

डब्ल्यूएचओ ने बंडिबुग्यो वायरस के लिए किसी भी स्वीकृत दवा या टीके के अभाव में केवल क्लिनिकल ट्रायल की अनुमति दी।
विशेषज्ञों ने एमबीपी134, माफ्टिविमैब और रेमडेसिविर को इलाज हेतु प्राथमिक उम्मीदवार मानते हुए संयोजन चिकित्सा पर शोध की सिफारिश की।
संपर्क में आए लोगों के लिए ओबेलडेसिविर को रोकथाम विकल्प के रूप में प्राथमिकता दी गई, लेकिन निगरानी प्रणाली मजबूत होना आवश्यक।
आरवीएसवी बंडिबुग्यो और चाडऑक्स1 वैक्सीन को प्रमुख टीका उम्मीदवार बताया गया, जो अलग अलग जोखिम समूहों में उपयोग के लिए।
डब्ल्यूएचओ ने कहा कि मौजूदा इबोला टीका एरवेदो बंडिबुग्यो वायरस पर अनिश्चित प्रभाव रखता है, इसलिए केवल शोध में प्रयोग।
विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) ने डेमोक्रेटिक रिपब्लिक ऑफ कांगो और युगांडा में फैल रहे इबोला रोग के नए प्रकार, जिसे बंडिबुग्यो वायरस डिजीज (बीवीडी) कहा जाता है, को लेकर गंभीर चेतावनी दी है। यह रोग इबोला वायरस रोग समूह का ही एक हिस्सा है, जिसे सामान्य रूप से इबोला वायरस डिजीज कहा जाता है।
डब्ल्यूएचओ के अनुसार, इस समय इस बीमारी के लिए कोई भी विशेष रूप से स्वीकृत टीका या दवा उपलब्ध नहीं है। हालांकि कुछ संभावित टीके और दवाएं परीक्षण के चरण में हैं, जिन पर विशेषज्ञों ने ध्यान केंद्रित करने की सलाह दी है।
डब्ल्यूएचओ के मुताबिक, 15 मई को प्रकोप घोषित होने के बाद से डेमोक्रेटिक रिपब्लिक ऑफ कांगो में अब तक 10 पुष्ट और 223 संदिग्ध इबोला मौतें दर्ज हुई हैं, जबकि कुल मामलों की संख्या 1,000 से अधिक बताई गई है। यह आंकड़े 24 मई तक के उपलब्ध नवीनतम आंकड़ों पर आधारित हैं।
विशेषज्ञ समूहों की बैठक
डब्ल्यूएचओ ने इस प्रकोप को देखते हुए कई तकनीकी और सलाहकार समूहों की बैठकें बुलाईं। इन समूहों में वैज्ञानिक, चिकित्सक और वैक्सीन विशेषज्ञ शामिल थे। उन्होंने यह मूल्यांकन किया कि कौन-कौन सी दवाएं और टीके इस बीमारी के इलाज और रोकथाम में उपयोगी हो सकते हैं।
सभी विशेषज्ञों ने सहमति जताई कि फिलहाल इन सभी संभावित उत्पादों का उपयोग केवल क्लिनिकल ट्रायल यानी वैज्ञानिक परीक्षणों में ही किया जाना चाहिए, ताकि इनके प्रभाव और सुरक्षा के बारे में पुख्ता जानकारी मिल सके।
इलाज के लिए संभावित दवाएं
डब्ल्यूएचओ के विशेषज्ञों ने बंडिबुग्यो वायरस से संक्रमित मरीजों के इलाज के लिए तीन मुख्य दवाओं को प्राथमिकता दी है। इनमें दो प्रकार की मोनोक्लोनल एंटीबॉडी दवाएं शामिल हैं -एमबीपी134 और माफ्टिविमैब। इसके अलावा एंटीवायरल दवा रेमडेसिविर को भी संभावित उपचार के रूप में शामिल किया गया है।
विशेषज्ञों का मानना है कि इन दवाओं को अकेले या फिर मिलाकर इस्तेमाल करने पर बेहतर परिणाम मिल सकते हैं। इसलिए संयोजन उपचार (कम्बिनेशन थेरेपी) पर भी विशेष अध्ययन किया जाएगा।
संक्रमण से बचाव के उपाय
बीमारी से बचाव के लिए भी कुछ नए विकल्पों पर शोध किया जा रहा है। इनमें एक दवा ओबेलडेसिविर शामिल है, जिसे उन लोगों को दिया जा सकता है जो संक्रमित मरीजों के संपर्क में आए हों। इसे पोस्ट-एक्सपोजर प्रॉफिलैक्सिस कहा जाता है।
लेकिन यह तरीका तभी सफल हो सकता है जब संपर्क में आए लोगों की सही पहचान और निगरानी समय पर हो सके, जो कई इलाकों में एक बड़ी चुनौती बनी हुई है।
टीकों पर शोध
टीकों के क्षेत्र में भी कई महत्वपूर्ण प्रगति हो रही है। सबसे आगे चल रहे उम्मीदवारों में एक सिंगल डोज वैक्सीन आरवीएसवी बंडिबुग्यो है, जिसे इंटरनेशनल एड्स वैक्सीन इनिशिएटिव (आईएवीआई) विकसित कर रहा है। इसे तैयार होने में लगभग सात से नौ महीने लग सकते हैं, जिसके बाद इसका क्लिनिकल ट्रायल किया जाएगा।
इसके अलावा ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी और सीरम इंस्टीट्यूट ऑफ इंडिया द्वारा विकसित चाडऑक्स1 बंडिबुग्यो वैक्सीन भी चर्चा में है। यह दो से तीन महीनों में ट्रायल के लिए उपलब्ध हो सकती है, लेकिन इसके लिए अभी और पशु परीक्षणों के आंकड़ों की आवश्यकता है।
विशेषज्ञों ने यह भी बताया कि यह वैक्सीन अलग-अलग समूहों के लिए अलग तरह से उपयोग की जा सकती है -जैसे स्वास्थ्यकर्मियों के लिए दो डोज और संक्रमित के संपर्क में आए लोगों के लिए एक डोज।
पहले से उपलब्ध टीके की भूमिका
पहले से मौजूद एरवेदो नामक टीका केवल सामान्य इबोला वायरस के लिए लाइसेंस प्राप्त है। लेकिन बंडिबुग्यो वायरस पर इसका प्रभाव स्पष्ट नहीं है। इसलिए डब्ल्यूएचओ ने कहा है कि इसका उपयोग केवल शोध के तहत ही किया जाए, सामान्य रूप से नहीं।
नैतिकता और शोध की तैयारी
डब्ल्यूएचओ ने स्पष्ट किया है कि सभी क्लिनिकल ट्रायल उच्च नैतिक मानकों के अनुसार किए जाएंगे। इसमें कांगो और युगांडा की सरकारें, अफ्रीका सीडीसी और अन्य वैज्ञानिक संस्थाएं मिलकर काम कर रही हैं। इन परीक्षणों का उद्देश्य यह पता लगाना है कि कौन सी दवा या टीका वास्तव में सुरक्षित और प्रभावी है।
मौजूदा नियंत्रण उपाय ही सबसे महत्वपूर्ण
जब तक कोई प्रभावी इलाज या टीका पूरी तरह प्रमाणित नहीं हो जाता, तब तक सबसे जरूरी उपाय वही पुराने और आजमाए हुए तरीके हैं। इनमें मरीजों की पहचान, तुरंत जांच, संपर्कों की निगरानी, मरीजों को अलग रखना, संक्रमण रोकने के उपाय, सुरक्षित अंतिम संस्कार और समुदाय को जागरूक करना शामिल है।
डब्ल्यूएचओ का संदेश साफ है कि अभी इस नए इबोला प्रकार के खिलाफ कोई पक्का इलाज उपलब्ध नहीं है। लेकिन वैज्ञानिक तेजी से काम कर रहे हैं और कई संभावित दवाएं और टीके परीक्षण के चरण में हैं। आने वाले महीनों में इन शोधों से यह उम्मीद है कि इस गंभीर बीमारी से लड़ने के लिए और मजबूत साधन उपलब्ध हो सकेंगे।