

वैज्ञानिकों ने एमडब्ल्यूसी-3634 खोजा, जो इबोला वायरस की प्रवेश प्रोटीन को स्थिर कर संक्रमण रोकने में बेहद प्रभावी साबित हुआ।
करीब 4.73 अरब अणुओं की जांच के बाद वैज्ञानिकों को मिला नया उम्मीदवार, जिसकी वायरस रोकने की क्षमता बेहद मजबूत रही।
असली इबोला वायरस पर परीक्षण में एमडब्ल्यूसी-3634 ने केवल 0.65 नैनोमोलर मात्रा में संक्रमण रोकने की क्षमता दिखाई।
प्री-क्लिनिकल मॉडल में मुंह से दी गई दवा ने जीवित रहने में सुधार किया, बीमारी के लक्षण और वायरस स्तर घटाए।
नई खोज इबोला के खिलाफ दवा विकास की नई दिशा दिखाती है, लेकिन इंसानों में इस्तेमाल से पहले व्यापक परीक्षण जरूरी होंगे।
अमेरिका की यूनिवर्सिटी ऑफ मिनेसोटा के नेतृत्व में वैज्ञानिकों की एक अंतरराष्ट्रीय टीम ने इबोला वायरस के खिलाफ एक बेहद असरदार छोटे अणु की खोज की है। इस नए अणु का नाम एमडब्ल्यूसी-3634 रखा गया है। शुरुआती परीक्षणों में इसने इबोला वायरस को कोशिकाओं में प्रवेश करने से रोकने में बहुत अच्छी क्षमता दिखाई है। खास बात यह है कि यह दवा मुंह के रास्ते दिए जाने पर भी जानवरों के परीक्षण में सुरक्षा देने में सफल रही।
यह अध्ययन हाल ही में प्रतिष्ठित वैज्ञानिक पत्रिका नेचर कम्युनिकेशन्स में प्रकाशित किया गया है। शोध में यूनिवर्सिटी ऑफ मिनेसोटा के साथ बेयलर कॉलेज ऑफ मेडिसिन, बोस्टन यूनिवर्सिटी और यूनिवर्सिटी ऑफ फ्लोरिडा स्क्रिप्स इंस्टीट्यूट के वैज्ञानिकों ने काम किया।
वायरस के प्रवेश को ही रोकता है नया अणु
इबोला वायरस इंसानी शरीर की कोशिकाओं में प्रवेश करने के लिए अपनी एक खास प्रोटीन का इस्तेमाल करता है। वायरस को कोशिका में प्रवेश करने के लिए इस प्रोटीन के आकार में कुछ बदलाव करने पड़ते हैं। वैज्ञानिकों ने एमडब्ल्यूसी-3634 को इसी प्रक्रिया को रोकने के लिए तैयार किया है।
यह अणु इबोला वायरस की प्रवेश प्रोटीन से जुड़कर उसे एक स्थिर स्थिति में रोक देता है। इसके बाद प्रोटीन अपना जरूरी आकार नहीं बदल पाती। नतीजा यह होता है कि वायरस कोशिका में प्रवेश नहीं कर पाता और संक्रमण की प्रक्रिया शुरुआती चरण में ही रुक जाती है।
पहले की दवाओं से बिल्कुल अलग तरीका
इस खोज की सबसे बड़ी खासियत इसका काम करने का तरीका है। पहले जिन छोटे अणुओं पर इबोला वायरस के खिलाफ शोध हुआ था, वे वायरस की प्रवेश प्रोटीन को अस्थिर करने की कोशिश करते थे। इसके विपरीत एमडब्ल्यूसी-3634 इस प्रोटीन को स्थिर करता है।
शोध के अनुसार, यह अणु प्रोटीन को लगभग एक जगह “लॉक” कर देता है। इससे वायरस कोशिका में प्रवेश के लिए जरूरी बदलाव नहीं कर पाता। वैज्ञानिकों के लिए यह इबोला के खिलाफ दवा विकसित करने की एक नई रणनीति है।
अरबों अणुओं में से मिला सही उम्मीदवार
इस अणु की खोज भी अपने आप में खास है। वैज्ञानिकों ने डीएनए-एनकोडेड केमिस्ट्री टेक्नोलॉजी की मदद से करीब 4.73 अरब अणुओं की जांच की। इतनी बड़ी संख्या में अणुओं की जांच से शोधकर्ताओं को ऐसे रासायनिक पदार्थ खोजने का मौका मिला, जिन्हें सामान्य तरीकों से पहचानना मुश्किल हो सकता था।
शुरुआत में मिले पदार्थ के कई अलग-अलग रूप थे। वैज्ञानिकों ने उनके बीच अंतर की जांच की और सबसे अधिक असरदार रूप की पहचान की। इसी प्रक्रिया के बाद एमडब्ल्यूसी-3634 सामने आया। शोधकर्ताओं के अनुसार, इस बदलाव से इसकी क्षमता काफी बढ़ गई।
बेहद कम मात्रा में दिखा असर
असली इबोला वायरस के खिलाफ प्रयोगशाला परीक्षण में एमडब्ल्यूसी-3634 ने बहुत मजबूत प्रभाव दिखाया। इसका आईसी50 स्तर 0.65 नैनोमोलर रहा। सरल शब्दों में कहें तो वायरस को रोकने के लिए बहुत कम मात्रा में इस अणु की जरूरत पड़ी।
परीक्षण के दौरान इस्तेमाल की गई परिस्थितियों में कोशिकाओं पर इसकी कोई स्पष्ट विषाक्तता भी नहीं मिली। हालांकि, इसका मतलब यह नहीं है कि यह इंसानों के लिए सुरक्षित साबित हो चुका है। इसके लिए अभी कई और परीक्षण जरूरी हैं।
जानवरों में भी मिले उत्साहजनक नतीजे
शोधकर्ताओं ने एक प्री-क्लिनिकल मॉडल में एमडब्ल्यूसी-3634 का मुंह के रास्ते इस्तेमाल किया। इसके बाद जानवरों में जीवित रहने की दर बेहतर हुई, बीमारी के लक्षण कम हुए और शरीर में वायरस की मात्रा भी घटी।
एक और महत्वपूर्ण बात यह रही कि अणु की 69 प्रतिशत मौखिक जैव-उपलब्धता दर्ज की गई। इसका मतलब है कि मुंह के रास्ते देने पर इसका काफी हिस्सा शरीर में उपलब्ध हुआ। दवा के विकास की दृष्टि से यह एक उत्साहजनक परिणाम माना जा रहा है।
अभी इंसानों के इलाज से दूर
वैज्ञानिकों ने साफ किया है कि एमडब्ल्यूसी-3634 अभी शुरुआती चरण का प्रयोगात्मक अणु है। इसे इंसानों में इबोला बीमारी की रोकथाम या इलाज के लिए मंजूरी नहीं मिली है। आगे इसकी सुरक्षा, प्रभाव, सही खुराक और संभावित दुष्प्रभावों की जांच करनी होगी।
फिर भी यह खोज इबोला के खिलाफ नई दवाएं बनाने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम मानी जा रही है। वैज्ञानिकों को उम्मीद है कि इस अणु की संरचना और इसके काम करने के तरीके की जानकारी से भविष्य में और बेहतर एंटीवायरल दवाएं विकसित की जा सकती हैं।