

स्क्रब टाइफस को लेकर तमिलनाडु के 25 गांवों में किए गए एक नए वैज्ञानिक अध्ययन ने पारंपरिक धारणा को चुनौती दी है। अब तक माना जाता था कि यह संक्रमण खेतों और जंगलों में काम करने वाले लोगों में ज्यादा फैलता है, लेकिन शोध में पाया गया कि बीमारी फैलाने वाले चिगर गांवों के भीतर, खासकर घरों और बस्तियों के आसपास ज्यादा पाए जाते हैं।
800 से अधिक छोटे स्तनधारी जीवों और चिगर के 10,000 से ज्यादा नमूनों की जांच में सामने आया कि गांवों के अंदर पकड़े गए जानवरों पर चिगरों की संख्या और उनमें संक्रमण की दर गांव के बाहर की तुलना में कहीं अधिक थी।
शोधकर्ताओं के मुताबिक भारत के ग्रामीण इलाकों में हर साल करीब 10 फीसदी लोग इस बीमारी से संक्रमित हो सकते हैं।
विशेषज्ञों का कहना है कि अगर गांव स्तर पर जांच सुविधाएं बढ़ाई जाएं, जागरूकता फैलाई जाए और कचरा प्रबंधन व चूहों पर नियंत्रण जैसे कदम उठाए जाएं, तो इस खतरनाक लेकिन अक्सर अनदेखी बीमारी के खतरे को काफी हद तक कम किया जा सकता है।
ग्रामीण भारत में फैलने वाली गंभीर बीमारी स्क्रब टाइफस को लेकर एक नई रिसर्च ने पारंपरिक धारणा को चुनौती दी है। नई रिसर्च में चौंकाने वाला खुलासा हुआ है कि इस खतरनाक बीमारी का खतरा खेतों में नहीं, बल्कि गांवों के भीतर ज्यादा हो सकता है।
तमिलनाडु के गांवों में किए वैज्ञानिक अध्ययन से पता चला है कि संक्रमण के स्रोत अक्सर लोगों के घरों और बस्तियों के आसपास ही मौजूद हो सकते हैं।
यह अध्ययन क्रिश्चियन मेडिकल कॉलेज, वेल्लोर और लंदन स्कूल ऑफ हाइजीन एंड ट्रॉपिकल मेडिसिन के वैज्ञानिकों के साथ-साथ स्थानीय समुदायों की भागीदारी से किया गया है। अध्ययन के नतीजे प्रतिष्ठित जर्नल इमर्जिंग इन्फेक्शियस डिजीज में प्रकाशित हुए हैं।
क्या है स्क्रब टाइफस?
गौरतलब है कि स्क्रब टाइफस एक संक्रामक और कभी-कभी जानलेवा बीमारी है, जो ओरिएंटिया त्सुत्सुगामुशी नामक बैक्टीरिया से होती है।
यह बीमारी इंसानों में तब फैलती है जब चिगर (माइट के लार्वा) नाम का बेहद छोटा पिस्सू त्वचा को काटता है। ये चिगर आमतौर पर घास, झाड़ियों, सूखी पत्तियों और मिट्टी में पाए जाते हैं, इसलिए ग्रामीण क्षेत्रों और जंगलों में इसका खतरा ज्यादा रहता है। ये चिगर अक्सर चूहों और छोटे जंगली जीवों में पाए जाते हैं। इंसान गलती से इनके संपर्क में आकर संक्रमित हो जाता है।
संक्रमण के करीब सात से दस दिन बाद इसके लक्षण दिखाई देने लगते हैं। इनमें बुखार, सिरदर्द, शरीर में दर्द और त्वचा पर चकत्ते शामिल हैं।
चिगर के काटने की जगह के आसपास की त्वचा अक्सर काली पड़ जाती है, जिससे डॉक्टरों को बीमारी पहचानने में मदद मिलती है। वहीं अगर समय पर इलाज न मिले तो यह बीमारी गंभीर हो सकती है और फेफड़ों की गंभीर समस्या, शॉक, मेनिनजाइटिस और किडनी फेलियर जैसी जानलेवा स्थितियां पैदा कर सकती है।
गौरतलब है कि अब तक माना जाता था कि किसान, मजदूर और जंगलों में काम करने वाले लोग इस बीमारी के सबसे ज्यादा शिकार होते हैं क्योंकि वे खेतों और जंगलों में काम करते हैं। लेकिन वैज्ञानिकों को अपने इस नए अध्ययन में गांवों में इस बीमारी का खतरा ज्यादा मिला है।
गांवों में ज्यादा मिला खतरा
वैज्ञानिकों ने तमिलनाडु के दो जिलों के 25 गांवों में 800 से ज्यादा छोटे स्तनधारी जीव, जैसे चूहे और छछूंदर पकड़े और उनका परीक्षण किया। इन जानवरों से चिगर के 10,000 से ज्यादा नमूनों की जांच की गई।
इस अध्ययन में कुछ चौंकाने वाले तथ्य सामने आए हैं, जैसे छोटे स्तनधारी जीव आसपास के इलाकों की तुलना में गांवों के भीतर चार से पांच गुणा ज्यादा पाए गए। इनमें मुख्य रूप से बैंडिकूट चूहा, काला चूहा और एशियाई छछूंदर शामिल थे। अध्ययन में यह भी सामने आया कि गांवों के भीतर पकड़े गए चूहों और छछूंदरों पर चिगर्स की संख्या गांव के बाहर पकड़े गए जानवरों की तुलना में कहीं ज्यादा थी।
जांच किए गए चिगर के नमूनों में से करीब चार फीसदी में स्क्रब टाइफस पैदा करने वाले बैक्टीरिया ओरिएंटिया पाए गए। सबसे चिंता की बात यह रही कि गांवों के भीतर पकड़े गए जानवरों पर मिले चिगर, गांव के बाहर पाए गए चिगरों की तुलना में दो गुना से भी ज्यादा संक्रमित थे।
पहले के अध्ययन से भी मिले संकेत
शोधकर्ताओं ने इससे पहले भी 2000 से ज्यादा ग्रामीणों के रक्त के नमूनों का अध्ययन किया था। उसमें भी यह पाया गया कि खेतों में काम करना, पशुओं को चराना या लकड़ी इकट्ठा करना स्क्रब टाइफस के खतरे को नहीं बढ़ाता। यह भी पाया गया कि गांव के किनारे रहने वाले लोग गांव के बीच रहने वालों की तुलना में ज्यादा जोखिम में नहीं थे।
इन दोनों अध्ययनों को मिलाकर वैज्ञानिकों का निष्कर्ष है कि स्क्रब टाइफस के अधिकतर संक्रमण गांवों के भीतर ही हो सकते हैं।
भारत में कितना गंभीर है खतरा
अध्ययन के प्रमुख शोधकर्ता वुल्फ-पीटर श्मिट के अनुसार, “स्क्रब टाइफस के बारे में जागरूकता बढ़ी है, लेकिन अब यह समझना जरूरी है कि संक्रमण का खतरा खेतों से ज्यादा घरों के आसपास भी हो सकता है।”
वहीं अध्ययन से जुड़ी शोधकर्ता डॉक्टर कैरल देवमणि का कहना है, “स्थानीय समुदायों के सहयोग के बिना यह शोध संभव नहीं था। अब जरूरत है कि बीमारी के बारे में जागरूकता और जांच सुविधाएं गांवों तक पहुंचाई जाएं।”
शोधकर्ताओं के मुताबिक भारत के ग्रामीण इलाकों में हर साल करीब 10 फीसदी लोगों को स्क्रब टाइफस हो सकता है। यह बुखार के कारण अस्पताल में भर्ती होने की एक बड़ी, लेकिन अक्सर अनदेखी वजह है।
हालांकि, इसका इलाज डॉक्सीसाइक्लिन और एजिथ्रोमाइसिन जैसी एंटीबायोटिक दवाओं से किया जा सकता है, लेकिन अभी तक इससे बचाव के लिए कोई वैक्सीन उपलब्ध नहीं है। शोधकर्ताओं का कहना है कि बीमारी को जल्दी पहचानने और इलाज शुरू करने के लिए गांव स्तर पर जांच सुविधाएं उपलब्ध कराना बहुत जरूरी है।
विशेषज्ञों का कहना है कि गांवों में कुछ जरूरी कदम उठाकर स्क्रब टाइफस के खतरे को कम किया जा सकता है, जैसे चूहों की संख्या कम करने के उपाय करना, ठोस कचरे का सही प्रबंधन करना, भोजन को सुरक्षित तरीके से रखना और घरों के आंगन व रास्तों को पक्का करना।
स्वास्थ्य विशेषज्ञों का मानना है कि अगर गांव स्तर पर जांच सुविधाएं और बीमारी के बारे में जागरूकता बढ़ाई जाए, तो इसके खतरे को काफी हद तक कम किया जा सकता है।