देश के इतिहास का सबसे घातक प्रकोप: कांगो में इबोला का कहर, 2,325 लोगों की मौत

कांगो में इबोला प्रकोप अब देश का सबसे घातक बन गया है। 4,945 मामलों के बीच कमजोर स्वास्थ्य व्यवस्था और इलाज की कमी चिंता बढ़ा रही है।
डीआर कांगो में इबोला से 2,325 मौतें, 2018-20 के पुराने रिकॉर्ड को पीछे छोड़कर बना देश का सबसे घातक प्रकोप।
डीआर कांगो में इबोला से 2,325 मौतें, 2018-20 के पुराने रिकॉर्ड को पीछे छोड़कर बना देश का सबसे घातक प्रकोप।फोटो साभार: आईस्टॉक
Published on
सारांश
  • कांगो में इबोला से 2,325 मौतें, 2018-20 के पुराने रिकॉर्ड को पीछे छोड़कर बना देश का सबसे घातक प्रकोप।

  • इबोला के 4,945 मामलों की पुष्टि, पिछले 24 घंटे में 101 नए संक्रमित मामले सामने आए, स्वास्थ्य व्यवस्था पर बढ़ा दबाव।

  • संक्रमित मरीजों में मौत की दर बढ़कर 46 प्रतिशत हुई, विशेषज्ञों ने देर से पहचान और इलाज को मुख्य कारण बताया।

  • बुंदिबुग्यो प्रजाति के इबोला वायरस के खिलाफ फिलहाल स्वीकृत वैक्सीन या उपचार उपलब्ध नहीं, प्रयोगात्मक उपायों पर शोध जारी।

  • पड़ोसी युगांडा में इबोला के 20 मामले मिले, दो मौतों के बाद अधिकारियों ने संक्रमण पर सफलतापूर्वक काबू पाया।

अफ्रीकी देश डेमोक्रेटिक रिपब्लिक ऑफ कांगो (डीआर कांगो) में इबोला का प्रकोप लगातार गंभीर होता जा रहा है। सरकारी आंकड़ों के अनुसार, इस बीमारी से अब तक 2,325 लोगों की मौत हो चुकी है। इसके साथ ही यह देश के इतिहास का सबसे घातक इबोला प्रकोप बन गया है। इससे पहले 2018 से 2020 के बीच फैले इबोला प्रकोप में 2,299 लोगों की मौत हुई थी। मौजूदा प्रकोप ने अब उस आंकड़े को भी पार कर लिया है।

4,945 मामलों की पुष्टि

डीआर कांगो के सार्वजनिक स्वास्थ्य संस्थान के अनुसार, अब तक इबोला के 4,945 मामलों की पुष्टि हो चुकी है। पिछले 24 घंटे में ही 101 नए मामले सामने आए हैं। मई में प्रकोप की आधिकारिक घोषणा के बाद से बीमारी बहुत तेजी से फैल रही है। यह डीआर कांगो का 17वां इबोला प्रकोप है और मामलों की संख्या के हिसाब से भी यह देश का सबसे बड़ा प्रकोप बन चुका है।

यह भी पढ़ें
कांगो में इबोला के तेजी से फैल रहे संक्रमण और बढ़ती मौतों पर डब्ल्यूएचओ ने जताई गंभीर चिंता
डीआर कांगो में इबोला से 2,325 मौतें, 2018-20 के पुराने रिकॉर्ड को पीछे छोड़कर बना देश का सबसे घातक प्रकोप।

इस बीमारी का सबसे अधिक असर इटुरी प्रांत में देखने को मिल रहा है। इसके अलावा दूसरे प्रांतों में भी संक्रमण फैल चुका है। कमजोर स्वास्थ्य व्यवस्था, असुरक्षा और लोगों के एक स्थान से दूसरे स्थान पर जाने के कारण बीमारी पर नियंत्रण करना मुश्किल हो रहा है।

तेजी से बढ़ रही मौतों की दर

इस प्रकोप में संक्रमित लोगों की मौत की दर भी चिंता का कारण बनी हुई है। सरकारी आंकड़ों के अनुसार, जून की शुरुआत में जहां लगभग 20 प्रतिशत संक्रमित लोगों की मौत हो रही थी, वहीं अब यह दर करीब 46 प्रतिशत तक पहुंच गई है। इसका अर्थ है कि पुष्टि किए गए लगभग हर दो संक्रमित लोगों में से एक की मौत हो रही है।

यह भी पढ़ें
कांगो में बढ़ा असुरक्षा का खतरा, इबोला से निपटने में आ रही मुश्किलें; यूएन की सहयोग की अपील
डीआर कांगो में इबोला से 2,325 मौतें, 2018-20 के पुराने रिकॉर्ड को पीछे छोड़कर बना देश का सबसे घातक प्रकोप।

हालांकि विशेषज्ञों का कहना है कि इसका मतलब यह नहीं है कि इबोला वायरस पहले से अधिक खतरनाक या घातक हो गया है। इसके पीछे मुख्य कारण बीमारी की देर से पहचान और मरीजों को समय पर इलाज नहीं मिलना माना जा रहा है। कई मरीज अस्पताल पहुंचने से पहले ही गंभीर स्थिति में पहुंच जाते हैं। कुछ मामलों में संक्रमित व्यक्ति की पहचान उसकी मौत के बाद होती है।

इलाज और वैक्सीन की कमी बड़ी चुनौती

मौजूदा प्रकोप बुंदिबुग्यो नाम की इबोला प्रजाति के कारण है। इस प्रजाति के खिलाफ अभी कोई स्वीकृत वैक्सीन या विशेष इलाज उपलब्ध नहीं है। विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) के अनुसार, इस वायरस के लिए संभावित वैक्सीन और इलाज पर शोध जारी है। हालांकि इन नए उपायों की प्रभावशीलता के बारे में अभी पर्याप्त जानकारी उपलब्ध नहीं है।

यह भी पढ़ें
दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा प्रकोप बना कांगो में बढ़ता इबोला संकट, अब तक 1556 लोगों की मौत
डीआर कांगो में इबोला से 2,325 मौतें, 2018-20 के पुराने रिकॉर्ड को पीछे छोड़कर बना देश का सबसे घातक प्रकोप।

ऐसे में डॉक्टर मरीजों को मुख्य रूप से सहायक चिकित्सा देते हैं। बीमारी की जल्दी पहचान और समय पर चिकित्सा मिलने से मरीज के बचने की संभावना बढ़ सकती है।

स्वास्थ्यकर्मियों के सामने बड़ी मुश्किल

इबोला से लड़ने वाले स्वास्थ्यकर्मियों के सामने भी कई समस्याएं हैं। कई इलाकों में स्वास्थ्य सुविधाएं कमजोर हैं। कुछ क्षेत्रों में असुरक्षा और हिंसा के कारण स्वास्थ्यकर्मियों के लिए संक्रमित लोगों तक पहुंचना मुश्किल है। लोगों में बीमारी को लेकर डर और गलत जानकारी भी संक्रमण रोकने के प्रयासों में बाधा बन रही है।

यह भी पढ़ें
कांगो में इबोला के वास्तविक मामलों की संख्या सरकारी आंकड़ों से कई गुणा ज्यादा हो सकती है: डब्ल्यूएचओ
डीआर कांगो में इबोला से 2,325 मौतें, 2018-20 के पुराने रिकॉर्ड को पीछे छोड़कर बना देश का सबसे घातक प्रकोप।

इबोला संक्रमित व्यक्ति के खून या शरीर के दूसरे तरल पदार्थों के सीधे संपर्क से फैल सकता है। संक्रमित व्यक्ति की मृत्यु के बाद भी उसके शरीर से संक्रमण फैलने का खतरा रहता है। इसलिए सुरक्षित इलाज और अंतिम संस्कार की व्यवस्था बहुत महत्वपूर्ण है।

पड़ोसी युगांडा में भी पहुंचा संक्रमण

इबोला का संक्रमण पड़ोसी देश युगांडा तक भी पहुंचा था। वहां 20 मामलों की पुष्टि हुई और दो लोगों की मौत हुई। हालांकि, अधिकारियों ने तेजी से कदम उठाकर संक्रमण को सीमित करने में सफलता पाई। विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार, युगांडा में आखिरी पुष्ट मामला जून में सामने आया था।

यह भी पढ़ें
डब्ल्यूएचओ का बंडिबुग्यो वायरस के प्रकोप से निपटने के लिए टीकों के क्लिनिकल ट्रायल पर जोर
डीआर कांगो में इबोला से 2,325 मौतें, 2018-20 के पुराने रिकॉर्ड को पीछे छोड़कर बना देश का सबसे घातक प्रकोप।

दुनिया के लिए भी चिंता

मौजूदा प्रकोप अब वैश्विक स्तर पर सबसे गंभीर इबोला प्रकोपों में शामिल हो गया है। हालांकि, यह अभी भी 2014 से 2016 के पश्चिम अफ्रीका के इबोला प्रकोप से काफी छोटा है। उस दौरान गिनी, लाइबेरिया और सिएरा लियोन में 28,000 से अधिक मामले और 11,000 से ज्यादा मौतें हुई थीं।

डीआर कांगो में तेजी से बढ़ते मामलों ने दुनिया भर के स्वास्थ्य संगठनों की चिंता बढ़ा दी है। विशेषज्ञों का मानना है कि बीमारी को रोकने के लिए जल्द जांच, संक्रमित लोगों की पहचान, संपर्क में आए लोगों की निगरानी और बेहतर स्वास्थ्य सुविधाओं की जरूरत है। समय पर कार्रवाई ही इस खतरनाक प्रकोप को और फैलने से रोकने में सबसे महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है।

Down to Earth- Hindi
hindi.downtoearth.org.in