

भारत सहित दुनिया भर में स्वास्थ्य सेवाओं की जरूरत तेजी से बढ़ रही है, लेकिन मरीजों की देखभाल करने वाले हाथ अब भी कम पड़ रहे हैं।
द लैंसेट पब्लिक हेल्थ में प्रकाशित नई रिपोर्ट के मुताबिक, वैश्विक स्वास्थ्य कार्यबल 1990 से 2023 के बीच करीब तीन गुना बढ़कर 12.21 करोड़ हो गया, लेकिन जरूरी स्वास्थ्य सेवाएं सभी तक पहुंचाने के लिए दुनिया को अभी भी 3.44 करोड़ अतिरिक्त स्वास्थ्यकर्मियों की जरूरत है।
भारत में भी स्थिति गंभीर है, जहां जरूरत पूरी करने के लिए करीब 19 लाख अतिरिक्त डॉक्टरों और 76 लाख नर्सों व दाइयों की दरकार है।
भारत में प्रति 10,000 लोगों पर केवल 10.5 डॉक्टर और 10.8 नर्स उपलब्ध हैं। मानसिक स्वास्थ्य, पोषण और पुनर्वास जैसे क्षेत्रों में विशेषज्ञों की संख्या और भी कम है। रिपोर्ट यह भी बताती है कि स्वास्थ्य व्यवस्था का बड़ा बोझ महिलाओं के कंधों पर है।
वैश्विक स्तर पर करीब 69 फीसदी और भारत में 62 फीसदी स्वास्थ्यकर्मी महिलाएं हैं, लेकिन नेतृत्व और बेहतर वेतन वाले कई पेशों में उनकी हिस्सेदारी सीमित है।
स्पष्ट है कि मजबूत स्वास्थ्य व्यवस्था के लिए केवल अस्पताल बढ़ाना नहीं, बल्कि डॉक्टरों, नर्सों और विशेषज्ञों में बड़े पैमाने पर निवेश करना होगा। आखिरकार, स्वास्थ्यकर्मी केवल आंकड़े नहीं, बल्कि करोड़ों मरीजों के लिए उम्मीद और जीवनरेखा हैं।
भारत में डॉक्टरों और नर्सों की कमी का सवाल केवल स्वास्थ्य व्यवस्था का आंकड़ा नहीं, बल्कि करोड़ों मरीजों की समय पर इलाज पाने की उम्मीद से जुड़ा है।
एक नई वैश्विक रिपोर्ट से पता चला है कि देश को सभी लोगों तक जरूरी स्वास्थ्य सेवाएं पहुंचाने के लिए करीब 19 लाख अतिरिक्त डॉक्टरों और 76 लाख नर्सों व दाइयों की जरूरत है। महिलाओं के कंधों पर टिकी भारत की स्वास्थ्य व्यवस्था में डॉक्टरों और विशेषज्ञ स्वास्थ्यकर्मियों की कमी आज भी बड़ी चुनौती बनी हुई है।
द लैंसेट पब्लिक हेल्थ में प्रकाशित नई रिपोर्ट के मुताबिक, भारत सहित दुनिया भर में स्वास्थ्यकर्मियों की कुल संख्या तो पिछले दशकों में बढ़ी है, लेकिन आबादी के अनुपात में उनकी उपलब्धता अभी भी जरूरत से काफी कम है। इसी तरह रिपोर्ट में साझा रुझानों को देखें तो देश में स्वास्थ्य कर्मियों की संख्या अभी भी अमेरिका, चीन जैसे देशों की तुलना में काफी कम है।
भारत में हर 10,000 लोगों पर औसतन 73 स्वास्थ्यकर्मी
रिपोर्ट के मुताबिक, भारत में प्रति 10,000 आबादी पर औसतन करीब 73.1 स्वास्थ्यकर्मी उपलब्ध हैं। इनमें 10.5 डॉक्टर, 10.8 नर्स, 8.1 फार्मासिस्ट और फार्मास्यूटिकल सहायक, 2.5 दंत चिकित्सक और सहायक तथा 1.2 दाई या प्रसूति देखभाल कर्मी शामिल हैं।
इसके अलावा 16.2 सामुदायिक स्वास्थ्यकर्मी और करीब 24 अन्य स्वास्थ्यकर्मी शामिल हैं।
हालांकि इन आंकड़ों के पीछे विशेषज्ञ स्वास्थ्यकर्मियों की कमी की एक चिंताजनक तस्वीर भी छिपी है। भारत में प्रति 10,000 लोगों पर आहार विशेषज्ञ, पोषण विशेषज्ञ और मनोवैज्ञानिकों की संख्या महज 0.3 है। पर्यावरण स्वास्थ्यकर्मी और पारंपरिक चिकित्सा विशेषज्ञों की संख्या 0.5 से भी कम है, जबकि ऑप्टोमेट्रिस्ट और ऑप्टिशियन केवल 0.7 हैं।
इसी तरह फिजियोथेरेपिस्ट और प्रोस्थेटिक तकनीशियन 1.6, मेडिकल इमेजिंग व उपकरण तकनीशियन 1.4 और क्लिनिकल ऑफिसर व मेडिकल असिस्टेंट केवल 2.4 प्रति 10,000 आबादी पर उपलब्ध हैं। मेडिकल लैब टेक्नीशियनों की संख्या 3.1, ऑडियोलॉजिस्ट, स्पीच थेरेपिस्ट और काउंसलर 4.8 तथा होम-बेस्ड व्यक्तिगत देखभाल कर्मियों की संख्या 8.6 है।
ये आंकड़े बताते हैं कि भारत में स्वास्थ्य सेवाओं की बढ़ती जरूरतों के मुकाबले केवल डॉक्टरों और नर्सों की नहीं, बल्कि मानसिक स्वास्थ्य, पोषण, पुनर्वास और अन्य विशेषज्ञ सेवाओं से जुड़े पेशेवरों की भी भारी जरूरत है।
चीन और अमेरिका से काफी पीछे भारत
स्वास्थ्यकर्मियों की उपलब्धता के मामले में भारत अन्य बड़े देशों से काफी पीछे है। चीन में प्रति 10,000 आबादी पर करीब 129 स्वास्थ्यकर्मी हैं, जिनमें 31 से अधिक डॉक्टर और करीब 51 नर्स शामिल हैं। इसके विपरीत भारत में डॉक्टरों की संख्या 10.5 और नर्सों की संख्या 10.8 प्रति 10,000 है।
अमेरिका में तस्वीर और भी अलग है, जहां प्रति 10,000 लोगों पर करीब 678 स्वास्थ्यकर्मी उपलब्ध हैं। इनमें करीब 30 डॉक्टर और 161 नर्सिंग स्टाफ शामिल हैं।
महिलाओं के कंधों पर टिकी है भारत की स्वास्थ्य व्यवस्था
भारत सहित दुनिया में स्वास्थ्य सेवाओं की असली ताकत महिलाएं हैं। अस्पतालों में मरीजों की देखभाल से लेकर गांवों और दूरदराज के इलाकों तक स्वास्थ्य सेवाएं पहुंचाने वाली नर्सों, दाइयों और सामुदायिक स्वास्थ्यकर्मियों में महिलाओं की बड़ी हिस्सेदारी है।
रिपोर्ट के मुताबिक, भारत के कुल स्वास्थ्यकर्मियों में करीब 62 फीसदी महिलाएं हैं। हालांकि डॉक्टरों के मामले में उनकी हिस्सेदारी घटकर केवल 35.3 फीसदी रह जाती है। इसके विपरीत नर्सिंग स्टाफ में करीब 90 फीसदी और दाइयों व प्रसूति सहायकों में करीब 89 फीसदी महिलाएं हैं।
दंत चिकित्सकों में महिलाओं की हिस्सेदारी केवल 31 फीसदी है, जबकि दंत चिकित्सकों के सहायकों में करीब 83 फीसदी महिलाएं हैं। इसी तरह फार्मासिस्टों में महिलाओं की हिस्सेदारी 6 फीसदी से भी कम, यानी 5.2 फीसदी है।
यानी भारत में भी एक स्पष्ट असमानता दिखाई देती है। महिलाएं स्वास्थ्य सेवाओं का बड़ा हिस्सा संभाल रही हैं, लेकिन वे डॉक्टरों, फार्मासिस्टों और कई नेतृत्व वाले या बेहतर वेतन वाले पेशों में अब भी अपेक्षाकृत कम मौजूद हैं।
भारत की चुनौती दक्षिण एशिया के बड़े संकट का हिस्सा
रिपोर्ट के मुताबिक, दक्षिण एशिया स्वास्थ्यकर्मियों की सबसे गंभीर कमी वाले क्षेत्रों में से एक है। इस पूरे क्षेत्र को जरूरी स्वास्थ्य सेवाओं तक लोगों की पहुंच सुनिश्चित करने के लिए करीब 26 लाख अतिरिक्त डॉक्टरों और एक करोड़ नर्सों व दाइयों की जरूरत है।
वैश्विक स्तर पर सभी लोगों तक जरूरी स्वास्थ्य सेवाएं पहुंचाने के लिए दुनिया को 3.44 करोड़ अतिरिक्त स्वास्थ्यकर्मियों की जरूरत है। इसमें सबसे बड़ी कमी 2.39 करोड़ नर्सों और दाइयों की है। इसके अलावा दुनिया को 71 लाख डॉक्टर, 18 लाख दंत चिकित्सक और 16 लाख फार्मासिस्टों की अतिरिक्त जरूरत है।
रिपोर्ट के प्रमुख आंकड़े बताते हैं कि स्वास्थ्यकर्मियों की यह कमी केवल संख्या का संकट नहीं है। जब किसी अस्पताल में पर्याप्त डॉक्टर नहीं होते, किसी मरीज को नर्स नहीं मिलती या किसी गांव तक प्रशिक्षित स्वास्थ्यकर्मी नहीं पहुंच पाता, तो इसका असर सीधे किसी न किसी परिवार की जिंदगी पर पड़ता है।
वैश्विक स्वास्थ्य कार्यबल तीन गुना बढ़ा, महिलाओं ने निभाई सबसे बड़ी भूमिका
दुनिया भर में स्वास्थ्यकर्मियों की संख्या में पिछले तीन दशकों के दौरान बड़ी वृद्धि हुई है। 1990 से 2023 के बीच वैश्विक स्वास्थ्य कार्यबल करीब तीन गुना बढ़कर 4.09 करोड़ से 12.21 करोड़ हो गया। इस दौरान हुई कुल वृद्धि में 71.4 फीसदी योगदान महिलाओं का रहा।
2023 में दुनिया भर के स्वास्थ्यकर्मियों में 68.9 फीसदी, यानी लगभग हर 10 में से 7, महिलाएं थीं। पिछले 33 वर्षों में वैश्विक स्वास्थ्य कार्यबल में 8.1 करोड़ से अधिक लोग जुड़े, जिनमें 1.89 करोड़ नर्स और 87 लाख डॉक्टर शामिल हैं।
2023 में दुनिया में 3.32 करोड़ नर्स, 1.51 करोड़ डॉक्टर, 76 लाख सामुदायिक स्वास्थ्यकर्मी, 68 लाख फार्मासिस्ट और फार्मेसी सहायक तथा 61 लाख दंत चिकित्सक और उनके सहायक थे।
नर्सों में 80.7 फीसदी, दाइयों में 96 फीसदी और सामुदायिक स्वास्थ्यकर्मियों में 89.5 फीसदी महिलाएं थीं। हालांकि डॉक्टरों के पेशे में महिलाओं की हिस्सेदारी आधे से भी कम रही। दंत चिकित्सा और फार्मेसी में भी महिलाएं अक्सर विशेषज्ञ की बजाय सहायक की भूमिकाओं में ज्यादा दिखाई देती हैं।
रिपोर्ट से जुड़ी प्रमुख शोधकर्ता मेगन नाइट के मुताबिक, महिलाओं ने पिछले तीन दशकों में वैश्विक स्वास्थ्य कार्यबल की तस्वीर बदल दी है। लेकिन वे आज भी उन पेशों में ज्यादा केंद्रित हैं, जहां वेतन अपेक्षाकृत कम है और नेतृत्व के अवसर सीमित हैं।
उनके मुताबिक, मजबूत स्वास्थ्य व्यवस्था के लिए केवल नए स्वास्थ्यकर्मी जोड़ना पर्याप्त नहीं है। महिलाओं के लिए करियर में आगे बढ़ने, नेतृत्व संभालने और सुरक्षित व सहयोगी कार्यस्थल उपलब्ध कराना भी उतना ही जरूरी है।
स्वास्थ्यकर्मियों में निवेश के बिना नहीं बनेगी मजबूत स्वास्थ्य व्यवस्था
रिपोर्ट के मुताबिक, मध्यम स्तर के सार्वभौमिक स्वास्थ्य कवरेज के लिए प्रति 10,000 लोगों पर कम से कम 23.8 डॉक्टर, 64.5 नर्स और दाइयां, 5.2 दंत चिकित्सक और 5.6 फार्मासिस्ट होने चाहिए।
अध्ययन से जुड़ी वरिष्ठ शोधकर्ता डॉ. एनी हैकेनस्टैड के मुताबिक, स्वास्थ्यकर्मी हर स्वास्थ्य व्यवस्था की बुनियाद हैं। दुनिया भर में स्वास्थ्य कार्यबल तेजी से बढ़ा है, लेकिन यह बढ़ोतरी अभी भी हर व्यक्ति तक जरूरी स्वास्थ्य सेवाएं पहुंचाने के लिए पर्याप्त नहीं है।
शोधकर्ताओं का मानना है कि इस कमी को दूर करने के लिए स्वास्थ्यकर्मियों की शिक्षा, भर्ती, प्रशिक्षण और उन्हें नौकरी में बनाए रखने के साथ-साथ उनके कामकाजी हालात में भी लंबे समय तक निवेश करना होगा। महिलाओं की बड़ी भागीदारी को देखते हुए नेतृत्व के अवसर, कार्यस्थल पर सुरक्षा, सवैतनिक मातृत्व और अभिभावकीय अवकाश तथा लचीली कार्य व्यवस्था जैसी नीतियां भी जरूरी होंगी।
भारत के लिए यह चुनौती खास तौर पर महत्वपूर्ण है। दुनिया की सबसे बड़ी आबादी वाले देशों में शामिल भारत के लिए केवल स्वास्थ्यकर्मियों की संख्या बढ़ाना ही काफी नहीं होगा। देश को डॉक्टरों, नर्सों, पोषण विशेषज्ञों, मनोवैज्ञानिकों और अन्य विशेषज्ञ स्वास्थ्यकर्मियों की कमी भी दूर करनी होगी।
आखिरकार, अस्पताल या स्वास्थ्य केंद्र में काम करने वाला हर डॉक्टर, नर्स, दाई और स्वास्थ्यकर्मी केवल एक आंकड़ा नहीं, बल्कि किसी मरीज की उम्मीद और किसी परिवार के लिए जीवनरेखा है। इसलिए एक मजबूत स्वास्थ्य व्यवस्था का मतलब केवल अधिक अस्पताल बनाना नहीं, बल्कि यह सुनिश्चित करना भी है कि हर जरूरतमंद के पास उसकी देखभाल करने के लिए पर्याप्त और प्रशिक्षित हाथ मौजूद हों।