

कांगो में इबोला संक्रमण तेजी से फैल रहा, डब्ल्यूएचओ ने बचाव कार्यों को बड़े स्तर पर बढ़ाने की अपील की।
डीआर कांगो में इबोला के 3,874 मामले मिले, अब तक 1,751 लोगों की मौत दर्ज की गई।
अमेरिका ने इबोला नियंत्रण अभियान के लिए 242 मिलियन डॉलर की अतिरिक्त सहायता देने की घोषणा की।
बुंदिबुग्यो इबोला वायरस के खिलाफ नई वैक्सीन और दवाओं पर वैज्ञानिकों द्वारा परीक्षण जारी है।
पूर्वी कांगो में कमजोर स्वास्थ्य व्यवस्था और सुरक्षा चुनौतियां इबोला रोकने में बड़ी बाधा बन रही हैं।
अफ्रीकी देश डेमोक्रेटिक रिपब्लिक ऑफ कांगो (डीआर कांगो) में इबोला वायरस का प्रकोप तेजी से बढ़ रहा है। विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) के प्रमुख टेड्रोस अधानोम घेब्रेयेसस ने बुधवार को कांगो का दौरा किया और अधिकारियों से इबोला संक्रमण को रोकने के लिए बड़े स्तर पर कदम उठाने की अपील की।
टेड्रोस ने कहा कि बीमारी जिस तेजी से फैल रही है, उसके मुकाबले बचाव और इलाज की व्यवस्था धीमी पड़ रही है। उन्होंने सोशल मीडिया मंच एक्स पर लिखा कि कुछ प्रभावित इलाकों में पिछले एक सप्ताह में नए मामलों की संख्या दोगुनी हो गई है। उन्होंने स्वास्थ्यकर्मियों की सुरक्षा बढ़ाने और प्रभावित लोगों तक जल्द से जल्द मदद पहुंचाने की जरूरत बताई।
कांगो में 17वां इबोला प्रकोप
डीआर कांगो ने 15 मई को अपने 17वें इबोला प्रकोप की घोषणा की थी। विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार, इस बार के प्रकोप में अब तक 3,874 से अधिक संक्रमण के मामले सामने आ चुके हैं और 1,751 लोगों की मौत हो चुकी है।
इबोला का सबसे ज्यादा असर देश के पूर्वी हिस्सों में देखने को मिल रहा है। इटुरी प्रांत में संक्रमण के सबसे अधिक मामले सामने आए हैं। इस इलाके में स्वास्थ्य सुविधाओं की कमी, सुरक्षा की समस्या और लोगों के विस्थापन के कारण बीमारी को नियंत्रित करना मुश्किल हो रहा है। डब्ल्यूएचओ ने कहा है कि प्रभावित क्षेत्रों में हर समुदाय तक पहुंच बनाना जरूरी है ताकि संक्रमित लोगों की पहचान, इलाज और निगरानी बेहतर तरीके से की जा सके।
अमेरिका ने बढ़ाई आर्थिक मदद
रिपोर्ट के मुताबिक, इबोला से लड़ाई के लिए अमेरिका ने बुधवार को 24.2 करोड़ डॉलर से अधिक की अतिरिक्त आर्थिक सहायता देने की घोषणा की। इसके साथ ही कांगो में इबोला प्रतिक्रिया अभियान के लिए अमेरिका की कुल प्रत्यक्ष सहायता 50 करोड़ डॉलर से अधिक हो गई है।
अमेरिका इबोला से निपटने के प्रयासों में सबसे बड़ा आर्थिक योगदान देने वाला देश बना हुआ है। इस मदद का इस्तेमाल इलाज केंद्रों को मजबूत करने, स्वास्थ्यकर्मियों को सहायता देने और संक्रमण की निगरानी बढ़ाने में किया जाएगा।
स्वास्थ्य व्यवस्था के सामने बड़ी चुनौती
पूर्वी कांगो के कई इलाकों में सरकारी व्यवस्था कमजोर है और अस्पतालों की संख्या भी कम है। इटुरी प्रांत के खनन शहर मोंगबवालू में हाल ही में इबोला इलाज केंद्र के कर्मचारियों ने वेतन और सरकारी भत्तों के भुगतान में देरी को लेकर विरोध प्रदर्शन किया था।
वहीं, इटुरी की राजधानी बुनिया में मंगलवार को 100 बिस्तरों वाले नए इबोला उपचार केंद्र की शुरुआत की गई। संयुक्त राष्ट्र की मानवीय सहायता एजेंसी ने कहा कि यह केंद्र बढ़ते मरीजों की संख्या को संभालने में मदद करेगा।
वैक्सीन और दवाओं पर चल रहा शोध
इस बार का इबोला संक्रमण बुंदिबुग्यो प्रजाति के वायरस से फैल रहा है। इस वायरस के लिए अभी तक कोई स्वीकृत वैक्सीन या इलाज उपलब्ध नहीं है। हालांकि कई वैज्ञानिक संस्थान नई वैक्सीन और दवाओं पर काम कर रहे हैं।
कनाडा ने अमेरिकी दवा कंपनी मॉडर्ना को बुंदिबुग्यो इबोला के लिए विकसित की जा रही वैक्सीन का मानव परीक्षण शुरू करने की अनुमति दी है। इसके अलावा ब्रिटेन की ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी भी एक संभावित वैक्सीन पर परीक्षण कर रही है। यह वैक्सीन उसी तकनीक पर आधारित है जिसका इस्तेमाल एस्ट्राजेनेका की कोविड-19 वैक्सीन में किया गया था। सिंगापुर की हिलेमैन लैबोरेटरीज भी एक अन्य संभावित वैक्सीन को मानव परीक्षण तक पहुंचाने की तैयारी कर रही है।
इलाज के लिए नए विकल्पों की तलाश
वैज्ञानिक इबोला मरीजों के इलाज के लिए कई दवाओं का परीक्षण कर रहे हैं। इटुरी में संक्रमित मरीजों पर एमबीपी134 नामक मोनोक्लोनल एंटीबॉडी और एंटीवायरल दवा रेमडेसिविर का परीक्षण किया जा रहा है। इसके अलावा ओबेल्डेसिविर नामक दवा का भी उन लोगों पर परीक्षण किया जा रहा है, जो इबोला संक्रमित मरीजों के संपर्क में आए हैं।
इबोला एक गंभीर बीमारी है जो संक्रमित व्यक्ति के शरीर के तरल पदार्थों के संपर्क में आने से फैलती है। यह बीमारी तेज बुखार और खून बहने जैसी गंभीर समस्याएं पैदा कर सकती है। पिछले 50 वर्षों में अफ्रीका में इबोला से 15,000 से अधिक लोगों की मौत हो चुकी है।
कांगो में मौजूदा प्रकोप को रोकने के लिए स्वास्थ्य एजेंसियां, स्थानीय प्रशासन और अंतरराष्ट्रीय संगठन तेजी से काम कर रहे हैं, लेकिन सुरक्षा चुनौतियों और सीमित स्वास्थ्य सुविधाओं के कारण यह अभियान अभी भी कठिन बना हुआ है।