

हैती में बचपन भूख, गरीबी और असुरक्षा के बीच दम तोड़ रहा है। पांच साल से कम उम्र के लगभग हर 13 में से एक बच्चा गंभीर कुपोषण की चपेट में है।
राष्ट्रीय पोषण सर्वेक्षण 2026 के शुरुआती आंकड़ों के मुताबिक, 6 से 59 महीने के बच्चों में गंभीर कुपोषण की दर 2023 के 5.1 फीसदी से बढ़कर 2026 में 7.4 फीसदी हो गई है।
लंबे समय से जारी हिंसा, आर्थिक बदहाली और मानवीय संकट ने परिवारों के लिए पौष्टिक भोजन, इलाज और जरूरी पोषण सेवाओं तक पहुंच मुश्किल कर दी है। इस बीच 2023 से 2025 के दौरान बच्चों के खिलाफ गंभीर उल्लंघनों की घटनाएं भी तीन गुना बढ़ी हैं।
हालांकि, इस भयावह तस्वीर के बीच कुछ उम्मीद भी दिखाई देती है। पांच साल से कम उम्र के बच्चों में बौनेपन की दर घटी है और स्तनपान से जुड़े आंकड़ों में उल्लेखनीय सुधार हुआ है।
यूनिसेफ और उसके सहयोगी संगठन कुपोषित बच्चों की पहचान और इलाज के लिए दूरदराज के इलाकों तक पहुंच बना रहे हैं, लेकिन पोषण कार्यक्रमों के लिए 64 फीसदी से अधिक फंडिंग की कमी बड़ी चुनौती बनी हुई है। कुपोषण की लड़ाई सिर्फ आंकड़ों की नहीं, बल्कि हर उस मासूम की जिंदगी और भविष्य को बचाने की लड़ाई है।
जिस उम्र में बच्चों के हाथों में खिलौने और आंखों में सपने होने चाहिए, उस उम्र में हैती के हजारों बच्चे भूख और कुपोषण से जूझ रहे हैं।
देश में पांच साल से कम उम्र का लगभग हर 13वां बच्चा गंभीर कुपोषण की चपेट में है। यानी गरीबी और डर के साए में पल रहे इन हजारों मासूमों के सामने भरपेट और पौष्टिक भोजन के साथ-साथ जरूरी इलाज का भी संकट बना हुआ है। रुझान दर्शाते हैं कि 2023 के बाद से हालात और बिगड़े हैं, जो बताता है कि वहां भूख अब सिर्फ पेट की नहीं, बल्कि बच्चों के भविष्य की भी लड़ाई बन चुकी है।
यह जानकारी राष्ट्रीय पोषण सर्वेक्षण (स्मार्ट 2026) के शुरूआती आंकड़ों में सामने आई है। सर्वेक्षण के मुताबिक, साल 2023 में जहां हैती के 5.1 फीसदी बच्चे गंभीर कुपोषण से जूझ रहे थे, वहीं 2026 में यह आंकड़ा बढ़कर 7.4 फीसदी पर पहुंच गया है।
गरीबी और असुरक्षा ने बढ़ाया संकट
यूनिसेफ के मुताबिक, ये आंकड़े ऐसे समय सामने आए हैं जब हैती लंबे समय से असुरक्षा, आर्थिक मुश्किलों और गंभीर मानवीय संकट से गुजर रहा है। इन हालात ने परिवारों के लिए पर्याप्त पौष्टिक भोजन, स्वास्थ्य सेवाओं और पोषण संबंधी मदद तक पहुंच को बेहद मुश्किल बना दिया है।
यूनिसेफ के हैती में उप प्रतिनिधि यानिग दुसार्ट का इस बारे में कहना है, “हैती में बच्चों को कुपोषण से बचाने और उसका इलाज करने के लिए तत्काल कदम उठाने की जरूरत है, ताकि बच्चों को समय पर जीवनरक्षक सेवाएं मिल सकें, जिनकी उन्हें बेहद जरूरत है।“
गौरतलब है कि कुपोषण की गंभीर स्थिति केवल भूख का नाम नहीं है। जब बच्चों को लंबे समय तक पर्याप्त और पौष्टिक आहार नहीं मिलता या वे बार-बार बीमार पड़ते हैं, इससे उनका शरीर तेजी से कमजोर होने लगता है। खासकर बेहद गंभीर कुपोषण से जूझ रहे बच्चों में मृत्यु का खतरा बेहद बढ़ जाता है।
स्थिति तब और गंभीर होती है जब बच्चे कुपोषण के साथ-साथ दूसरी बीमारियों से भी जूझ रहे होते हैं। इस दौरान स्वास्थ्य सेवाओं तक सीमित पहुंच बच्चों की स्थिति को और गंभीर बना देती है।
बच्चों के खिलाफ अत्याचार जैसी गंभीर घटनाएं भी बढ़ीं
हैती में बच्चों के लिए हालात इसलिए भी चिंताजनक हैं क्योंकि 2023 से 2025 के बीच बच्चों के खिलाफ गंभीर उल्लंघनों के मामले तीन गुणा बढ़ गए हैं। इनमें बच्चों को मानवीय सहायता से वंचित करना और उन स्कूलों तथा अस्पतालों पर हमले शामिल हैं, जहां बच्चों को पोषण और स्वास्थ्य सेवाएं मिलती हैं।
ऐसे हालात में सबसे ज्यादा असर उन बच्चों पर पड़ता है, जिन्हें पहले से ही भोजन, इलाज और सुरक्षित वातावरण की सबसे ज्यादा जरूरत होती है।
गौरतलब है कुपोषण की गंभीर स्थिति बच्चे के नन्हे शरीर को तेजी से कमजोर कर देती है। शरीर में ताकत और पोषण की कमी के कारण मामूली-सी बीमारी भी जानलेवा बन सकती है। समय पर पौष्टिक आहार और इलाज न मिले तो इन मासूम जिंदगियों पर मौत का खतरा मंडराने लगता है।
कुछ मोर्चों पर दिखी उम्मीद
हालांकि कुपोषण के ये आंकड़े चिंता बढ़ा देते हैं, लेकिन इस डरावनी तस्वीर के बीच कुछ राहत भरी खबरें भी हैं। सर्वेक्षण में कुछ सकारात्मक बदलाव भी सामने आए हैं। पांच साल से कम उम्र के बच्चों में लम्बे समय तक कुपोषण यानी बौनापन की दर 2023 में 22.8 फीसदी से घटकर 2026 में 17.3 फीसदी रह गई है।
इसके अलावा, जन्म के तुरंत बाद स्तनपान शुरू करने की दर 48 फीसदी से बढ़कर 68 फीसदी हो गई है। वहीं, छह महीने तक केवल मां का दूध देने की दर भी 17.5 फीसदी से बढ़कर 33 फीसदी पहुंच गई है।
रिपोर्ट के मुताबिक यूनिसेफ और उसके सहयोगी संगठन हैती के स्वास्थ्य मंत्रालय के साथ मिलकर कुपोषित बच्चों की पहचान और इलाज का दायरा बढ़ा रहे हैं। इसके लिए सामुदायिक स्वास्थ्य कार्यकर्ताओं और मोबाइल स्वास्थ्य टीमों की मदद ली जा रही है, जो दुर्गम और असुरक्षित इलाकों तक पहुंचने का प्रयास कर रही हैं।
भारत सहित दुनिया में भी गंभीर है स्थिति
वैश्विक स्तर पर देखें तो ग्लोबल बर्डन ऑफ डिजीज रिपोर्ट ने खुलासा किया है कि कुपोषण, नाटापन और कमजोरी मिलकर हर साल 10 लाख मासूम जिंदगियां निगल रहे हैं। यह समस्या उप-सहारा अफ्रीका और दक्षिण एशिया सबसे ज्यादा गंभीर है।
भारत से जुड़े आंकड़ों को देखें तो संयुक्त राष्ट्र द्वारा जारी रिपोर्ट "लेवल्स एंड ट्रेंड इन चाइल्ड मालन्यूट्रिशन 2023" के मुताबिक वेस्टिंग के शिकार आधे बच्चे भारतीय हैं। रिपोर्ट के मुताबिक भारत में पांच वर्ष से कम उम्र के 2.19 करोड़ बच्चों का वजन उनकी ऊंचाई की तुलना में कम है। मतलब की देश के 18.7 फीसदी बच्चे वेस्टिंग का शिकार हैं।
मदद की भारी कमी, बच्चों की जिंदगी पर असर
इस बढ़ते मानवीय संकट के बीच यूनिसेफ ने पोषण संबंधी कार्यक्रमों के लिए तत्काल अधिक आर्थिक मदद की अपील की है। संगठन के 2026 के मानवीय सहायता कार्यक्रम में पोषण संबंधी पहलों के लिए 64 फीसदी से अधिक फंडिंग की कमी बनी हुई है।
यह धन कुपोषण की समय पर पहचान, इलाज, तुरंत उपयोग किए जा सकने वाले चिकित्सीय खाद्य आपूर्ति और कमजोर बच्चों तथा महिलाओं तक पोषण संबंधी जरूरी सेवाएं पहुंचाने के लिए बेहद जरूरी है।
देखा जाए तो कुपोषण की लड़ाई सिर्फ आंकड़ों को बदलने की जंग नहीं है, बल्कि बच्चों की जिंदगी बचाने की जद्दोजहद है। हर प्रतिशत के पीछे एक बच्चा है, एक सपना है, एक परिवार की उम्मीद है और एक ऐसी जिंदगी है, जिसे समय पर भोजन, इलाज और थोड़ी-सी मदद देकर बचाया जा सकता है।
हैती में पर्याप्त संसाधन, पोषण सेवाओं तक आसान पहुंच और समय पर इलाज हजारों बच्चों को कुपोषण की गंभीर, यहां तक कि जानलेवा स्थिति से बचा सकते हैं। अब जरूरत सिर्फ हालात गिनने की नहीं, बल्कि हर उस बच्चे तक मदद पहुंचाने की है, जिसकी जिंदगी अभी भी बचाई जा सकती है।