तटीय इलाकों में तेजी से बढ़ रहा माइक्रोप्लास्टिक प्रदूषण, समुद्र की सतह से तलछट तक पहुंच रहे प्लास्टिक कण

प्लास्टिक कचरा बना रसायनों का वाहक, माइक्रोप्लास्टिक से समुद्र में बढ़ रहा स्वास्थ्य और पर्यावरण के लिए भारी खतरा
एचबीसीडी युक्त माइक्रोप्लास्टिक समुद्र में लंबे समय तक घूमकर रसायनों के द्वितीयक स्रोत के रूप में काम कर सकता है।
एचबीसीडी युक्त माइक्रोप्लास्टिक समुद्र में लंबे समय तक घूमकर रसायनों के द्वितीयक स्रोत के रूप में काम कर सकता है।फोटो साभार: आईस्टॉक
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सारांश
  • समुद्र में प्लास्टिक टूटकर माइक्रोप्लास्टिक बनता है, जिसकी सतह पर रसायन जमा होकर जीवों के लिए खतरा बढ़ा सकते हैं।

  • अध्ययन में माइक्रोप्लास्टिक और बड़े प्लास्टिक कचरे में डीईएचपी, एचबीसीडी और इरगाफोस 168 जैसे रसायन काफी मात्रा पाए गए।

  • डीईएचपी की मात्रा कुछ प्लास्टिक नमूनों में 1,000 माइक्रोग्राम प्रति ग्राम से अधिक मिली, जिससे रासायनिक प्रदूषण की चिंता बढ़ी।

  • एचबीसीडी युक्त माइक्रोप्लास्टिक समुद्र में लंबे समय तक घूमकर रसायनों के द्वितीयक स्रोत के रूप में काम कर सकता है।

  • प्लास्टिक प्रदूषण रोकने के लिए कचरा हटाने के साथ रसायनों का प्रबंधन, उचित संग्रह और उपचार भी बेहद जरूरी है।

प्लास्टिक प्रदूषण को आमतौर पर समुद्र में जमा कचरे की समस्या माना जाता है। लेकिन एक नए अध्ययन से पता चलता है कि प्लास्टिक का खतरा इससे कहीं बड़ा है। प्लास्टिक में मौजूद कई रसायन पर्यावरण में लंबे समय तक बने रह सकते हैं और समुद्री जीवों तथा पारिस्थितिकी तंत्र के लिए चिंता का कारण बन सकते हैं।

प्लास्टिक उत्पादों में कई तरह के रसायन मिलाए जाते हैं। इनमें प्लास्टिक को खराब होने से बचाने वाले एंटीऑक्सीडेंट, उसे लचीला बनाने वाले प्लास्टिसाइजर, धूप से बचाने वाले यूवी स्टेबलाइजर और आग को फैलने से रोकने वाले फ्लेम रिटार्डेंट शामिल हैं। इनमें से कुछ रसायनों को मानव स्वास्थ्य और पर्यावरण पर संभावित प्रभावों के कारण नियंत्रित किया जाता है।

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बड़े टुकड़ों से बनते हैं माइक्रोप्लास्टिक

जब प्लास्टिक समुद्र में पहुंचता है तो धूप, लहरों और अन्य प्राकृतिक प्रक्रियाओं के कारण धीरे-धीरे टूटने लगता है। बड़े प्लास्टिक के टुकड़े छोटे-छोटे कणों में बदल सकते हैं। पांच मिमी से छोटे प्लास्टिक कणों को आम तौर पर माइक्रोप्लास्टिक कहा जाता है।

माइक्रोप्लास्टिक बहुत छोटे होने के कारण समुद्र में ज्यादा दूर तक फैल सकते हैं। प्लास्टिक के छोटे टुकड़े होने पर उनका कुल सतह क्षेत्र भी बढ़ जाता है। इसका मतलब है कि उनके अंदर मौजूद रसायन बाहर निकल सकते हैं। साथ ही, आसपास के पानी और दूसरे पदार्थों में मौजूद रसायन भी इन छोटे प्लास्टिक कणों की सतह पर जमा हो सकते हैं।

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एचबीसीडी युक्त माइक्रोप्लास्टिक समुद्र में लंबे समय तक घूमकर रसायनों के द्वितीयक स्रोत के रूप में काम कर सकता है।

जापान में किया गया अध्ययन

जापान के नेशनल इंस्टीट्यूट फॉर एनवायरनमेंटल स्टडीज के शोधकर्ताओं ने इस समस्या का अध्ययन किया। इसमें टोक्यो यूनिवर्सिटी ऑफ मरीन साइंस एंड टेक्नोलॉजी और नागासाकी यूनिवर्सिटी के शोधकर्ता भी शामिल थे।

शोधकर्ताओं ने जापान के अलग-अलग समुद्री और नदी क्षेत्रों से प्लास्टिक के नमूने एकत्र किए। इनमें टोक्यो बे, जेनकाई सागर, प्रशांत तटीय क्षेत्र, होक्काइडो के पास का समुद्र और जापान सागर के तटीय क्षेत्र शामिल थे। बड़े प्लास्टिक कचरे में बैग, रस्सियां, जाल और प्लास्टिक के कठोर टुकड़े शामिल थे। शोधकर्ताओं ने प्लास्टिक का प्रकार पहचाना और उसमें मौजूद रसायनों की जांच की। इसके बाद उन्होंने कई तरह के रसायनों की पहचान की।

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तीन रसायनों पर खास ध्यान

अध्ययन में कई रसायन मिले, लेकिन शोधकर्ताओं ने तीन समूहों पर विशेष ध्यान दिया। इनमें इरगाफोस 168 से जुड़े रसायन, डीईएचपी और एचबीसीडी शामिल हैं।

इरगाफोस 168 एक एंटीऑक्सीडेंट है। इसका इस्तेमाल पॉलीएथिलीन और पॉलीप्रोपाइलीन जैसे प्लास्टिक को खराब होने से बचाने के लिए किया जाता है। अध्ययन में इसके वितरण में प्लास्टिक के प्रकार और कणों के आकार के अनुसार अंतर पाया गया। इससे संकेत मिलता है कि यह रसायन प्लास्टिक से बाहर निकलने के साथ-साथ पर्यावरण में बदल भी सकता है।

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डीईएचपी एक प्लास्टिसाइजर है, जिसका इस्तेमाल खास तौर पर लचीले पीवीसी उत्पादों में किया जाता रहा है। यह माइक्रोप्लास्टिक और बड़े प्लास्टिक कचरे दोनों में काफी मात्रा में पाया गया। कुछ नमूनों में इसकी मात्रा 1,000 माइक्रोग्राम प्रति ग्राम से भी ज्यादा थी।

माइक्रोप्लास्टिक आसपास के रसायन भी जमा कर सकता है

शोध की एक महत्वपूर्ण बात यह है कि माइक्रोप्लास्टिक केवल अपने अंदर मौजूद रसायनों को ही नहीं ढोता। उसके आसपास के पानी, मिट्टी जैसे कणों और जैविक पदार्थों में मौजूद रसायन भी उसकी सतह पर चिपक सकते हैं। यानी प्लास्टिक समुद्र में पहुंचने के बाद भी रासायनिक पदार्थों के संपर्क में आता रहता है। इससे माइक्रोप्लास्टिक एक तरह से रसायनों के वाहक का काम कर सकता है।

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एचबीसीडी से भी चिंता

शोधकर्ताओं को कुछ समुद्री क्षेत्रों से मिले माइक्रोप्लास्टिक में एचबीसीडी नाम का फ्लेम रिटार्डेंट भी मिला। इसकी मात्रा 110 से 590 माइक्रोग्राम प्रति ग्राम तक थी। एचबीसीडी लंबे समय तक पर्यावरण में बना रह सकता है और जीवों के शरीर में जमा होने की क्षमता रखता है। इसी कारण इसे स्थायी जैविक प्रदूषकों में शामिल किया गया है।

केवल प्लास्टिक हटाना काफी नहीं

अध्ययन से साफ है कि प्लास्टिक के छोटे टुकड़ों में बदल जाने के बाद भी रासायनिक खतरा खत्म नहीं होता। कुछ रसायन प्लास्टिक से बाहर निकल सकते हैं, जबकि कुछ दूसरे रसायन पर्यावरण से प्लास्टिक पर जमा हो सकते हैं।

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इसलिए समुद्री प्लास्टिक प्रदूषण से निपटने के लिए केवल समुद्र से कचरा हटाना पर्याप्त नहीं होगा। प्लास्टिक के रिसाव को रोकना, कचरे को सही तरीके से अलग करना, उसका उचित उपचार करना और खतरनाक रसायनों वाले प्लास्टिक की पहचान करना भी जरूरी है।

यह अध्ययन वैज्ञानिक पत्रिका एनवायर्नमेंटल साइंस एंड टेक्नोलॉजी में प्रकाशित किया गया है। शोधकर्ताओं का कहना है कि आगे यह समझना जरूरी है कि माइक्रोप्लास्टिक से जुड़े ये रसायन समुद्री जीवों के शरीर में कितनी मात्रा में पहुंचते हैं और उनका पर्यावरण पर कितना असर पड़ता है। यह शोध प्लास्टिक प्रदूषण और रासायनिक प्रबंधन को एक साथ देखने की जरूरत को मजबूत करता है।

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