क्या सुरक्षित है रीसायकल प्लास्टिक पैकेजिंग में रखा हमारा खाना? एफएओ ने चेताया

एफएओ ने नई रिपोर्ट में चेताया है कि बिना कड़े नियमों के फूड पैकेजिंग में रीसायकल प्लास्टिक का बढ़ता उपयोग खाने में हानिकारक केमिकल्स और माइक्रोप्लास्टिक घोल सकता है
एक अन्य वैश्विक रिपोर्ट से पता चला है कि फूड पैकेजिंग में इस्तेमाल होने वाला प्लास्टिक हर साल खाने-पीने की चीजों में करीब 1,100 टन माइक्रोप्लास्टिक छोड़ रहा है। प्रतीकात्मक तस्वीर: आईस्टॉक
एक अन्य वैश्विक रिपोर्ट से पता चला है कि फूड पैकेजिंग में इस्तेमाल होने वाला प्लास्टिक हर साल खाने-पीने की चीजों में करीब 1,100 टन माइक्रोप्लास्टिक छोड़ रहा है। प्रतीकात्मक तस्वीर: आईस्टॉक
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सारांश
  • संयुक्त राष्ट्र खाद्य एवं कृषि संगठन (एफएओ) ने अपनी नई रिपोर्ट में आगाह किया है कि फूड पैकेजिंग में रीसायकल प्लास्टिक का बढ़ता इस्तेमाल पर्यावरण के लिए राहत जरूर हो सकता है, लेकिन यह मानव स्वास्थ्य के लिए नया खतरा भी बन सकता है।

  • रिपोर्ट के मुताबिक, यदि बिना कड़े नियमों और वैज्ञानिक निगरानी के रिसाइकल प्लास्टिक को खाने की पैकेजिंग में इस्तेमाल किया गया, तो उसमें मौजूद हानिकारक केमिकल्स, गंदगी और जहरीले तत्व भोजन तक पहुंच सकते हैं।

  • दुनिया भर में पैकेटबंद भोजन का बाजार तेजी से बढ़ रहा है और इसके साथ फूड पैकेजिंग की मांग भी लगातार बढ़ रही है। ऐसे में प्लास्टिक कचरा कम करने के लिए रिसाइकल प्लास्टिक को समाधान माना जा रहा है, लेकिन एफएओ ने सवाल उठाया है कि क्या यह वास्तव में सुरक्षित है।

  • रिपोर्ट में इस बात पर भी प्रकाश डाला गया है कि सिर्फ रिसाइकल प्लास्टिक ही नहीं, बल्कि मकई, गन्ना और कसावा जैसे पौधों से बने नए बायो-प्लास्टिक भी पूरी तरह सुरक्षित नहीं माने जा सकते। इनमें कृषि के दौरान इस्तेमाल हुए कीटनाशक, प्राकृतिक टॉक्सिन्स या एलर्जी पैदा करने वाले तत्व रह सकते हैं। साथ ही कुछ नई पैकेजिंग में नैनोमैटेरियल जैसे नए रसायन मिलाए जा रहे हैं, जिनके प्रभाव को लेकर अभी पूरी जानकारी नहीं है।

  • एक अन्य रिपोर्ट में सामने आया है कि हर साल फूड पैकेजिंग से करीब 1,100 टन माइक्रोप्लास्टिक खाने-पीने की चीजों में पहुंच रहा है, जिससे आम उपभोक्ता सालाना करीब 130 मिलीग्राम माइक्रोप्लास्टिक निगल सकता है।

  • एफएओ का कहना है कि सर्कुलर इकोनॉमी जरूरी है, लेकिन इसे सुरक्षित तरीके से लागू करना होगा। रिपोर्ट ने साफ किया है कि वैश्विक स्तर पर एक समान नियम, बेहतर कचरा छंटाई और अधिक वैज्ञानिक शोध के बिना, रीसायकल प्लास्टिक से खाद्य सुरक्षा और स्वास्थ्य दोनों पर गंभीर खतरा बढ़ सकता है।

सुनने में यह अच्छा लग सकता है कि प्लास्टिक को एक बार इस्तेमाल कर फेंकने के बजाय उसे रिसाइकल कर बार-बार उपयोग में लाया जाए। लेकिन जब यही रिसाइकल किया प्लास्टिक बिना कड़े नियमों और दिशानिर्देशों के खाने की पैकेजिंग में इस्तेमाल होने लगे, तो इसके साथ खाद्य सुरक्षा और सेहत से जुड़े जोखिम बढ़ सकते हैं।

संयुक्त राष्ट्र खाद्य एवं कृषि संगठन (एफएओ) ने भी अपनी नई रिपोर्ट में फूड पैकेजिंग के रूप में रीसायकल प्लास्टिक के बढ़ते उपयोग को लेकर चेताया है। ऐसे में भले ही पर्यावरण के लिहाज से रीसायकल प्लास्टिक एक बेहतरीन विकल्प है, लेकिन फूड पैकेजिंग के रूप में इसका उपयोग कितना सुरक्षित है इसको लेकर कई सवाल खड़े हो गए हैं।

यह सच है कि बदलती जीवनशैली के साथ आज हमारी रोजमर्रा की जिंदगी में पैकेट बंद खाने का चलन तेजी से बढ़ा है। चिप्स, कोल्ड ड्रिंक्स, रेडी-टू-ईट भोजन, मिठाइयां और जूस की बोतलें अब लगभग हर घर का हिस्सा बन चुकी हैं। सुविधा और समय की बचत को देखते हुए इन उत्पादों की मांग तेजी से बढ़ी है, जिसके साथ फूड पैकेजिंग का बाजार भी तेजी से फैल रहा है।

फूड पैकेजिंग का बढ़ता बाजार

खाने को पैक करने वाले डिब्बे, बोतलें और रैपर सिर्फ सुविधा नहीं हैं, बल्कि भोजन को लंबे समय तक सुरक्षित रखने में भी मदद करते हैं। इससे खाद्य वस्तुएं जल्दी खराब नहीं होते और बर्बादी घटती है। लेकिन खासकर प्लास्टिक से बनी यह पैकेजिंग, अब दुनिया के लिए कचरे का पहाड़ बन चुकी है।

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एक अन्य वैश्विक रिपोर्ट से पता चला है कि फूड पैकेजिंग में इस्तेमाल होने वाला प्लास्टिक हर साल खाने-पीने की चीजों में करीब 1,100 टन माइक्रोप्लास्टिक छोड़ रहा है। प्रतीकात्मक तस्वीर: आईस्टॉक

रिपोर्ट में भी सामने आया है कि 2024 में, वैश्विक स्तर पर फूड पैकेजिंग का कुल बाजार 50,527 करोड़ डॉलर था। इसको लेकर अनुमान जताए गए हैं कि यह 2030 तक 81,551 करोड़ डॉलर तक पहुंच सकता है।

एफएओ का कहना है कि आज प्लास्टिक कचरे का 10 फीसदी से भी कम हिस्सा रिसाइकल हो रहा है। ऐसे में आने वाले वर्षों में यह हिस्सा बढ़ेगा, क्योंकि देश और कंपनियां पर्यावरण बचाने के लिए रिसाइकल प्लास्टिक की ओर बढ़ रही हैं। लेकिन सवाल यह है कि क्या यह प्लास्टिक हमारे खाने के लिए सुरक्षित है?

क्या प्लास्टिक से खाने में खुल रहा जहर?

रिपोर्ट में खुलासा हुआ है कि रिसाइकल प्लास्टिक में पहले इस्तेमाल के दौरान मौजूद रसायन, गंदगी या जहरीले तत्व पूरी तरह साफ न हों तो वे खाने में पहुंच सकते हैं। यानी जिस पैकेजिंग में खाना रखा जाए, वही धीरे-धीरे जहरीले केमिकल भोजन में छोड़ सकती है।

एफएओ के एग्रीफूड सिस्टम्स और फूड सेफ्टी डिवीजन की निदेशक कोरिना हॉक्स का इस बारे में कहना है, “हम ज्यादा से ज्यादा प्लास्टिक को रीसायकल करना चाहते हैं, लेकिन यह भी सुनिश्चित करना जरूरी है कि एक समस्या हल करते हुए नई समस्याएं न पैदा हो।" उनके मुताबिक पर्यावरण अनुकूल कृषि-खाद्य व्यवस्था की ओर बढ़ते समय, खाद्य सुरक्षा को केंद्र में रखना बेहद जरूरी है।

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रिपोर्ट में इस बात पर भी प्रकाश डाला गया है कि सिर्फ रिसाइकल प्लास्टिक ही नहीं, बल्कि मकई, गन्ना और कसावा जैसे पौधों से बने नए बायो-प्लास्टिक भी पूरी तरह सुरक्षित नहीं माने जा सकते। इनमें कृषि के दौरान इस्तेमाल हुए कीटनाशक, प्राकृतिक टॉक्सिन्स या एलर्जी पैदा करने वाले तत्व रह सकते हैं। साथ ही कुछ नई पैकेजिंग में नैनोमैटेरियल जैसे नए रसायन मिलाए जा रहे हैं, जिनके प्रभाव को लेकर अभी पूरी जानकारी नहीं है।

हर साल भोजन में पहुंच रहा 1,100 टन माइक्रोप्लास्टिक

एक और चिंता माइक्रोप्लास्टिक और नैनोप्लास्टिक को लेकर है। प्लास्टिक के ये बेहद महीन कण खाने और पेय पदार्थों में पहुंच सकते हैं।

रिपोर्ट कहती है कि अभी तक इन्हें सही ढंग से पहचानने और मापने की वैश्विक तकनीक पूरी तरह विकसित नहीं हुई है। यही वजह है कि नियामक एजेंसियां अभी मानव स्वास्थ्य पर इनके प्रभाव का पूरी तरह आकलन नहीं कर पाई हैं।

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इस बारे में जारी एक अन्य वैश्विक रिपोर्ट से पता चला है कि फूड पैकेजिंग में इस्तेमाल होने वाला प्लास्टिक हर साल खाने-पीने की चीजों में करीब 1,100 टन माइक्रोप्लास्टिक छोड़ रहा है। यह आंकड़ा बेहद चिंताजनक है क्योंकि रोजमर्रा की पैकेजिंग के जरिए लोग सीधे प्लास्टिक के इन महीन कणों के संपर्क में आ रहे हैं।

विश्लेषण के मुताबिक, एक आम उपभोक्ता सालभर में औसतन करीब 130 मिलीग्राम माइक्रोप्लास्टिक निगल सकता है। वहीं, पैकेज्ड खाद्य पदार्थों पर ज्यादा निर्भर रहने वाले लोगों के शरीर में यह मात्रा एक ग्राम से भी अधिक हो सकती है।

विशेषज्ञों का भी कहना है सर्कुलर इकोनॉमी के सिद्धांत को अपनाना जरूरी है, लेकिन इसे सही तरीके से लागू करना होगा। अगर ऐसा नहीं हुआ, तो रीसायकिलिंग के दौरान संभावित रासायनिक प्रदूषण से खाद्य सुरक्षा और स्वास्थ्य के लिए खतरा पैदा हो सकता है।

ऐसे में एफएओ ने सुझाव दिया है कि फूड पैकेजिंग के लिए इस्तेमाल होने वाले प्लास्टिक को अलग से छांटा जाए और उसे सफाई की खास प्रक्रिया से गुजारा जाए, ताकि उसमें मौजूद रसायन हट सकें। इसके लिए देशों को कचरे की बेहतर छंटाई और एक समान नियम बनाने होंगे।

कड़े नियमों के बिना बढ़ सकता है खतरा

एक बड़ी चुनौती यह है कि कई ऐसे पदार्थ हैं, जिनके खाद्य सुरक्षा पर असर को लेकर वैज्ञानिक जानकारी अभी बेहद सीमित है। ऐसे में यह समझने के लिए और गहन शोध की जरूरत है कि ये रसायन कैसे बनते हैं, क्या ये पैकेजिंग से निकलकर भोजन तक पहुंचते हैं, और यदि पहुंचते हैं तो किस रास्ते और किस मात्रा में हमारे शरीर में प्रवेश करते हैं।

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रिपोर्ट का एक बड़ा संकेत व्यापार से भी जुड़ा है। आज अलग-अलग देशों में फूड पैकेजिंग को लेकर अलग-अलग नियम हैं। इससे अंतरराष्ट्रीय व्यापार में परेशानी आती है। रिपोर्ट का कहना है कि जब तक पूरी दुनिया में पैकेजिंग सुरक्षा को लेकर एक जैसे कड़े वैश्विक नियम नहीं होंगे, तब तक उपभोक्ताओं की रक्षा और निष्पक्ष व्यापार संभव नहीं है।

इस मुद्दे पर आगे चर्चा 'कोडेक्स एलिमेंटेरियस आयोग' में होगी, जिसे विश्व स्वास्थ्य संगठन और एफएओ ने मिलकर बनाया है। यह वह संस्था है जो उपभोक्ताओं के स्वास्थ्य की सुरक्षा और वैश्विक व्यापार को सुगम बनाने के लिए अन्तरराष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा मानक तय करती है।

असल सवाल यही है, क्या हम धरती को प्लास्टिक से बचाने की कोशिश में अपने खाने को रसायनों के हवाले कर रहे हैं? एफएओ की यह रिपोर्ट याद दिलाती है कि पर्यावरण और इंसानी सेहत, दोनों को साथ लेकर चलना ही असली समाधान है।

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