सावधान! किडनी के लिए खतरा बन रहे नैनोप्लास्टिक, कोशिकाओं में आ सकते हैं बड़े बदलाव

नई रिसर्च में खुलासा, प्लास्टिक के बेहद महीन कण किडनी में जमा होकर उसकी कार्यक्षमता को कमजोर कर सकते हैं
प्लास्टिक कचरे का जमा पहाड़, फोटो: आईस्टॉक
प्लास्टिक कचरे का जमा पहाड़, फोटो: आईस्टॉक
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सारांश
  • नई रिसर्च में चेतावनी दी गई है कि नैनोप्लास्टिक जैसे बेहद महीन प्लास्टिक कण किडनी में जमा होकर उसकी कार्यक्षमता को कमजोर कर सकते हैं।

  • अध्ययन के मुताबिक कम मात्रा में तुरंत गंभीर असर नहीं दिखता, लेकिन ज्यादा बोझ बढ़ने पर किडनी कोशिकाओं के आकार, जीवित रहने की क्षमता और नियंत्रण प्रणाली में बड़े बदलाव आ सकते हैं।

  • वैज्ञानिकों ने पाया कि असर कणों की मात्रा के साथ-साथ उनके आकार, प्रकार और रासायनिक संरचना पर भी निर्भर करता है।

  • शोधकर्ताओं ने लंबे समय के जोखिमों को समझने के लिए वास्तविक परिस्थितियों में और अधिक व्यापक अध्ययन और प्लास्टिक प्रदूषण पर सख्त नियंत्रण की जरूरत बताई है।

दुनिया में प्लास्टिक अब सिर्फ पर्यावरण तक सीमित नहीं रह गया, बल्कि यह इंसानी सेहत के लिए भी तेजी से उभरता खतरा बनता जा रहा है। खासकर नैनोप्लास्टिक जैसे प्लास्टिक के बेहद महीन कण शरीर के अंदर तक पहुंच रहे हैं, इससे चिंता लगातार बढ़ रही है।

ऑस्ट्रेलिया की फ्लिंडर्स यूनिवर्सिटी से जुड़े वैज्ञानिकों ने अब एक नई रिसर्च में जांच की है कि क्या ये नैनोप्लास्टिक हमारी किडनी में जमा होकर उसकी कार्यप्रणाली को नुकसान पहुंचा सकते हैं।

अध्ययन के नतीजे प्रतिष्ठित जर्नल सेल बायोलॉजी एंड टॉक्सिकोलॉजी में प्रकाशित हुए हैं। इस अध्ययन में मोनाश विश्वविद्यालय और फ्लिंडर्स यूनिवर्सिटी के कॉलेज ऑफ मेडिसिन एंड पब्लिक हेल्थ से जुड़े वैज्ञानिकों ने भी सहयोग किया है। अध्ययन में सामने आया है कि प्लास्टिक के ये महीन कण शरीर के फिल्टर यानी किडनी में जमा होकर उसकी कार्यक्षमता को कमजोर कर सकते हैं।

कम मात्रा में तुरंत खतरा नहीं, लेकिन ज्यादा बोझ घातक

वैज्ञानिकों ने चेताया है कि यदि शरीर में नैनोप्लास्टिक की मात्रा ज्यादा बढ़ जाए, तो यह किडनी की कोशिकाओं और उनके काम करने की क्षमता को गंभीर रूप से नुकसान पहुंचा सकते हैं। हालांकि साथ ही शोधकर्ताओं ने लम्बे समय में इसके जोखिमों को समझने के लिए और अधिक जांच की आवश्यकता बताई है।

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अध्ययन और फ्लिंडर्स यूनिवर्सिटी में नैनोप्लास्टिक और स्वास्थ्य पर रिसर्च कर रहे शोधकर्ता हेडन गिलिंग्स के मुताबिक भले ही नैनोप्लास्टिक की कम मात्रा से किडनी कोशिकाओं पर तुरंत गंभीर प्रभाव नहीं पड़ता। लेकिन यदि इन कणों का बोझ बहुत ज्यादा हो जाए तो यह कोशिकाओं की सेहत और उनकी कार्यक्षमता को गंभीर रूप से प्रभावित कर सकते हैं।

इससे कोशिकाओं के आकार, उनके जीवित रहने की क्षमता और नियंत्रण प्रणाली में बदलाव आ सकते हैं। यानी लंबे समय में प्लास्टिक के ये महीन कण किडनी की कार्यक्षमता को कमजोर कर सकते हैं।

प्लास्टिक का आकार-प्रकार भी डालता है असर

नतीजों में यह भी सामने आया है कि इन कणों का असर सिर्फ उनकी मात्रा पर निर्भर नहीं करता, बल्कि प्लास्टिक के प्रकार (पॉलिमर संरचना), कणों के आकार और उसकी रासायनिक संरचना पर भी निर्भर करता है। गिलिंग्स के अनुसार कुछ खास संयोजन कम मात्रा में भी कोशिकाओं में बड़े बदलाव पैदा कर सकते हैं।

बार-बार नुकसान से घट सकती है किडनी की क्षमता

अपने इस अध्ययन में वैज्ञानिकों ने प्रयोगशाला में किडनी की कोशिकाओं पर नैनोप्लास्टिक के खतरे को परखने के लिए तीन बेहद आम प्लास्टिक से बने कणों का परीक्षण किया।

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इनमें पॉलीस्टाइरीन (पीएस), पॉली (मिथाइल मेथैक्रिलेट) यानी पीएमएमए और पॉलीएथिलीन (पीई) शामिल थे। यह सभी प्लास्टिक हमारे रोजमर्रा में इस्तेमाल होने वाली चीजों में बड़ी मात्रा में पाए जाते हैं।

शोधकर्ताओं का कहना है कि यदि किडनी की कार्यक्षमता को नियंत्रित करने वाली कोशिकाओं को लंबे समय तक या बार-बार नुकसान पहुंचता रहा, तो इससे किडनी की क्षमता धीरे-धीरे कमजोर पड़ सकती है। इससे रक्त को फिल्टर करने की प्रक्रिया प्रभावित होगी, शरीर से विषैले पदार्थ बाहर निकालने में दिक्कत आएगी और समय के साथ नैनोप्लास्टिक किडनी के ऊतकों में जमा हो सकते हैं।

धरती के हर हिस्से में फैल रहा प्लास्टिक

चूंकि प्लास्टिक के ये महीन कण पर्यावरण में हर जगह मौजूद हैं, इसलिए अध्ययन इस बात पर जोर देता है कि इनके असर को गहराई से समझने के लिए लंबे समय तक वास्तविक परिस्थितियों में और अधिक शोध जरूरी है। खासकर कणों की मात्रा, आकार, प्लास्टिक के प्रकार और उनमें मौजूद रासायनिक पदार्थों के प्रभावों की गहराई से जांच की जानी चाहिए।

फ्लिंडर्स यूनिवर्सिटी की एसोसिएट प्रोफेसर मेलानी मैकग्रेगर के अनुसार, प्लास्टिक कचरा अब धरती के हर हिस्से में टूटकर फैल रहा है। उनके मुताबिक माइक्रोप्लास्टिक के लाखों टन कण टूटकर और भी छोटे नैनोप्लास्टिक में बदल जाते हैं और इनसे रसायनों का रिसाव भी होता है।

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यह प्रदूषण तेजी से जमीन, समुद्र और हवा में बढ़ रहा है और जीवन के सभी रूपों के लिए खतरा बनता जा रहा है।

ऐसे में शोधकर्ताओं ने अपील की है कि नैनोप्लास्टिक के दीर्घकालिक प्रभावों को समझने के लिए वास्तविक परिस्थितियों में और अधिक व्यापक अध्ययन बेहद जरूरी हैं। उनका कहना है कि डीएनए को होने वाले नुकसान और लंबे समय के स्वास्थ्य जोखिमों की गहन जांच की जानी चाहिए, साथ ही प्लास्टिक और रासायनिक प्रदूषकों के उत्सर्जन पर सख्त नियंत्रण भी लगाया जाना चाहिए।

जरूरी हैं सख्त कदम

प्रतिष्ठित मेडिकल जर्नल द लैंसेट प्लेनेटरी हेल्थ में प्रकाशित एक हालिया अध्ययन में सामने आया है कि प्लास्टिक का मौजूदा तंत्र 2040 तक इंसानों के 8.3 करोड़ स्वस्थ जीवन-वर्ष छीन सकता है। वैज्ञानिकों ने आशंका जताई है कि प्लास्टिक से जुड़ी जहरीली गैसों और प्रदूषण के कारण स्वास्थ्य को होने वाला नुकसान 2040 तक बढ़कर दोगुणा हो सकता है।

आंकड़ों पर नजर डालें तो 2016 में प्लास्टिक की वजह से 21 लाख स्वस्थ जीवन वर्षों का नुकसान हुआ था, जो 2040 तक बढ़कर 45 लाख वर्षों तक पहुंच जाएगा।

यह अध्ययन एक बार फिर चेतावनी देता है कि प्लास्टिक अब सिर्फ पर्यावरण तक सीमित समस्या नहीं रहा, बल्कि इंसानी शरीर के भीतर तक पैठ बना चुका है। यह धीरे-धीरे एक गंभीर स्वास्थ्य संकट का रूप लेता जा रहा है। खासकर किडनी जैसे महत्वपूर्ण अंग पर इसके संभावित असर को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।

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