सुप्रीम कोर्ट ने जीवनरक्षक उपचार पर दो-स्तरीय मेडिकल समीक्षा व्यवस्था अनिवार्य की, राज्यों की अनुपालन रिपोर्ट से संतुष्ट

सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि जीवनरक्षक उपचार हटाने का फैसला केवल दो-स्तरीय मेडिकल समीक्षा के बाद ही होगा, ताकि मरीज की गरिमा, निष्पक्षता और मानवीय अधिकार हर हाल में सुरक्षित रहें।
प्रतीकात्मक तस्वीर: आईस्टॉक
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सारांश
  • सुप्रीम कोर्ट ने मृत्युशय्या पर पड़े गंभीर रूप से बीमार मरीजों के लिए जीवनरक्षक उपचार हटाने के निर्णय को अधिक पारदर्शी, निष्पक्ष और मानवीय बनाने हेतु दो-स्तरीय मेडिकल समीक्षा व्यवस्था को अनिवार्य बताते हुए अधिकांश राज्यों द्वारा इसके पालन पर संतोष जताया।

  • अदालत ने दोहराया कि अंतिम समय में भी हर व्यक्ति को गरिमापूर्ण और पीड़ामुक्त विदाई का अधिकार है।

  • दूसरी ओर, गंगा और यमुना के किनारों पर बढ़ते अतिक्रमण और अनियंत्रित निर्माण पर सख्त रुख अपनाते हुए सुप्रीम कोर्ट ने बिहार में अवैध कब्जे हटाने और वृंदावन में नए निर्माण पर तत्काल रोक के आदेश दिए।

  • अदालत ने स्पष्ट किया कि नदियों का प्राकृतिक प्रवाह और पारिस्थितिकी किसी भी विकास परियोजना से अधिक महत्वपूर्ण है।

  • ये दोनों फैसले इस बात का मजबूत संदेश देते हैं कि न्यायपालिका मानव गरिमा और पर्यावरण संरक्षण को संवैधानिक मूल्यों के केंद्र में रखकर संतुलित, संवेदनशील और जवाबदेह शासन सुनिश्चित करना चाहती है।

सुप्रीम कोर्ट ने 22 जुलाई 2026 को एक मामले की सुनवाई करते हुए कहा कि लगभग सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों ने गंभीर रूप से बीमार (टर्मिनली इल) मरीजों के मामलों की समीक्षा के लिए द्विस्तरीय मेडिकल समीक्षा व्यवस्था (टू-टियर मेडिकल रिव्यू सिस्टम) बनाने के निर्देशों का पालन कर लिया है।

केवल मिजोरम और सिक्किम में अभी यह प्रक्रिया पूरी नहीं हुई है, जिस पर अदालत ने दोनों राज्यों को जल्द से जल्द इसका पालन सुनिश्चित करने का निर्देश दिया।

यह मामला उन प्राथमिक और द्वितीयक मेडिकल बोर्डों के गठन से जुड़ा है, जो जीवनरक्षक उपचार (लाइफ सपोर्ट) हटाने या जारी रखने जैसे अत्यंत संवेदनशील निर्णयों से पहले मरीज की चिकित्सीय स्थिति का स्वतंत्र और निष्पक्ष आकलन करेंगे।

इससे पहले सुप्रीम कोर्ट ने 11 मार्च 2026 को केंद्र सरकार और सभी राज्यों तथा केंद्र शासित प्रदेशों के स्वास्थ्य विभागों को निर्देश दिया था कि प्रत्येक जिले के मुख्य चिकित्सा अधिकारी योग्य पंजीकृत चिकित्सकों का एक स्थाई पैनल तैयार करें, ताकि आवश्यकता पड़ने पर द्वितीयक मेडिकल बोर्ड का गठन तुरंत बिना किसी देरी के किया जा सके।

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22 जुलाई की सुनवाई के दौरान अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल ने अदालत के समक्ष इस आदेश के पालन से जुड़ी रिपोर्ट पेश की। रिपोर्ट के अनुसार, आंध्र प्रदेश के प्रत्येक जिले में द्वितीयक मेडिकल बोर्ड गठित कर दिए गए हैं और उनके कामकाज की नियमित निगरानी तथा समय-समय पर पुनर्गठन के भी निर्देश दिए गए हैं।

वहीं बिहार ने भी सभी जिलों में ऐसे बोर्ड स्थापित किए हैं। इसी तरह लक्षद्वीप में भी योग्य डॉक्टरों का पैनल तैयार कर लिया गया है, जिससे जरूरत पड़ने पर द्वितीयक मेडिकल बोर्ड का गठन किया जा सके।

राज्यों में कहां तक पहुंची तैयारी?

अदालत ने पाया कि मिजोरम और सिक्किम को छोड़कर सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों ने उसके निर्देशों का पालन कर लिया है। इसके बाद सुप्रीम कोर्ट ने दोनों राज्यों को बिना देरी के आवश्यक व्यवस्था लागू करने का निर्देश दिया।

गौरतलब है कि 11 मार्च 2026 को ही सुप्रीम कोर्ट ने 32 वर्षीय हरीश राणा के मामले में इच्छामृत्यु (पैसिव यूथेनेशिया) से जुड़ी याचिका पर सुनवाई करते हुए महत्वपूर्ण टिप्पणी की थी। हरीश राणा पिछले 13 वर्षों से स्थाई वेजिटेटिव अवस्था (एक ऐसी स्थिति जहां इंसान केवल सांस लेता है, पर होश में नहीं होता) में हैं।

आखिरी सांस तक गरिमा का अधिकार

अदालत ने स्पष्ट किया था कि यदि किसी मरीज का जीवनरक्षक उपचार रोका या हटाया जाता है, तो यह पूरी प्रक्रिया गरिमा, संवेदनशीलता और मानवीय व्यवहार के साथ होनी चाहिए। इसका मतलब मरीज को अकेला छोड़ देना नहीं है, बल्कि उसके आखिरी पलों को दर्दमुक्त और गरिमापूर्ण बनाना है।

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गंगा-यमुना पर सुप्रीम कोर्ट सख्त: पटना में अतिक्रमण हटाने के आदेश, वृंदावन में निर्माण पर रोक

सुप्रीम कोर्ट ने बिहार और उत्तर प्रदेश में नदियों के किनारों हो रहे अतिक्रमण और निर्माण को लेकर कड़ा रुख अपनाया है। 21 जुलाई 2026 को हुई सुनवाई में अदालत ने दोनों राज्यों को नदियों के प्राकृतिक स्वरूप और पारिस्थितिकी की रक्षा के लिए तत्काल प्रभावी कदम उठाने के निर्देश दिए।

पटना में गंगा नदी के नौजर घाट से नूरपुर घाट के बीच बने सभी अवैध निर्माणों और अतिक्रमणों को हटाने के लिए सुप्रीम कोर्ट ने बिहार सरकार को छह सप्ताह का समय दिया है। अदालत ने स्पष्ट किया कि निर्धारित अवधि के भीतर पूरे क्षेत्र को अतिक्रमण मुक्त किया जाए।

वहीं, उत्तर प्रदेश के मथुरा जिले के वृंदावन में यमुना नदी के किनारे जारी निर्माण कार्य पर भी सुप्रीम कोर्ट ने गंभीर चिंता जताई है। अदालत ने कहा कि इस तरह के निर्माण से आगे चलकर यमुना का पाट सिकुड़ सकता है, जिससे नदी की पारिस्थितिकी पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ेगा।

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सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि यमुना में जल के प्राकृतिक (पारिस्थितिक) और स्वाभाविक प्रवाह को हर हाल में बनाए रखना आवश्यक है। इसी को ध्यान में रखते हुए अदालत ने अगले आदेश तक किसी भी नए निर्माण कार्य पर रोक लगाने का निर्देश दिया है।

सुप्रीम कोर्ट के इन निर्देशों ने स्पष्ट संदेश दिया है कि नदियां केवल जलधारा नहीं, बल्कि देश की पारिस्थितिकी और जीवनरेखा हैं। उनके तटों पर अवैध अतिक्रमण और अनियंत्रित निर्माण अब विकास के नाम पर स्वीकार नहीं किए जाएंगे।

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