

नेपाल में 26 अगस्त 2026 को आई विनाशकारी बाढ़ ने सिर्फ घरों, सड़कों और पुलों को नहीं बहाया, बल्कि हजारों ग्रामीण परिवारों की आजीविका और खाद्य सुरक्षा की नींव भी हिला दी है।
संयुक्त राष्ट्र खाद्य एवं कृषि संगठन (एफएओ) के प्रारंभिक आकलन के मुताबिक, बाढ़ से करीब 1,800 हेक्टेयर फसलें प्रभावित हुई हैं और लगभग 7,700 टन कृषि उत्पादन के नुकसान का अंदेशा है।
सबसे बड़ी चोट धान की फसल को लगी है। इसके साथ ही 11 प्रभावित नगरपालिकाओं में 5 से 10 फीसदी पशुधन और मुर्गियों के नष्ट होने का अनुमान है।
बाढ़ का पानी उतर चुका है, लेकिन किसानों के सामने संकट अब और गहरा हो रहा है। खेतों में जमा गाद, जमीन का कटाव, क्षतिग्रस्त सिंचाई और जल निकासी व्यवस्था तथा 41 पुलों के नष्ट होने से अगली फसल की तैयारी मुश्किल हो गई है।
सबसे बड़ी चिंता यह है कि बुआई का समय तेजी से निकल रहा है। यदि समय रहते खेत तैयार नहीं हुए और किसानों तक बीज, उपकरण, सिंचाई और पशु चिकित्सा सहायता नहीं पहुंची, तो इस आपदा का असर एक फसल तक सीमित नहीं रहेगा।
नेपाल के किसानों के लिए अब राहत से ज्यादा जरूरी है—समय पर कृषि बहाली, क्योंकि बुआई इंतजार नहीं करती।
नेपाल में 26 अगस्त 2026 को अचानक आई विनाशकारी बाढ़ ने सिर्फ घर और सड़कें नहीं बहाईं, बल्कि हजारों ग्रामीण परिवारों की रोजी-रोटी का आधार भी छीन लिया।
भोटे कोशी और त्रिशूली नदी गलियारे में आई बाढ़ में 1,000 से अधिक लोगों की मौत की पुष्टि हो चुकी है और हजारों लोग अब भी लापता बताए जा रहे हैं। वहीं बड़ी संख्या में लोगों को अपने घर छोड़ने पड़े हैं।
हालांकि विनाश की पटकथा बस इतनी नहीं है, बाढ़ का पानी उतरने के साथ तबाही की दूसरी तस्वीर भी सामने आ रही है, कीचड़ और गाद में दबे खेत, बह चुके तालाब, मवेशियों की लाशें और बुरी तरह क्षतिग्रस्त कृषि ढांचा इस आपदा की विभीषिका को बयां कर रहे हैं।
खेतों में गाद, घरों में मातम, आजीविका पर संकट
संयुक्त राष्ट्र खाद्य एवं कृषि संगठन (एफएओ) के प्रारंभिक आकलन के मुताबिक, इस बाढ़ से करीब 1,800 हेक्टेयर में फसलों को नुकसान पहुंचा है, जिसमें ज्यादातर धान के खेत हैं। इससे करीबन 7,700 टन कृषि उत्पादन के नुकसान का अंदेशा है।
भले ही बाढ़ का पानी उतर चुका हो लेकिन किसानों की मुश्किलें खत्म नहीं हुई हैं। देखा जाए तो किसानों के लिए यह सिर्फ एक फसल का नुकसान नहीं। खेत में खड़ी फसल के साथ उनकी आने वाले महीनों की आय और परिवार के भोजन की सुरक्षा भी बह गई है।
जिन खेतों पर मोटी गाद जम गई है या जो कटाव की चपेट में आए हैं, उन्हें अगली फसल के लिए तैयार करना भी बड़ी चुनौती होगी। चिंता यह है कि सिंचाई और जल निकासी की व्यवस्थाएं भी इस बाढ़ से बुरी तरह क्षतिग्रस्त हुई हैं।
हजारों पशु मरे, ग्रामीण अर्थव्यवस्था को गहरी चोट
एफएओ के मुताबिक बाढ़ ने पशुपालन पर भी गंभीर चोट की है। प्रभावित 11 नगरपालिकाओं में बाढ़ से पहले 350,000 से अधिक गाय, भैंस, भेड़ और बकरियां और करीब 16 लाख मुर्गियां थीं। प्रारंभिक अनुमान दर्शाते हैं कि इनमें से 5 से 10 फीसदी पशुधन और मुर्गियों का पूरी तरह नुकसान हुआ है। वहीं हजारों मवेशियों के मारे जाने की खबर है।
ग्रामीण परिवारों के लिए पशु केवल खाने का साधन नहीं हैं। दूध, अंडे और मांस के अलावा वे परिवार की नियमित आय और भविष्य की उत्पादन क्षमता का भी आधार होते हैं। इसलिए एक पशु की मौत का मतलब परिवारों के लिए रोज की कमाई का खत्म होना भी है।
बाढ़ के बाद बचे हुए पशुओं में बीमारी फैलने का खतरा भी बढ़ गया है। ऐसे में पशु चिकित्सा सेवाएं, टीकाकरण, उपचार और चारे की तत्काल जरूरत है।
चरमराया बुनियादी ढांचा, खेतों तक मदद पहुंचाना मुश्किल
एफएओ की उप महानिदेशक बेथ बेचडोल ने अपने इंटरव्यू में जानकारी दी है कि बाढ़ ने कृषि को बाजार से जोड़ने वाले बुनियादी ढांचे को भी नुकसान पहुंचाया है। 41 पुलों के नष्ट होने की खबर है, जबकि कई सड़कें क्षतिग्रस्त हैं। इससे प्रभावित गांवों तक भोजन, पशु आहार, दूध और कृषि सामग्री पहुंचाना मुश्किल हो गया है।
इसका सीधा असर किसानों की आने वाले दिनों में उत्पादन शुरू करने की क्षमता पर पड़ सकता है।
एफएओ के आकलन में खेतों पर जमा गाद और मिट्टी, जमीन के कटाव तथा कृषि भूमि में हुए बदलावों को भी दर्ज किया जा रहा है। संगठन उपग्रह से प्राप्त तस्वीरों और रिमोट सेंसिंग तकनीक के जरिए यह पता लगाने की कोशिश कर रहा है कि बाढ़ ने कितनी जमीन को प्रभावित किया और कौन से खेत जल्द खेती के लिए तैयार किए जा सकते हैं।
तेजी से हाथ से निकल रहा है अगली बुआई का समय
विशेषज्ञों के मुताबिक अब सबसे बड़ी चुनौती अगली बुआई का मौसम है। राहत कार्य तत्काल जरूरतों - भोजन, सुरक्षित पानी, आश्रय और स्वच्छता पर केंद्रित हैं, लेकिन कृषि को समय के साथ चलना होगा।
देखा जाए तो बुआई का मौसम किसी आपदा के खत्म होने का इंतजार नहीं करता। विशेषज्ञों ने अंदेशा जताया है कि अगर किसान समय पर खेत तैयार नहीं कर पाए, बीज नहीं मिले या सिंचाई और जल निकासी की व्यवस्था बहाल नहीं हुई, तो इस बाढ़ का असर एक फसल तक सीमित नहीं रहेगा।
ऐसे में किसानों को अगली फसल के साथ-साथ अपनी आय भी गंवानी पड़ सकती है।
इसलिए कृषि बहाली का मतलब केवल किसानों को बीज बांटना नहीं है। जिन खेतों में गाद भर गई है, उन्हें दोबारा उपयोगी बनाना होगा, क्षतिग्रस्त सिंचाई और जल निकासी व्यवस्था की मरम्मत करनी होगी और किसानों को समय रहते बीज तथा कृषि उपकरण उपलब्ध कराने होंगे।
बुआई इंतजार नहीं करती, किसानों के पास वक्त कम
रिपोर्ट से पता चला है कि एफएओ ने बाढ़ के करीब 24 घंटे के भीतर प्रभावित क्षेत्रों में आपातकालीन टीमें भेजी थीं। इनमें पशु चिकित्सक भी शामिल थे।
घायल पशुओं के उपचार के लिए दवाएं दी गई हैं और पशु रोगों के जोखिम तथा चारे की जरूरत का आकलन किया जा रहा है। इसके साथ ही नेपाल सरकार के अनुरोध पर एफएओ कृषि क्षेत्र को हुए नुकसान और क्षति का विस्तृत आकलन भी कर रहा है।
इसका उद्देश्य ऐसी पुनर्बहाली योजना तैयार करना है, जिसमें किसानों, पशुपालकों और मछली पालन से जुड़े परिवारों की जरूरतों को प्राथमिकता दी जा सके।
आपदा के बाद असली परीक्षा
आने वाले दिनों में मदद का फोकस क्षतिग्रस्त सिंचाई व्यवस्था की मरम्मत, किसानों तक बीज और उपकरण पहुंचाने, बचे हुए पशुओं को चारा और चिकित्सा सुविधा देने तथा मछली पालन और स्थानीय बाजारों को फिर से शुरू करने पर रहेगा।
नेपाल की यह बाढ़ याद दिलाती है कि किसी आपदा में घर खोना एक त्रासदी है, लेकिन आजीविका खोना उस त्रासदी को लंबे संकट में बदल सकता है।
किसानों के लिए खेत सिर्फ जमीन का एक टुकड़ा नहीं होता। वह परिवार का भोजन, बच्चों की पढ़ाई, घर की आय और भविष्य की उम्मीद होता है। इसलिए जब खेत फिर से उपजने लगता है, तो केवल फसल वापस नहीं आती, एक परिवार के पैरों पर खड़े होने की उम्मीद भी लौटती है।