिसने से आता है।

शोधकर्ताओं के अनुमान के अनुसार, लंबे समय तक ऐसे कणों के संपर्क में रहने से हृदय और फेफड़ों की बीमारियों से मृत्यु का खतरा पांच से नौ प्रतिशत तक बढ़ सकता है। फेफड़ों के कैंसर का खतरा आठ से 13 प्रतिशत तक बढ़ सकता है। हालांकि वैज्ञानिकों का कहना है कि इस विषय पर अभी और शोध की जरूरत है।

नियम और नीतियों की कमी

फिलहाल दुनिया में हवा में मौजूद माइक्रोप्लास्टिक के लिए कोई स्पष्ट सीमा या नियम तय नहीं किए गए हैं। न तो विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) और न ही यूरोपीय संघ ने इसके लिए कोई मानक तय किया है। इसका मुख्य कारण यह है कि इस विषय पर शोध अभी शुरुआती चरण में है और मापने के तरीकों को अभी और बेहतर बनाने की जरूरत है।

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भविष्य में क्या किया जा सकता है?

वैज्ञानिक अब इस विषय पर और गहराई से अध्ययन करना चाहते हैं। इसके लिए वे पूरे साल के दौरान हवा के नमूने एकत्र करेंगे, अलग-अलग जगहों की तुलना करेंगे, मौसम के अनुसार होने वाले बदलावों का अध्ययन करेंगे। इससे यह समझने में मदद मिलेगी कि हवा में माइक्रोप्लास्टिक की मात्रा समय और स्थान के अनुसार कैसे बदलती है।

लाइपजिग में किए गए इस अध्ययन से यह स्पष्ट होता है कि हवा में माइक्रोप्लास्टिक एक नई पर्यावरणीय चुनौती बनकर सामने आ रहा है। खासकर वाहनों के टायर से निकलने वाले कण इसका बड़ा स्रोत हैं। हालांकि अभी इसके स्वास्थ्य प्रभावों पर पूरी तरह से सहमति नहीं बनी है, लेकिन शुरुआती संकेत बताते हैं कि यह मानव स्वास्थ्य के लिए जोखिम पैदा कर सकता है। इसलिए वैज्ञानिकों का मानना है कि भविष्य में हवा की गुणवत्ता के अध्ययन में माइक्रोप्लास्टिक को भी शामिल करना जरूरी होगा।

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