क्यों मानसिक तनाव से बढ़ जाता है बीमारियों का खतरा? वैज्ञानिक पड़ताल ने खोला रहस्य

नई वैज्ञानिक पड़ताल से पता चला है कि मानसिक तनाव शरीर की रक्षा करने वाले ‘नेचुरल किलर सेल्स’ को कमजोर कर देता है, जिससे कैंसर और अन्य बीमारियों का खतरा बढ़ सकता है।
क्यों मानसिक तनाव से बढ़ जाता है बीमारियों का खतरा? वैज्ञानिक पड़ताल ने खोला रहस्य
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सारांश
  • नए वैज्ञानिक शोध से पता चला है कि मानसिक तनाव और नींद की कमी शरीर की रोग-प्रतिरोधक क्षमता को कमजोर कर सकती है।

  • तैबा विश्वविद्यालय के अध्ययन में पाया गया कि चिंता और अनिद्रा से 'नेचुरल किलर सेल्स' की संख्या घटती है, जो कैंसर और अन्य बीमारियों से बचाव में अहम भूमिका निभाती हैं।

  • 'नेचुरल किलर सेल्स’ वे कोशिकाएं होती हैं जो हमें कैंसर जैसी बीमारियों से बचाती हैं।

नींद न आना और लगातार चिंता में डूबे रहना आज आम बात बन गई है। ऐसे में इन्हें अक्सर जीवनशैली से जुड़ी समस्या मानकर नजरअंदाज कर दिया जाता है। लेकिन अब वैज्ञानिक चेतावनी दे रहे हैं कि ये समस्याएं सिर्फ मानसिक नहीं हैं। ये दबे पांव शरीर की रोग-प्रतिरोधक क्षमता यानी उस सुरक्षा तंत्र को भी कमजोर कर रही हैं, जो हमें कैंसर और अन्य बीमारियों से बचाता है।

सऊदी अरब के तैबा विश्वविद्यालय और नुजूद मेडिकल सेंटर से जुड़े वैज्ञानिकों की नई पड़ताल बताती है कि इसकी एक बड़ी वजह शरीर के ‘नेचुरल किलर सेल्स’ की कमी हो सकती है।

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बता दें कि 'नेचुरल किलर सेल्स’ वे कोशिकाएं होती हैं जो हमें कैंसर जैसी बीमारियों से बचाती हैं।

अध्ययन में पाया गया कि जिन युवा महिलाओं में अनिद्रा के लक्षण थे, उनके शरीर में कुल नेचुरल किलर कोशिकाओं की संख्या कम थी। वहीं, जिन महिलाओं में चिंता के लक्षण दिखे, उनके शरीर में घूमने वाली (सर्कुलेटरी) नेचुरल किलर कोशिकाएं कम पाई गईं। इस अध्ययन के नतीजे जर्नल फ्रंटियर्स इन इम्म्यूनोलॉजी में प्रकाशित हुए हैं।

शोधकर्ताओं का कहना है कि ये नतीजे चिंता और नींद की कमी के शारीरिक नुकसान को समझने में मदद कर सकते हैं। साथ ही इम्यून सिस्टम से जुड़ी बीमारियों तथा कैंसर की रोकथाम के लिए नई रणनीतियों की दिशा दिखा सकते हैं।

शरीर के बॉडीगार्ड हैं नेचुरल किलर सेल्स

गौरतलब है कि ये नेचुरल किलर सेल्स हमारे इम्यून सिस्टम के पहले सुरक्षा प्रहरी होते हैं। ये शरीर में घुसने वाले वायरस, बैक्टीरिया और संक्रमित कोशिकाओं को शुरुआती चरण में ही नष्ट कर देते हैं, ताकि बीमारी फैल न सके। ये कोशिकाएं तो तरह की होती हैं, इनमें से कुछ रक्त के साथ पूरे शरीर में घूमती रहती हैं, जबकि कुछ अंगों और ऊतकों में रहती हैं।

अगर इन कोशिकाओं की संख्या कम हो जाए, तो रोग-प्रतिरोधक क्षमता कमजोर पड़ जाती है और शरीर बीमारियों के सामने असहाय हो जाता है।

यह अध्ययन 17 से 23 वर्ष की 60 छात्राओं पर किया गया। उनसे सामाजिक पृष्ठभूमि, चिंता और नींद से जुड़ी समस्याओं पर आधारित तीन प्रश्नावलियां भरवाई गईं। साथ ही उनके रक्त के नमूने भी लिए गए। सर्वे में पाया गया कि इनमें से करीब 53 फीसदी छात्राओं को नींद में परेशानी थी, जो अनिद्रा की ओर इशारा करती है।

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वहीं 75 फीसदी छात्राओं में चिंता के लक्षण पाए गए। इनमें से करीब 17 फीसदी मध्यम और 13 फीसदी गंभीर रूप से चिंतित थी।

चिंता जितनी गहरी, सुरक्षा उतनी कमजोर

अध्ययन के नतीजे दर्शाते हैं कि जिन छात्राओं में चिंता के लक्षण ज्यादा गंभीर थे, उनमें नेचुरल किलर सेल्स की कमी भी उतनी ही ज्यादा पाई गई।

शोधकर्ताओं ने पाया है कि जिन छात्राओं को नींद न आने की समस्या थी, उनके शरीर में बीमारियों से लड़ने वाली खास कोशिकाएं (नेचुरल किलर सेल्स) कम हो गई थीं। वहीं, जिन छात्राओं में चिंता और घबराहट के लक्षण थे, उनके शरीर में ये सुरक्षा कोशिकाएं उतनी सक्रिय नहीं थीं और उनकी संख्या भी उन छात्राओं से कम थी, जिन्हें ऐसी कोई समस्या नहीं थी।

इसका मतलब है कि नींद की कमी और चिंता दोनों ही शरीर की रोगों से लड़ने की ताकत को कमजोर कर सकती हैं।

स्टडी में यह भी सामने आया कि जिन छात्राओं में चिंता के लक्षण गंभीर नहीं थे उनके नेचुरल किलर सेल्स में मामूली गिरावट देखी गई, लेकिन गंभीर रूप से चिंतित बच्चियों के मामले में यह गिरावट कहीं ज्यादा स्पष्ट और चिंताजनक थी।

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वहीं अनिद्रा से जूझ रहीं छात्राओं में, चिंता का स्तर बढ़ने के साथ नेचुरल किलर सेल्स और कम होते गए।

मानसिक तनाव से शारीरिक बीमारियों तक…

इस बारे में शोध से जुड़े मुख्य शोधकर्ता और तैबा यूनिवर्सिटी की असिस्टेंट प्रोफेसर डॉक्टर रेनाद अलहमवी का कहना है, “मानसिक तनाव शरीर की रक्षा प्रणाली को इस तरह प्रभावित करता है कि सूजन, कैंसर, डिप्रेशन और अन्य गंभीर बीमारियों का खतरा बढ़ सकता है।“

अध्ययन में यह भी सामने आया है नेचुरल किलर सेल्स की कमी न केवल संक्रमण के खतरे को बढ़ाती है, बल्कि कैंसर और डिप्रेशन जैसी मानसिक बीमारियों से भी जुड़ी हो सकती है। वैज्ञानिकों का मानना है कि चिंता और अनिद्रा शरीर में सूजन और ट्यूमर बनने की प्रक्रिया को तेज कर सकती हैं। हालांकि यह अध्ययन केवल युवा महिलाओं तक सीमित था, जबकि चिंता और नींद की समस्याएं अन्य उम्र और वर्गों में भी बढ़ रही हैं।

स्वस्थ जीवनशैली बन सकती है ढाल

इसलिए इन नतीजों को सभी पर सीधे लागू नहीं किया जा सकता। ऐसे में शोधकर्ताओं का कहना है कि अलग-अलग उम्र, पुरुषों और अन्य क्षेत्रों के लोगों पर भी ऐसे अध्ययन जरूरी हैं, ताकि चिंता और अनिद्रा का इम्यून कोशिकाओं की संख्या और कामकाज पर क्या असर पड़ता है इसकी पूरी तस्वीर सामने आ सके।

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पहले के अध्ययनों से संकेत मिलते हैं कि नियमित व्यायाम, तनाव कम करने की आदतें, संतुलित और पौष्टिक आहार नेचुरल किलर सेल्स की संख्या और क्षमता को बढ़ा सकते हैं। लेकिन अगर चिंता और अनिद्रा की समस्या बनी रहे, तो ये फायदे भी कमजोर पड़ सकते हैं।

देखा जाए तो कहीं न कहीं आज की भागदौड़ भरी जिंदगी में अच्छी नींद और सुकून सबसे ज्यादा नजरअंदाज किए जा रहे हैं। अध्ययन का सन्देश बेहद स्पष्ट है, नींद और मानसिक शांति कोई विलास नहीं, बल्कि स्वस्थ शरीर की पहली शर्त हैं, क्योंकि अगर मन थका है, तो शरीर की सुरक्षा ढाल भी टूटने लगती है।

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