

राजस्थान के भीलवाड़ा जिले के बदनपुरा गांव में बिना पर्यावरणीय मंजूरी के चल रहे ईंट भट्टे पर नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल ने सख्त रुख अपनाया है। ट्रिब्यूनल ने शिकायत को गंभीर मानते हुए मामले की जांच के लिए संयुक्त समिति गठित की है, जो छह सप्ताह में रिपोर्ट देगी।
याचिका में आरोप लगाया गया है कि भट्टा बिना भूमि उपयोग परिवर्तन, प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड की सहमति और भूजल उपयोग की अनुमति के चल रहा है। साथ ही प्रदूषण कम करने के लिए अनिवार्य जिग-जैग तकनीक और ग्रीन बेल्ट जैसी व्यवस्थाएं भी नहीं अपनाई गईं हैं।
ग्रामीणों का कहना है कि भट्टे से निकलने वाला धुआं, राख और धूल हवा, पानी और खेती, तीनों को प्रभावित कर रहे हैं।
प्रदूषण से मौसमी तालाब और नाले दूषित हुए हैं, जिससे मवेशियों के बीमार पड़ने और फसलों को नुकसान की शिकायतें सामने आई हैं। अब समिति की जांच रिपोर्ट से तय होगा कि पर्यावरणीय नियमों के उल्लंघन पर क्या कार्रवाई होती है।
राजस्थान में भीलवाड़ा जिले की जहाजपुर तहसील के बदनपुरा गांव में नियमों को ताक पर रखकर चल रहे एक ईंट भट्टे पर नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (एनजीटी) ने कड़ा संज्ञान लिया है। ट्रिब्यूनल ने माना है कि याचिका में उठाए गए मुद्दे पर्यावरण के लिहाज से अत्यंत गंभीर हैं, जिसके बाद 13 मई 2026 को इस मामले की जांच के लिए एक उच्च स्तरीय संयुक्त समिति गठित करने के निर्देश दिए गए हैं।
इस समिति में राजस्थान राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (आरएसपीसीबी) और भीलवाड़ा जिले के कलेक्टर के प्रतिनिधि शामिल होंगें। यह समिति मौके पर जाकर जांच करेगी और छह सप्ताह के भीतर तथ्यात्मक रिपोर्ट तथा अब तक हुई कार्रवाई की जानकारी अदालत को सौंपेगी।
साथ ही एनजीटी ने भट्टा मालिक और राजस्थान प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड सहित सभी संबंधित पक्षों को नोटिस जारी कर छह सप्ताह में जवाब मांगा है।
बिना मंजूरी के चल रहा भट्टा
याचिका में आरोप लगाया गया है कि ईंट-भट्टा बिना जरूरी स्वीकृतियों के चल रहा है। न तो भूमि उपयोग में बदलाव को लेकर वैध अनुमति ली गई और न ही प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड से स्थापना एवं संचालन की सहमति प्राप्त की गई।
एक और गंभीर आरोप है कि भट्टे में प्रदूषण नियंत्रण के लिए जरूरी जिग-जैग तकनीक का भी उपयोग नहीं किया जा रहा। यहां न ही कोई ग्रीन बेल्ट विकसित की गई है, और न ही भूजल के दोहन के लिए आवश्यक अनुमति ली गई है।
याचिकाकर्ता के मुताबिक, भट्टे से निकलने वाला काला धुआं, राख और धूल आसपास की हवा को गंभीर रूप से प्रदूषित कर रहे हैं। इसका असर खास तौर पर गांव के लोगों और राहगीरों के स्वास्थ्य पर पड़ रहा है।
प्रदूषण से खेतों-मवेशियों पर पड़ रहा असर
प्रदूषण का असर केवल हवा तक सीमित नहीं है, भट्टे की राख और अन्य प्रदूषक पास के मौसमी तालाब और बरसाती नाले तक पहुंच गए हैं, जिससे उनका पानी दूषित हो गया है। शिकायत में कहा गया है कि इस पानी के कारण मवेशियों के बीमार पड़ने की घटनाएं भी सामने आई हैं।
लगातार फैल रहे प्रदूषण का असर खेतों पर भी दिख रहा है। प्रदूषण से आसपास की उपजाऊ जमीन की गुणवत्ता घट रही है, जिससे फसलें प्रभावित हो रही हैं। मौसमी खेती पर निर्भर किसानों के सामने आजीविका का संकट खड़ा हो गया है।
ऐसे में अब संयुक्त समिति की रिपोर्ट से तय होगा कि आरोप कितने सही हैं और आगे क्या कार्रवाई की जाएगी।