शिशुओं को आरएसवी से बचाने की दिशा में बड़ी पहल, डब्ल्यूएचओ ने वैक्सीन के मल्टी-डोज वायल को दी मंजूरी

डब्ल्यूएचओ ने माताओं की आरएसवी वैक्सीन के मल्टी-डोज वायल को दी मंजूरी, कम लागत में नवजात शिशुओं को गंभीर संक्रमण से बचाने की उम्मीद बढ़ी।
रेस्पिरेटरी सिंसिशियल वायरस (आरएसवी) हर साल लाखों बच्चों को अस्पताल पहुंचाता है, जबकि छह महीने से छोटे शिशुओं में मौत का खतरा ज्यादा रहता है।
रेस्पिरेटरी सिंसिशियल वायरस (आरएसवी) हर साल लाखों बच्चों को अस्पताल पहुंचाता है, जबकि छह महीने से छोटे शिशुओं में मौत का खतरा ज्यादा रहता है।फोटो साभार: आईस्टॉक
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सारांश
  • डब्ल्यूएचओ ने माताओं की आरएसवी वैक्सीन के मल्टी-डोज वायल को मंजूरी दी, जिससे ज्यादा शिशुओं तक सुरक्षा पहुंचाने की उम्मीद बढ़ी।

  • नई वैक्सीन प्रस्तुति से लागत घटाने और विकासशील देशों में बड़े स्तर पर मातृ टीकाकरण कार्यक्रम चलाने में मदद मिलेगी।

  • आरएसवी हर साल लाखों बच्चों को अस्पताल पहुंचाता है, जबकि छह महीने से छोटे शिशुओं में मौत का खतरा ज्यादा रहता है।

  • गर्भावस्था के 28वें सप्ताह के बाद आरएसवी वैक्सीन देने से मां से बच्चे तक सुरक्षा देने वाली एंटीबॉडी पहुंचती हैं।

  • डब्ल्यूएचओ ने देशों से आरएसवीप्रीएफ वैक्सीन या नीरसेविमैब को राष्ट्रीय कार्यक्रमों में शामिल कर शिशुओं को गंभीर बीमारी से बचाने की अपील की।

विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) ने माताओं को दी जाने वाली श्वसन संक्रमण की बीमारी रेस्पिरेटरी सिंसिशियल वायरस (आरएसवी) की वैक्सीन आरएसवीप्रीएफ (अब्रिवो) के मल्टी-डोज वायल को प्रीक्वालिफाई कर दिया है। डब्ल्यूएचओ का यह फैसला दुनिया भर में नवजात और छोटे बच्चों को आरएसवी से होने वाली गंभीर बीमारी और निमोनिया से बचाने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है।

मल्टी-डोज वायल आने से इस वैक्सीन को कम लागत में बड़ी संख्या में गर्भवती महिलाओं तक पहुंचाना आसान हो सकता है। खास तौर पर उन देशों को इसका फायदा मिलने की उम्मीद है, जहां गावी, दि वैक्सीन अलायन्स की मदद से टीकाकरण कार्यक्रम चलाए जाते हैं।

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छह महीने तक शिशु को मिल सकती है सुरक्षा

आरएसवी एक आम वायरस है, लेकिन छोटे बच्चों, खासकर नवजात और छह महीने से कम उम्र के शिशुओं में यह गंभीर बीमारी का कारण बन सकता है। इससे सांस लेने में परेशानी, फेफड़ों में संक्रमण और निमोनिया जैसी समस्याएं हो सकती हैं। कई गंभीर मामलों में बच्चे को अस्पताल में भर्ती कराने की जरूरत पड़ती है।

मां को गर्भावस्था के दौरान आरएसवी का टीका देने का उद्देश्य बच्चे को जन्म के बाद शुरुआती छह महीनों में सुरक्षा देना है। टीका लगने के बाद मां के शरीर में बनने वाली सुरक्षा देने वाली एंटीबॉडी गर्भ में पल रहे बच्चे तक पहुंचती हैं। जन्म के बाद यही एंटीबॉडी कुछ समय तक बच्चे को आरएसवी से बचाने में मदद करती हैं।

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हर साल लाखों बच्चे अस्पताल पहुंचते हैं

अनुमान के अनुसार, हर साल आरएसवी के कारण पांच साल से कम उम्र के बच्चों में 36 लाख से अधिक अस्पताल में भर्ती होने के मामले सामने आते हैं। इस वायरस से करीब एक लाख बच्चों की मौत भी होती है। इनमें लगभग आधी मौतें छह महीने से कम उम्र के शिशुओं में होती हैं।

आरएसवी से होने वाली करीब 97 प्रतिशत मौतें कम और मध्यम आय वाले देशों में होती हैं। इन देशों में गंभीर रूप से बीमार बच्चों को समय पर जरूरी चिकित्सा सुविधा मिलना कई बार मुश्किल होता है। कई बच्चे अस्पताल या स्वास्थ्य केंद्र तक पहुंचने से पहले ही घर पर दम तोड़ देते हैं। ऐसे में बीमारी से बचाव के लिए टीकाकरण को महत्वपूर्ण उपाय माना जा रहा है।

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पहले भी मिल चुकी है वैक्सीन को मंजूरी

डब्ल्यूएचओ ने मार्च 2025 में आरएसवीप्रीएफ वैक्सीन के सिंगल-डोज वायल को भी प्रीक्वालिफाई किया था। इसके बाद जुलाई 2025 में गावी ने माताओं के लिए आरएसवी वैक्सीन कार्यक्रम शुरू करने का फैसला किया। अब मल्टी-डोज वायल को मंजूरी मिलने से इस कार्यक्रम को बड़े स्तर पर लागू करने में मदद मिलने की उम्मीद है।

इस वैक्सीन के मल्टी-डोज रूप को कम लागत में विकसित करने में गेट्स फाउंडेशन का भी सहयोग रहा है। कम कीमत और एक वायल से कई लोगों को टीका देने की सुविधा के कारण गरीब और विकासशील देशों में बड़े पैमाने पर टीकाकरण शुरू करना आसान हो सकता है।

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गर्भावस्था के 28वें सप्ताह के बाद टीका देने की सलाह

डब्ल्यूएचओ के अनुसार, आरएसवीप्रीएफ वैक्सीन गर्भवती महिलाओं को गर्भावस्था की तीसरी तिमाही में दी जानी चाहिए। इसके लिए 28वें सप्ताह से आगे का समय बताया गया है। इसका उद्देश्य मां से बच्चे तक पर्याप्त मात्रा में सुरक्षा देने वाली एंटीबॉडी पहुंचाना है।

डब्ल्यूएचओ का कहना है कि गंभीर आरएसवी बीमारी का बोझ कम करने के लिए देशों को अपने राष्ट्रीय टीकाकरण कार्यक्रमों में या तो माताओं के लिए आरएसवीप्रीएफ वैक्सीन या फिर मोनोक्लोनल एंटीबॉडी नीरसेविमैब को शामिल करना चाहिए।

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गरीब देशों में बड़ी उम्मीद

आरएसवी के खिलाफ यह पहल खास तौर पर उन देशों के लिए महत्वपूर्ण हो सकती है जहां स्वास्थ्य सुविधाएं सीमित हैं। छोटे बच्चों को बीमारी होने के बाद इलाज देने के बजाय गर्भावस्था के दौरान मां को टीका देकर पहले से सुरक्षा देने की कोशिश की जा रही है।

मल्टी-डोज वायल की उपलब्धता से वैक्सीन की लागत कम करने, बड़े स्तर पर टीकाकरण की योजना बनाने और ज्यादा से ज्यादा नवजात बच्चों तक सुरक्षा पहुंचाने में मदद मिल सकती है। डब्ल्यूएचओ की इस मंजूरी को दुनिया के उन लाखों परिवारों के लिए उम्मीद की एक नई किरण माना जा रहा है, जिनके बच्चों पर आरएसवी का सबसे ज्यादा खतरा रहता है।

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