

केरल के पलक्कड़ जिले में प्रस्तावित ग्रेनाइट खदान की पर्यावरण मंजूरी पर नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (एनजीटी) ने फिलहाल के लिए रोक लगा दी है।
6 अक्टूबर 2026 को दिए आदेश में ट्रिब्यूनल की दक्षिणी पीठ ने 2.6262 हेक्टेयर क्षेत्र में खनन के लिए 'ट्रॉपिकल ग्रेनाइट्स' को 12 मार्च 2024 को दी गई पर्यावरण मंजूरी फिलहाल रद्द कर दी।
पीठ ने स्पष्ट किया कि आसपास की खदानों से पर्यावरण, जल संसाधनों और स्थानीय आबादी पर पड़ने वाले सामूहिक प्रभावों का आकलन किए बिना मंजूरी बरकरार नहीं रखी जा सकती।
एनजीटी ने खनन से होने वाली पत्थरों की ढुलाई, यातायात, भूजल रिचार्ज और स्थानीय जल व्यवस्था पर पड़ने वाले प्रभावों की विस्तृत जांच के निर्देश दिए हैं।
केरल सरकार को चार महीने के भीतर जिला सर्वेक्षण रिपोर्ट तैयार करनी होगी, जिसमें जंगलों, कृषि, बागवानी और खनन भूमि का ब्योरा शामिल होगा। इसके बाद ही राज्य स्तरीय पर्यावरण प्रभाव आकलन प्राधिकरण मंजूरी पर दोबारा विचार कर सकेगा।
मामले में अपीलकर्ता ने पर्यावरणीय आकलन से जुड़ी अहम जानकारियां छिपाने का आरोप भी लगाया है। साथ ही, क्षेत्र में मेगालिथिक काल से जुड़े पुरातात्विक स्थलों की मौजूदगी का हवाला देते हुए उनकी सुरक्षा को लेकर चिंता जताई है।
यह आदेश रेखांकित करता है कि खनन की अनुमति देने से पहले पर्यावरण, जल संसाधनों और ऐतिहासिक विरासत पर पड़ने वाले प्रभावों की व्यापक जांच जरूरी है।
केरल के पलक्कड़ जिले में प्रस्तावित ग्रेनाइट खदान को मिली पर्यावरण मंजूरी को लेकर नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (एनजीटी) ने सवाल उठाए हैं।
इस मामले में 6 अक्टूबर 2026 को सुनवाई हुई थी। इस दौरान अपने आदेश में ट्रिब्यूनल की दक्षिणी पीठ ने 2.6262 हेक्टेयर क्षेत्र में खनन के लिए 12 मार्च 2024 को दी गई पर्यावरण मंजूरी (एनवायरनमेंटल क्लीयरेंस) को फिलहाल के लिए रद्द कर दिया है। बता दें कि खनन की यह मंजूरी 'ट्रॉपिकल ग्रेनाइट्स' को दी गई थी।
पीठ ने स्पष्ट किया कि जब तक खनन से क्षेत्र में पर्यावरण पर पड़ने वाले सामूहिक प्रभावों का आकलन नहीं किया जाता, तब तक इस मंजूरी को बरकरार नहीं रखा जा सकता।
यह पूरा मामला पलक्कड़ जिले के कुथन्नूर (या कुथानूर) गांव में प्रस्तावित ग्रेनाइट बिल्डिंग स्टोन खदान से जुड़ा है। एनजीटी ने कहा कि किसी एक खदान के प्रभाव को अलग-अलग देखकर फैसला करना पर्याप्त नहीं है। आसपास की खदानों से पर्यावरण, जल संसाधनों और स्थानीय आबादी पर पड़ने वाले असर को भी समझना बेहद जरूरी है।
एनजीटी ने विशेष रूप से खनन से निकलने वाले पत्थरों की ढुलाई, यातायात से जुड़ी समस्याओं, भूजल रिचार्ज, रिप्लेनिशमेंट और जल संसाधनों की भरपाई जैसे पहलुओं का अध्ययन करने का निर्देश दिया।
इसके साथ ही पूरे खनन क्षेत्र का हाइड्रोजियोलॉजिकल अध्ययन भी जरूरी बताया, ताकि यह समझा जा सके कि खनन से स्थानीय जल व्यवस्था पर क्या असर पड़ सकता है।
ऐसे में एनजीटी ने केरल सरकार को चार महीने के भीतर जिला सर्वेक्षण रिपोर्ट (डीएसआर) तैयार करने का निर्देश दिया है। इसमें जिले की सामान्य स्थिति के साथ जंगलों, कृषि, बागवानी और खनन के लिए इस्तेमाल होने वाली जमीन का विस्तृत ब्योरा शामिल करना होगा।
इसके बाद राज्य स्तरीय पर्यावरण प्रभाव आकलन प्राधिकरण (एसईआईएए) को सभी पहलुओं पर संतुष्ट होने के बाद ही पर्यावरण मंजूरी दोबारा जारी करने पर विचार करना होगा।
बता दें कि यह पूरा मामला पलक्कड़ के अलाथुर तालुक के कुथानूर गांव में 2.6262 हेक्टेयर में प्रस्तावित ग्रेनाइट बिल्डिंग स्टोन क्वारी प्रोजेक्ट के लिए ‘बी 1 (ए)’ कैटेगरी के तहत 'ट्रॉपिकल ग्रेनाइट्स' को पर्यावरण मंजूरी देने से जुड़ा है।
अपीलकर्ता ने आरोप लगाया है कि परियोजना प्रस्तावक ने पर्यावरण मंजूरी के लिए आवेदन करते समय पर्यावरणीय आकलन से जुड़ी महत्वपूर्ण जानकारियां छिपाई थीं।
अपील में इस बात का भी जिक्र किया गया है कि कुनाथुर पंचायत के मुप्पुझा गांव में मेगालिथिक काल से जुड़े कई महत्वपूर्ण पुरातात्विक (आर्कियोलॉजिकल) स्थल हैं। यह साइट्स क्षेत्र की ऐतिहासिक और सांस्कृतिक विरासत का हिस्सा हैं, इसलिए खनन संबंधी फैसले से पहले उनकी मौजूदगी और संभावित प्रभावों की उचित जांच जरूरी है।
देखा जाए तो एनजीटी का यह आदेश इस बात को रेखांकित करता है कि खनन परियोजनाओं का आकलन केवल जमीन के एक टुकड़े तक सीमित नहीं रह सकता। पहाड़ियों, भूजल, परिवहन और ऐतिहासिक धरोहरों से जुड़े प्रभावों को समझे बिना लिया गया फैसला स्थानीय पर्यावरण और समुदायों के लिए जोखिम पैदा कर सकता है।