

नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल ने बांदा के लौमार गांव में अवैध खनन पर सख्त रुख अपनाया है।
यूपीपीसीबी की रिपोर्ट में खामियां पाई गईं, जिसके चलते ट्रिब्यूनल ने सभी संबंधित पक्षों से विस्तृत जवाब मांगा है। जिलाधिकारी और पुलिस अधीक्षक को सख्त निर्देश दिए गए हैं कि वे सस्टेनेबल सैंड माइनिंग मैनेजमेंट गाइडलाइंस का पालन करें।
वहीं एक अन्य मामले में सामने आया है कि मध्य प्रदेश के नर्मदापुरम जिले में पचमढ़ी स्थित चंपक झील पर प्रदूषण और अनियंत्रित व्यावसायिक गतिविधियों का गंभीर खतरा मंडरा रहा है।
इस बारे में आवेदक ने अपनी याचिका में कहा है कि चंपक झील में बार-बार बिना ट्रीट किया पानी छोड़ा जा रहा है। साथ ही इसमें कचरा भी फेंका जा रहा है, जिससे झील की पारिस्थितिकी पर बुरा असर पड़ रहा है। यह भी आरोप है कि झील के भीतर और आसपास चल रही गतिविधियां उसके प्राकृतिक स्वरूप को नुकसान पहुंचा रही हैं।
नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (एनजीटी) ने उत्तर प्रदेश के बांदा जिले की पैलानी तहसील स्थित ग्राम पंचायत लौमार में चल रहे कथित अवैध खनन के मामले में कड़ा रुख अपनाया है।
27 जनवरी 2026 को हुई सुनवाई में ट्रिब्यूनल ने इस मामले में सभी संबंधित पक्षों से विस्तृत जवाब दाखिल करने के निर्देश दिए। एमिकस क्यूरी ने अदालत को बताया है कि इलाके में अवैध खनन हो रहा है। सुनवाई के दौरान ट्रिब्यूनल ने कहा है कि उत्तर प्रदेश प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (यूपीपीसीबी) द्वारा दाखिल हलफनामे में काफी कमियां हैं।
यह हलफनामा 23 जनवरी 2026 को दाखिल किया गया था। अदालत ने कहा कि क्षेत्रीय अधिकारी ने पर्यावरणीय स्वीकृति (ईसी) और संचालन की अनुमति (सीटीओ) से जुड़ी शर्तों तथा पहले दिए गए निर्देशों के पालन से जुड़े जरूरी पहलुओं की सही तरीके से जांच ही नहीं की है।
हालांकि प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के वकील ने अदालत से अनुपालन रिपोर्ट दाखिल करने के लिए चार सप्ताह का समय मांगा, जिसे अदालत ने स्वीकार कर लिया है। खनन संचालक ने भी पर्यावरण सम्बन्धी मानकों, पर्यावरण मंजूरी और सीटीओ की शर्तों के पालन से जुड़े सभी जरूरी दस्तावेजों के साथ अतिरिक्त जवाब दाखिल करने के लिए चार सप्ताह की मोहलत मांगी है।
एनजीटी ने बांदा के जिलाधिकारी और पुलिस अधीक्षक को भी सख्त निर्देश देते हुए कहा कि वे सस्टेनेबल सैंड माइनिंग मैनेजमेंट गाइडलाइंस, 2016 और सैंड माइनिंग के लिए प्रवर्तन एवं निगरानी दिशानिर्देश, 2020 के तहत सभी जरूरी कदम उठाएं और अलग-अलग कार्रवाई रिपोर्ट दाखिल करें।
ट्रिब्यूनल ने यह भी स्पष्ट किया कि जिलाधिकारी अपनी रिपोर्ट में जिला टास्क फोर्स द्वारा किए गए औचक निरीक्षणों, उनकी बैठकों और उन पर हुई कार्रवाई का पूरा विवरण दें। इस मामले में खनन संचालक का अतिरिक्त जवाब, यूपीपीसीबी की नई रिपोर्ट, जिलाधिकारी और पुलिस अधीक्षक की कार्रवाई रिपोर्ट तथा एमिकस क्यूरी की रिपोर्ट चार सप्ताह के भीतर दाखिल करनी होगी।
पचमढ़ी: संकट में चंपक झील, प्रदूषण और पर्यटन गतिविधियों पर एनजीटी सख्त
मध्य प्रदेश के नर्मदापुरम जिले में पचमढ़ी स्थित चंपक झील पर प्रदूषण और अनियंत्रित व्यावसायिक गतिविधियों का गंभीर खतरा मंडरा रहा है। 23 जनवरी 2026 को नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (एनजीटी) की केंद्रीय पीठ में इस संबंध में दाखिल याचिका पर सुनवाई हुई। इस मामले की गंभीरता को देखते हुए एनजीटी ने चार सदस्यीय संयुक्त समिति के गठन का निर्देश दिया है।
इस समिति में मध्य प्रदेश के पर्यावरण विभाग के मुख्य सचिव, राज्य आर्द्रभूमि प्राधिकरण, नर्मदापुरम के डिविजनल फॉरेस्ट ऑफिसर और मध्य प्रदेश प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के प्रतिनिधि शामिल होंगे।
समिति को साइट का निरीक्षण कर चार सप्ताह के भीतर तथ्यात्मक रिपोर्ट और अब तक की गई कार्रवाई की जानकारी एनजीटी को सौंपनी होगी।
आवेदक ने अपनी याचिका में कहा है कि चंपक झील में बार-बार बिना ट्रीट किया पानी छोड़ा जा रहा है। साथ ही इसमें कचरा भी फेंका जा रहा है, जिससे झील की पारिस्थितिकी पर बुरा असर पड़ रहा है। यह भी आरोप है कि झील के भीतर और आसपास चल रही गतिविधियां उसके प्राकृतिक स्वरूप को नुकसान पहुंचा रही हैं।
याचिका के अनुसार, अक्टूबर 2013 में चंपक झील पर एडवेंचरस स्पोर्ट्स एक्टिविटी शुरू करने के लिए सतपुड़ा एडवेंचर स्पोर्ट्स क्लब को अनुमति दी गई थी, इसे बाद में आगे भी बढ़ाया जाता रहा है। इसके अलावा सितंबर 2015 में जिपलाइन लगाने की अनुमति भी दी गई थी, जो आज तक प्रभावी है।
याचिका में यह भी कहा गया है कि नर्मदापुरम डिस्ट्रिक्ट आर्कियोलॉजिकल, टूरिज्म एंड कल्चर काउंसिल झील के आसपास पर्यटन से जुड़ी सांस्कृतिक और व्यावसायिक गतिविधियों को बढ़ावा दे रही है, जिससे इस जलस्रोत की पारिस्थितिकी को गंभीर नुकसान पहुंच रहा है।
याचिकाकर्ता राखी बाला सिंगारे का कहना है चंपक झील का कुल क्षेत्रफल 43.4 हेक्टेयर है। सुप्रीम कोर्ट के दिशा-निर्देशों के अनुसार 2.25 हेक्टेयर या उससे अधिक क्षेत्रफल वाले किसी भी जल स्रोत को आर्द्रभूमि (वेटलैंड) के रूप में दर्ज किया जाना चाहिए, लेकिन इसके बावजूद चंपक झील को पर्याप्त संरक्षण नहीं मिल पा रहा है।