कांगो में इबोला प्रकोप पर काबू पाने की कोशिश तेज, चुनौतियां अब भी बरकरार

कांगो में इबोला के 344 मामले व 60 मौतें दर्ज, संदिग्ध मामले घटकर 116 रह गए हैं, लेकिन खतरा अभी भी बरकरार; डब्ल्यूएचओ ने जांच, संपर्क ट्रेसिंग और स्वास्थ्य सेवाएं मजबूत करने पर जोर दिया।
पिछले सप्ताह जहां इबोला के 1,000 से अधिक संदिग्ध मामले थे, वहीं अब यह संख्या घटकर 116 रह गई है।
पिछले सप्ताह जहां इबोला के 1,000 से अधिक संदिग्ध मामले थे, वहीं अब यह संख्या घटकर 116 रह गई है।प्रतीकात्मक तस्वीर, साभार: आईस्टॉक
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सारांश
  • कांगो में इबोला के 344 मामले और 60 मौतें दर्ज, संदिग्ध मामले तेजी से घटकर 116 रह गए हैं।

  • डब्ल्यूएचओ ने बताया राष्ट्रीय स्तर पर जोखिम बहुत अधिक, क्षेत्रीय उच्च और वैश्विक स्तर पर कम बना हुआ है।

  • इलाज केंद्रों का विस्तार हुआ, बुनिया, गोमा, बेनी सहित कई शहरों में मरीजों के लिए सुविधाएं बढ़ाई गईं हैं।

  • संपर्क ट्रेसिंग केवल 45 प्रतिशत तक सीमित, डब्ल्यूएचओ ने इसे 90 प्रतिशत से ऊपर ले जाने की आवश्यकता बताई।

  • वैक्सीन और दवा की कमी के कारण चुनौती बढ़ी, समुदायों का अविश्वास और जांच क्षमता प्रमुख बाधाएं बनी हुई हैं।

कांगो लोकतांत्रिक गणराज्य (डीआरसी) में फैले इबोला प्रकोप को नियंत्रित करने के लिए प्रयास तेज हो गए हैं। विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) ने कहा है कि सरकार और अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं के संयुक्त प्रयासों से अब स्थिति में सुधार दिखाई देने लगा है। हालांकि कई बड़ी चुनौतियां अभी भी सामने हैं।

डब्ल्यूएचओ के महानिदेशक टेड्रोस अधानोम घेब्रेयेसस ने हाल ही में डीआरसी का दौरा किया। जिनेवा में आयोजित एक प्रेस वार्ता में उन्होंने कहा कि देश में लोगों और सरकार की प्रतिबद्धता देखकर उन्हें काफी उम्मीद मिली है। उन्होंने कहा कि चुनौतियां अभी भी मौजूद हैं, लेकिन हालात पहले से बेहतर हो रहे हैं।

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संक्रमण और मौतों के आंकड़े

डब्ल्यूएचओ के अनुसार, डीआरसी में अब तक इबोला के 344 मामलों की पुष्टि हो चुकी है। इनमें 60 लोगों की मौत हो चुकी है। यह बीमारी तीन प्रांतों के 24 स्वास्थ्य क्षेत्रों में फैल चुकी है।

हालांकि एक अच्छी बात यह है कि संदिग्ध मामलों की संख्या में बड़ी कमी आई है। पिछले सप्ताह जहां 1,000 से अधिक संदिग्ध मामले थे, वहीं अब यह संख्या घटकर 116 रह गई है। इससे संकेत मिलता है कि निगरानी और जांच व्यवस्था में सुधार हो रहा है।

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जोखिम का स्तर बना हुआ है ऊंचा

विश्व स्वास्थ्य संगठन ने इबोला के जोखिम स्तर में कोई बदलाव नहीं किया है। संगठन के अनुसार, डीआरसी के भीतर जोखिम बहुत अधिक बना हुआ है। क्षेत्रीय स्तर पर जोखिम उच्च है, जबकि वैश्विक स्तर पर जोखिम अभी भी कम माना जा रहा है।

टेड्रोस ने कहा कि बीमारी को फैलने का काफी समय मिल गया था और शुरुआती चरण में प्रतिक्रिया पर्याप्त तेज नहीं थी। लेकिन अब सरकार के नेतृत्व में हालात पर नियंत्रण पाने की दिशा में तेजी से काम हो रहा है।

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इलाज की सुविधाओं का विस्तार

इबोला मरीजों के इलाज के लिए कई नए उपचार केंद्र स्थापित किए गए हैं। बुनिया शहर में अब तीन उपचार केंद्र काम कर रहे हैं, जिनमें कुल 80 बिस्तरों की व्यवस्था है। इसके अलावा मोंगबवालु, बेनी, गोमा, बुकावू और अन्य क्षेत्रों में भी उपचार इकाइयां संचालित की जा रही हैं।

अब तक डीआरसी में छह मरीज और युगांडा में दो मरीज स्वस्थ होकर घर लौट चुके हैं। स्वास्थ्य विशेषज्ञों का कहना है कि समय पर इलाज मिलने पर इबोला से बचना संभव है। इसलिए लक्षण दिखाई देने पर तुरंत स्वास्थ्य केंद्र पहुंचना बेहद जरूरी है।

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चीन की मदद भी पहुंची

इबोला से निपटने के लिए अंतरराष्ट्रीय सहयोग भी बढ़ रहा है। चीन का एक चिकित्सा विशेषज्ञ दल राजधानी किंशासा पहुंचा है। यह दल तीन महीने तक डीआरसी में रहकर स्थानीय स्वास्थ्य संस्थानों के साथ काम करेगा।

चीन के विशेषज्ञ महामारी के आकलन, मरीजों के उपचार और रोग नियंत्रण संबंधी कार्यों में सहयोग देंगे। इससे स्थानीय स्वास्थ्य व्यवस्था को मजबूती मिलने की उम्मीद है।

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जांच और संपर्क खोजने की चुनौती

डब्ल्यूएचओ ने बताया कि सबसे बड़ी चुनौतियों में से एक जांच क्षमता को बढ़ाना है। कई क्षेत्रों में प्रयोगशालाओं और जांच सुविधाओं की कमी के कारण मामलों की पुष्टि में देरी हो रही है।

संगठन अब विभिन्न क्षेत्रों में जांच सुविधाओं को स्थानीय स्तर पर उपलब्ध कराने का प्रयास कर रहा है ताकि मरीजों की पहचान जल्दी हो सके और समय पर कार्रवाई की जा सके।

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इसके अलावा संक्रमित व्यक्ति के संपर्क में आए लोगों का पता लगाना भी बड़ी चुनौती बना हुआ है। वर्तमान में केवल लगभग 45 प्रतिशत संपर्कों की निगरानी हो पा रही है। विशेषज्ञों का मानना है कि इस संख्या को 90 प्रतिशत से अधिक तक ले जाना जरूरी है।

समुदाय में अविश्वास भी चिंता का कारण

इबोला नियंत्रण में एक और बड़ी बाधा लोगों का अविश्वास है। टेड्रोस ने बताया कि कुछ समुदायों के नेताओं का मानना है कि इबोला जैसी कोई बीमारी है ही नहीं। ऐसी स्थिति में लोगों को जागरूक बनाना और उनका विश्वास जीतना बेहद जरूरी हो जाता है। स्वास्थ्य अधिकारियों का कहना है कि जब तक लोग बीमारी को गंभीरता से नहीं लेंगे, तब तक इसके प्रसार को पूरी तरह रोकना मुश्किल होगा।

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वैक्सीन और दवा की कमी

वर्तमान प्रकोप जिस बंडिबुग्यो इबोला वायरस स्ट्रेन के कारण फैला है, उसके लिए अभी कोई स्वीकृत वैक्सीन या विशेष दवा उपलब्ध नहीं है। यही कारण है कि स्वास्थ्य एजेंसियों को बीमारी के नियंत्रण में अतिरिक्त कठिनाइयों का सामना करना पड़ रहा है।

डब्ल्यूएचओ और उसके सहयोगी संगठन जल्द से जल्द क्लीनिकल परीक्षण शुरू करने और नए उपचार विकल्प विकसित करने की दिशा में काम कर रहे हैं।

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भविष्य के लिए मजबूत स्वास्थ्य व्यवस्था जरूरी

टेड्रोस ने कहा कि इस प्रकोप को समाप्त करना ही अंतिम लक्ष्य नहीं है। उनका मानना है कि असली सफलता तब होगी जब भविष्य में होने वाले नए इबोला प्रकोपों को रोका जा सके।

उन्होंने कहा कि प्रभावित क्षेत्रों के लोगों को केवल इबोला ही नहीं, बल्कि मलेरिया, कुपोषण, निमोनिया, एचआईवी, मधुमेह और दस्त जैसी कई अन्य स्वास्थ्य समस्याओं का भी सामना करना पड़ता है। इसलिए लंबे समय के समाधान के लिए मजबूत स्वास्थ्य सेवाओं का निर्माण आवश्यक है।

डब्ल्यूएचओ ने भरोसा जताया है कि डीआरसी सरकार के नेतृत्व में यह प्रकोप भी नियंत्रित कर लिया जाएगा। संगठन ने कहा कि वह वर्तमान संकट खत्म होने के बाद भी स्थानीय समुदायों और सरकार के साथ मिलकर स्वास्थ्य सेवाओं को मजबूत बनाने का काम जारी रखेगा।

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