नवजातों की जान बचा सकता है सस्ता एंटीसेप्टिक, वैज्ञानिक अध्ययन ने जताई उम्मीद

विश्व स्वास्थ्य संगठन के मुताबिक, 2023 में दुनिया भर में करीब 23 लाख नवजात शिशुओं की मृत्यु हुई थी, जिनमें सबसे अधिक मौतें निम्न और मध्यम आय वाले देशों में दर्ज की गई
प्रतीकात्मक तस्वीर: आईस्टॉक
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सारांश
  • दुनिया भर में हर साल लाखों नवजात संक्रमण के कारण जान गंवा देते हैं, खासकर निम्न और मध्यम आय वाले देशों में स्थिति कहीं ज्यादा गंभीर है।

  • ऐसे में एक नई अंतरराष्ट्रीय समीक्षा ने उम्मीद जगाई है कि गर्भनाल की देखभाल में इस्तेमाल होने वाला सस्ता एंटीसेप्टिक क्लोरहेक्सिडीन नवजात संक्रमण को करीब 29 फीसदी तक कम कर सकता है और मौत के खतरे को भी घटा सकता है।

  • 1.43 लाख नवजातों पर किए गए अध्ययन के आधार पर वैज्ञानिकों का कहना है कि यह सरल और कम लागत वाला उपाय संसाधन-कमी वाले देशों में बड़े पैमाने पर नवजातों की जान बचाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है, हालांकि इसका उपयोग स्थानीय स्वास्थ्य सुविधाओं और परिस्थितियों के अनुसार किया जाना चाहिए।

जन्म के बाद के पहले कुछ दिन ही किसी नवजात के जीवन के सबसे नाजुक पल होते हैं। लेकिन सही देखभाल न मिलने के कारण दुनिया भर में हर साल लाखों नवजात संक्रमण के कारण अपनी जान गंवा देते हैं। ऐसे में एक साधारण और सस्ता एंटीसेप्टिक अब उनकी जिंदगी बचाने की मजबूत उम्मीद बनकर सामने आया है।

इस बारे में की गई एक नई अंतरराष्ट्रीय समीक्षा में सामने आया है कि जन्म के बाद गर्भनाल (अंबिलिकल कॉर्ड) की देखभाल में इस्तेमाल किया जाने वाला साधारण एंटीसेप्टिक 'क्लोरहेक्सिडीन' नवजात शिशुओं में संक्रमण के खतरे को काफी हद तक कम कर सकता है।

अध्ययन के नतीजे दर्शाते हैं कि क्लोरहेक्सिडीन से अम्बिलिकल कॉर्ड की सफाई करने पर नवजात शिशुओं में संक्रमण का खतरा करीब 29 फीसदी तक कम हो सकता है। विशेषज्ञों के मुताबिक, जन्म के बाद शुरुआती दिनों में संक्रमण नवजात मौतों का एक बड़ा कारण होता है, खासकर उन देशों में जहां स्वास्थ्य सुविधाएं सीमित हैं। ऐसे में यह सस्ता और आसानी से उपलब्ध उपाय बड़े पैमाने पर जीवन बचाने में मददगार साबित हो सकता है।

इस समीक्षा के नतीजे जर्नल कोक्रेन डेटाबेस ऑफ सिस्टेमैटिक रिव्यूज में प्रकाशित हुए हैं।

गौरतलब है कि नवजात शिशु में अंबिलिकल कॉर्ड की देखभाल महज एक सामान्य प्रक्रिया नहीं, बल्कि उसके जीवन की पहली सुरक्षा है।

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 यह संक्रमण से बचाने और घाव को ठीक करने में मदद करती है। विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) के मुताबिक, 2023 में दुनिया भर में करीब 23 लाख नवजात शिशुओं की मृत्यु हुई थी, जिनमें सबसे अधिक मौतें निम्न और मध्यम आय वाले देशों में दर्ज की गई।

देखा जाए तो दुनिया के अलग-अलग देशों में गर्भनाल की देखभाल के तरीके भी अलग हैं, जो वहां की परंपराओं, स्वास्थ्य सुविधाओं और संसाधनों पर निर्भर करते हैं। जहां स्वास्थ्य सुविधाएं अच्छी हैं और नवजात मृत्यु दर कम है, वहां विश्व स्वास्थ्य संगठन ड्राई कॉर्ड केयर की सलाह देता है। लेकिन जिन क्षेत्रों में नवजात मृत्यु दर अधिक है, वहां जन्म के बाद एक सप्ताह तक रोज चार फीसदी क्लोरहेक्सिडीन लगाने की सलाह दी जाती है, ताकि संक्रमण और मौत के खतरे को कम किया जा सके।

1.43 लाख नवजातों पर हुआ अध्ययन

अपने इस अध्ययन में शोधकर्ताओं ने 1,43,150 नवजात शिशुओं पर किए गए 18 रैंडमाइज्ड कंट्रोल ट्रायल का विश्लेषण किया है। इस अध्ययन में चार फीसदी  क्लोरहेक्सिडीन, 70 फीसदी अल्कोहल, सिल्वर सल्फाडियाजीन और पोविडोन आयोडीन जैसे एंटीसेप्टिक के असर को जांचा गया।

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इस अध्ययन के निष्कर्ष बताते हैं कि क्लोरहेक्सिडीन का उपयोग नवजात शिशुओं के लिए काफी फायदेमंद हो सकता है। इसे लगाने से संक्रमण के मामले प्रति 1000 नवजात में 87 से घटकर 62 रह गए, वहीं नवजात मौतों की संख्या भी प्रति 1000 में 18 से घटकर 15 तक आ सकती है। हालांकि, इसका एक छोटा सा असर यह भी देखा गया कि क्लोरहेक्सिडीन लगाने पर अम्बिलिकल कॉर्ड के सूखकर गिरने में सामान्य से एक से दो दिन अधिक लग सकते हैं, लेकिन इसके मुकाबले संक्रमण और मौत के खतरे में आई कमी कहीं ज्यादा महत्वपूर्ण है।

हर जगह एक जैसा समाधान नहीं

शोधकर्ताओं का कहना है कि जिन देशों में स्वच्छता और स्वास्थ्य सुविधाएं बेहतर हैं, वहां ड्राई कॉर्ड केयर ही पर्याप्त है। लेकिन जिन क्षेत्रों में स्वच्छता की कमी है, वहां एंटीसेप्टिक दवा संक्रमण से बचाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है।

अध्ययन में यह भी सामने आया है कि इस एंटीसेप्टिक का उपयोग न केवल सुरक्षित है, बल्कि इसे कम संसाधनों वाले क्षेत्रों में भी आसानी से अपनाया जा सकता है। यही वजह है कि इसे सार्वजनिक स्वास्थ्य के लिए एक ‘गेम-चेंजर’ के रूप में देखा जा रहा है।

इस बारे में अध्ययन से जुड़े शोधकर्ता प्रोफेसर जुल्फिकार अहमद भुट्टा का प्रेस विज्ञप्ति में कहना है, “हमारे निष्कर्ष विश्व स्वास्थ्य संगठन की मौजूदा सलाह का समर्थन करते हैं, लेकिन एक अहम बात भी बताते हैं, ये उपाय हर जगह एक जैसे असरदार नहीं होते। इनका फायदा इस बात पर काफी निर्भर करता है कि बच्चे का जन्म किन परिस्थितियों में हुआ है।“ उन्होंने जोर दिया कि कौन सा तरीका सबसे बेहतर होगा, यह स्थानीय परिस्थितियों पर निर्भर करता है।

ऐसे में आज जब दुनिया नवजात मौतों को कम करने की जंग लड़ रही है, तब यह अध्ययन याद दिलाता है कि सबसे असरदार हथियार अक्सर सबसे सरल होते हैं, बस उन्हें सही समय और सही जगह तक पहुंचाने की जरूरत होती है।

डिस्क्लेमर: इस लेख में दी गई जानकारियां वैज्ञानिक शोध पर आधारित हैं। इन पर अमल करने से पहले सम्बंधित चिकित्सक और विशषज्ञों से सलाह अवश्य लें।

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