

कांगो में इबोला के 635 पुष्ट मामले और 127 मौतें दर्ज, डब्ल्यूएचओ ने खतरे का स्तर बहुत ज्यादा बताया।
युगांडा में 19 पुष्ट मामले और दो मौतें सामने आईं, कई संक्रमण कांगो से जुड़े पाए गए।
कमजोर स्वास्थ्य व्यवस्था, सीमावर्ती आवाजाही, संघर्ष और गलत सूचना के कारण संक्रमण नियंत्रण प्रयास प्रभावित हो रहे।
केन्या में कोई पुष्ट मामला नहीं मिला, लेकिन क्षेत्रीय खतरे को देखते हुए निगरानी लगातार बढ़ाई गई।
अफ्रीका के दो देशों, डेमोक्रेटिक रिपब्लिक ऑफ कांगो (डीआरसी) और युगांडा में इबोला वायरस का प्रकोप लगातार बढ़ता जा रहा है। विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) की ताजा जोखिम आकलन रिपोर्ट के अनुसार, प्रभावित क्षेत्रों में स्थिति पहले से अधिक गंभीर हो गई है। हालांकि, दुनिया के बाकी हिस्सों के लिए इस बीमारी का खतरा अभी भी कम माना जा रहा है।
कांगो में तेजी से फैल रहा संक्रमण
कांगो इस समय इबोला प्रकोप का सबसे बड़ा केंद्र बना हुआ है। सेंटर्स फॉर डिजीज कण्ट्रोल एंड प्रिवेंशन (सीडीसी) के आंकड़ों के मुताबिक, नौ जून, 2026 तक वहां 635 पुष्ट मामले और 127 मौतें दर्ज की गई हैं। स्वास्थ्य अधिकारियों के अनुसार, देश के 159 स्वास्थ्य क्षेत्र ऐसे हैं जो प्रभावित, जोखिम वाले या उच्च जोखिम की श्रेणी में हैं। इससे पता चलता है कि वायरस कई प्रांतों में फैल चुका है, जिनमें इतुरी और नॉर्थ किवु जैसे क्षेत्र भी शामिल हैं।
विशेषज्ञों का मानना है कि यह वायरस मार्च 2026 से ही बिना पहचान में आए फैल रहा हो सकता है। इसी कारण कई अलग-अलग संक्रमण श्रृंखलाएं बन गईं और बीमारी को नियंत्रित करना मुश्किल हो गया।
युगांडा में भी बढ़ी चिंता
युगांडा में भी इबोला के मामले सामने आए हैं। सीडीसी के अनुसार, आठ जून तक देश में 19 पुष्ट मामले और दो मौतें दर्ज की गईं। इसके अलावा एक संदिग्ध मामले की भी जानकारी है।
स्वास्थ्य अधिकारियों का कहना है कि युगांडा के कई मामले कांगो से जुड़े हुए हैं। संक्रमित लोगों में स्वास्थ्यकर्मी भी शामिल हैं, जिससे अस्पतालों और स्वास्थ्य केंद्रों में चिंता बढ़ गई है। दोनों देशों के बीच लोगों की आवाजाही जारी रहने के कारण संक्रमण फैलने का खतरा बना हुआ है।
कई कारणों से बिगड़ रही स्थिति
विशेषज्ञों के अनुसार, इस प्रकोप के पीछे कई कारण हैं। कांगो और युगांडा के सीमावर्ती क्षेत्रों में खनन, व्यापार, विस्थापन और इलाज के लिए लोगों का लगातार आना-जाना होता है। इससे वायरस को नए इलाकों तक पहुंचने का मौका मिल रहा है।
इसके अलावा, कई क्षेत्रों में असुरक्षा और संघर्ष की स्थिति बनी हुई है। इससे निगरानी और बचाव कार्य प्रभावित हो रहे हैं। कमजोर स्वास्थ्य व्यवस्था, जांच में देरी, सीमित आइसोलेशन सुविधाएं और संक्रमण रोकथाम के उपायों की कमी भी समस्या को और गंभीर बना रही है।
स्वास्थ्यकर्मी और बच्चे सबसे अधिक प्रभावित
रिपोर्ट के अनुसार, अब तक कम से कम 16 स्वास्थ्यकर्मी संक्रमित हो चुके हैं। यह स्थिति चिंताजनक है क्योंकि स्वास्थ्यकर्मी ही मरीजों के इलाज और संक्रमण रोकने की जिम्मेदारी निभाते हैं।
बच्चों को भी इस प्रकोप में विशेष रूप से संवेदनशील माना गया है। स्वास्थ्य अधिकारियों का कहना है कि बच्चों की सुरक्षा के लिए अतिरिक्त उपायों की आवश्यकता है ताकि संक्रमण को और फैलने से रोका जा सके।
वैक्सीन और इलाज की चुनौती
इस समय बुंडिबुग्यो वायरस से होने वाले इबोला के लिए कोई लाइसेंस प्राप्त वैक्सीन या विशेष उपचार उपलब्ध नहीं है। यही कारण है कि संक्रमित लोगों की पहचान, उन्हें अलग रखना और उनके संपर्क में आए लोगों की निगरानी करना सबसे महत्वपूर्ण उपाय बने हुए हैं। स्वास्थ्य एजेंसियां लगातार निगरानी और जागरूकता अभियान चला रही हैं, लेकिन संसाधनों की कमी एक बड़ी चुनौती बनी हुई है।
अफवाहें भी बढ़ा रहीं खतरा
डब्ल्यूएचओ ने चेतावनी दी है कि समुदायों में फैली गलत जानकारी, डर और अविश्वास भी बीमारी के प्रसार को बढ़ा रही है। कई लोग जांच कराने या स्वास्थ्य अधिकारियों से संपर्क करने से बच रहे हैं। कुछ क्षेत्रों में सुरक्षित अंतिम संस्कार संबंधी नियमों का पालन भी नहीं किया जा रहा है, जिससे संक्रमण फैलने का खतरा बढ़ जाता है।
डब्ल्यूएचओ का कहना है कि लोगों को सही जानकारी देना और समुदायों का विश्वास जीतना संक्रमण रोकने के लिए बेहद जरूरी है।
पड़ोसी देशों में सतर्कता
कांगो और युगांडा से लगती सीमाओं वाले देशों को भी भारी जोखिम की श्रेणी में रखा गया है। सीमाओं पर लोगों की आवाजाही, कमजोर निगरानी व्यवस्था और सीमित प्रयोगशाला क्षमता के कारण इन देशों में भी संक्रमण पहुंचने की आशंका बनी हुई है।
हालांकि अभी तक बीमारी का अंतरराष्ट्रीय स्तर पर लगातार प्रसार नहीं देखा गया है। इसी वजह से वैश्विक जोखिम को कम आंका गया है।
केन्या में नहीं मिला कोई मामला
पूर्वी अफ्रीका का देश केन्या फिलहाल इस प्रकोप से सुरक्षित है। वहां अभी तक कांगो और युगांडा से जुड़े इबोला का कोई पुष्ट मामला सामने नहीं आया है। फिर भी स्वास्थ्य अधिकारी पूरी सतर्कता बरत रहे हैं और निगरानी व्यवस्था को मजबूत बनाए हुए हैं।
विशेषज्ञों का मानना है कि यदि प्रभावित क्षेत्रों में तेजी से नियंत्रण उपाय लागू नहीं किए गए, तो आने वाले समय में प्रकोप और गंभीर रूप ले सकता है। इसलिए अंतरराष्ट्रीय सहयोग, मजबूत स्वास्थ्य सेवाएं और लोगों की जागरूकता इस चुनौती से निपटने के लिए बेहद जरूरी हैं।