

भारत में हार्ट फेलियर के 10 में से सात मरीजों के पास कोई स्वास्थ्य बीमा नहीं है।
मरीजों का 90 फीसदी से ज्यादा इलाज खर्च खुद उठाना पड़ता है, जिससे परिवारों पर गंभीर आर्थिक दबाव बनता है।
एक मरीज का सालाना औसत इलाज खर्च लगभग 1,06,566 रुपये है, जो कई परिवारों की आय से अधिक है।
करीब 38 फीसदी परिवारों को कैटास्ट्रॉफिक खर्च का सामना करना पड़ा और 18 फीसदी को कर्ज लेना या संपत्ति बेचना पड़ा।
बीमा होने पर आर्थिक दबाव कम होता है, लेकिन करीब 70 फीसदी मरीज अभी भी आर्थिक रूप से असुरक्षित हैं।
भारत में हार्ट फेलियर यानी हृदय की विफलता पर किए गए एक नए अध्ययन ने देश की एक बड़ी सच्चाई सामने रखी है। यह शोध केरल के तिरुवनंतपुरम में श्री चित्रा तिरुनल आयुर्विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी संस्थान के वैज्ञानिकों ने किया है। अध्ययन में देशभर के 1,859 मरीजों के आंकड़ों का विश्लेषण किया गया।
अध्ययन में कहा गया है कि भारत में हार्ट फेलियर (एचएफ) के 10 में से सात मरीजों के पास कोई भी स्वास्थ्य बीमा नहीं है। इसका मतलब है मरीज अपने इलाज का 90 फीसदी से ज्यादा खर्च खुद उठाते हैं। कुल मिलाकर इलाज के खर्चे का बोझ सीधे परिवारों की जेब पर पड़ता है।
इलाज का बढ़ता खर्च
हार्ट फेलियर एक ऐसी बीमारी है जिसमें दिल सही तरीके से खून पंप नहीं कर पाता। यह एक लंबी चलने वाली बीमारी है, जिसमें लगातार दवा, जांच और अस्पताल के चक्कर लगाने पड़ते हैं।
ग्लोबल हार्ट जर्नल में प्रकाशित अध्ययन के मुताबिक, एक मरीज का सालाना औसत खर्च लगभग 1,06,566 रुपये है। यह रकम भारत के कई परिवारों के लिए बहुत ज्यादा है, खासकर तब जब आय सीमित हो।
बीमारी से कम होती आमदनी
इस बीमारी का असर सिर्फ सेहत पर नहीं, कमाई पर भी पड़ता है। कई मरीज काम नहीं कर पाते, जिससे उनकी आय कम हो जाती है। साथ ही, परिवार के दूसरे सदस्य को भी देखभाल के लिए काम छोड़ना पड़ सकता है। अध्ययन में पाया गया कि लगभग एक-तिहाई मरीजों और परिवारों की आय में गिरावट आई।
जब इलाज बन जाता है संकट
करीब 38 फीसदी परिवारों को भारी आर्थिक संकट का सामना करना पड़ा, जिसे ‘कैटास्ट्रॉफिक खर्च’ कहा जाता है। इसका मतलब है कि इलाज के खर्च से उनकी कुल आय का बड़ा हिस्सा गायब हो जाता है। कुल मिलाकर एक-तिहाई से अधिक मामलों में आर्थिक संकट पैदा हो जाता है।
इसके अलावा लगभग 18 फीसदी परिवारों को पैसे के लिए कर्ज लेना पड़ा या अपनी संपत्ति बेचनी पड़ी। यह स्थिति लंबे समय तक आर्थिक परेशानी पैदा कर सकती है।
बीमा से मिलती है राहत, लेकिन भारी कमी
अध्ययन में यह भी सामने आया कि जिन मरीजों के पास हेल्थ इंश्योरेंस था, उन्हें कम आर्थिक दबाव झेलना पड़ा। लेकिन समस्या यह है कि करीब 70 फीसदी मरीजों के पास कोई बीमा नहीं है। इस वजह से ज्यादातर लोग इलाज के खर्च से खुद ही जूझते हैं।
यह अध्ययन साफ बताता है कि भारत में हार्ट फेलियर का इलाज सिर्फ स्वास्थ्य नहीं, बल्कि आर्थिक समस्या भी बन जाता है। जब तक ज्यादा लोगों को बीमा और सस्ती स्वास्थ्य सेवाएं नहीं मिलेंगी, तब तक यह बोझ कम नहीं होगा। हार्ट फेलियर सिर्फ स्वास्थ्य की चुनौती नहीं, बल्कि आर्थिक और सामाजिक चुनौती भी है, जिसे नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।
शोध पत्र में शोधकारों के हवाले से कहा गया है कि इस समस्या से निपटना लोगों के स्वास्थ्य की प्राथमिकता है। इसके लिए सरकार और नीति निर्माता बीमा कवरेज बढ़ाएं, इलाज सस्ता और सुलभ बनाएं।
भविष्य में यह जरूरी है कि सस्टेनेबल फाइनेंसिंग मॉडल और समुदाय आधारित देखभाल के असर को समझा जाए। इससे मरीजों पर आर्थिक दबाव कम होगा और उनके इलाज और जीवन की गुणवत्ता में सुधार आएगा। इसलिए जरूरी है कि सरकार और स्वास्थ्य व्यवस्था मिलकर ऐसे कदम उठाएं, जिससे इलाज हर व्यक्ति के लिए सुलभ और किफायती बन सके।