गर्भावस्था में अनीमिया से बढ़ सकता है मृत बच्चे के जन्म का खतरा: अध्ययन

गर्भावस्था में खून की कमी से बढ़ सकता है मृत बच्चे के जन्म का खतरा, बड़े भारतीय अध्ययन में मध्यम और गंभीर अनीमिया वाली महिलाओं पर ज्यादा खतरा सामने आया
बड़े भारतीय अध्ययन में गर्भावस्था के दौरान अनीमिया और 28 सप्ताह बाद मृत बच्चे के जन्म के बीच संबंध सामने आया।
बड़े भारतीय अध्ययन में गर्भावस्था के दौरान अनीमिया और 28 सप्ताह बाद मृत बच्चे के जन्म के बीच संबंध सामने आया।फोटो साभार: आईस्टॉक
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सारांश
  • अबड़े भारतीय अध्ययन में गर्भावस्था के दौरान अनीमिया और 28 सप्ताह बाद मृत बच्चे के जन्म के बीच संबंध सामने आया।

  • मध्यम और गंभीर अनीमिया वाली गर्भवती महिलाओं में मृत बच्चे के जन्म का खतरा सबसे अधिक पाया गया।

  • हीमोग्लोबिन 10 ग्राम प्रति डेसीलीटर से कम होने पर गर्भावस्था में स्टिलबर्थ का जोखिम बढ़ा हुआ मिला।

  • गंभीर अनीमिया वाली महिलाओं में मृत बच्चे का जन्म अपेक्षाकृत कम गर्भावस्था अवधि में होने का खतरा अधिक पाया गया।

  • विशेषज्ञों ने गर्भावस्था में नियमित जांच, समय पर इलाज और अनीमिया की लगातार निगरानी की जरूरत पर जोर दिया।

गर्भावस्था के दौरान अनीमिया यानी खून की कमी लंबे समय से मां और बच्चे दोनों के स्वास्थ्य के लिए चिंता का कारण रही है। अब भारत में हुए एक बड़े अध्ययन ने इस चिंता का एक और महत्वपूर्ण पहलू सामने रखा है। अध्ययन के अनुसार, गर्भावस्था के दौरान अनीमिया, खासकर मध्यम और गंभीर अनीमिया होने पर, 28 सप्ताह के बाद मृत बच्चे के जन्म यानी स्टिलबर्थ का खतरा बढ़ सकता है

यह अध्ययन करीब 2.2 लाख गर्भवती महिलाओं पर किया गया। इसमें भारत के अलग-अलग हिस्सों के 10 गर्भावस्था संबंधी अध्ययनों के आंकड़ों को शामिल किया गया। अध्ययन के निष्कर्ष द लैंसेट रीजनल हेल्थ–साउथईस्ट एशिया में प्रकाशित हुए हैं। इसमें ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी, भारतीय आयुर्विज्ञान अनुसंधान परिषद (आईसीएमआर), इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ पब्लिक हेल्थ और अन्य संस्थानों के शोधकर्ता शामिल थे।

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हीमोग्लोबिन कम होने पर खतरा ज्यादा

शोधकर्ताओं ने पाया कि जिन महिलाओं का हीमोग्लोबिन स्तर गर्भावस्था के दौरान किसी भी समय 10 ग्राम प्रति डेसीलीटर से कम रहा, उनमें 28 सप्ताह के बाद स्टिलबर्थ का खतरा उन महिलाओं की तुलना में अधिक था, जिनमें अनीमिया नहीं था या बहुत हल्का अनीमिया था।

अनीमिया की गंभीरता का भी असर देखा गया। मध्यम और गंभीर अनीमिया वाली महिलाओं में खतरा सबसे अधिक था। वहीं, हल्के अनीमिया में आम तौर पर खतरा बढ़ा हुआ नहीं मिला। हालांकि, दूसरे तिमाही में हल्का अनीमिया पाए जाने पर कुछ बढ़ा हुआ जोखिम देखा गया।

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गंभीर अनीमिया में पहले हो सकता है स्टिलबर्थ

अध्ययन में स्टिलबर्थ के समय को लेकर भी एक महत्वपूर्ण अंतर सामने आया। गंभीर अनीमिया वाली महिलाओं में स्टिलबर्थ करीब 29 सप्ताह की गर्भावस्था में हुआ। इसके मुकाबले मध्यम, हल्के या बिना अनीमिया वाली महिलाओं में यह समय लगभग 31 सप्ताह था।

शोधकर्ताओं के अनुसार, अनीमिया में खून की ऑक्सीजन पहुंचाने की क्षमता कम हो जाती है। गर्भावस्था में मां के शरीर को बढ़ते बच्चे और प्लेसेंटा की जरूरतें भी पूरी करनी होती हैं। ऐसे में शरीर में ऑक्सीजन की कमी मां और बच्चे दोनों के स्वास्थ्य को प्रभावित कर सकती है।

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हालांकि शोधकर्ताओं ने यह भी स्पष्ट किया है कि अध्ययन अनीमिया और स्टिलबर्थ के बीच संबंध दिखाता है। इससे यह साबित नहीं होता कि हर मामले में अनीमिया ही सीधे तौर पर स्टिलबर्थ का कारण है।

भारत में समस्या बड़ी

भारत में अनीमिया पहले से ही एक बड़ी स्वास्थ्य समस्या है। राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण-5 के अनुसार, देश में 15 से 49 वर्ष की करीब 57 प्रतिशत महिलाएं और करीब 52 प्रतिशत गर्भवती महिलाएं अनीमिया से प्रभावित थीं।

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इसका मतलब है कि अनीमिया का बढ़ा हुआ जोखिम बड़ी संख्या में गर्भवती महिलाओं को प्रभावित कर सकता है। अनीमिया केवल स्टिलबर्थ से जुड़ी समस्या नहीं है। यह समय से पहले बच्चे के जन्म और कम वजन वाले बच्चे के जन्म जैसी दूसरी परेशानियों से भी जुड़ा है।

मां में गंभीर अनीमिया से थकान, सांस फूलना और कमजोरी बढ़ सकती है। प्रसव के दौरान अधिक खून बहने जैसी स्थिति में गंभीर अनीमिया वाली महिलाओं के लिए खतरा और बढ़ सकता है।

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जांच और इलाज पर जोर

विशेषज्ञों का कहना है कि गर्भावस्था के दौरान नियमित जांच बेहद जरूरी है। अनीमिया की पहचान होने के बाद इलाज शुरू करना और उसे बीच में न रोकना महत्वपूर्ण है। केवल दवा शुरू करना ही पर्याप्त नहीं है, बल्कि यह देखना भी जरूरी है कि इलाज के बाद हीमोग्लोबिन स्तर में सुधार हो रहा है या नहीं।

भारत सरकार अनीमिया की समस्या से निपटने के लिए अनीमिया मुक्त भारत कार्यक्रम चला रही है। इसके तहत जांच, इलाज और मरीजों की निगरानी पर जोर दिया जाता है। जरूरत पड़ने पर गर्भवती महिलाओं के लिए आयरन का इलाज दूसरे तरीकों से भी किया जा सकता है।

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हर अनीमिया का कारण एक नहीं

विशेषज्ञों के सामने एक और चुनौती यह है कि हर महिला में अनीमिया का कारण केवल आयरन की कमी नहीं होता। पोषण की कमी, संक्रमण, लंबे समय से चली आ रही बीमारियां और अन्य कारण भी अनीमिया के लिए जिम्मेदार हो सकते हैं। इसलिए सही कारण की पहचान करके इलाज करना जरूरी है।

इस अध्ययन का संदेश साफ है कि गर्भावस्था में अनीमिया को सामान्य समस्या मानकर नजरअंदाज नहीं किया जाना चाहिए। समय पर जांच, सही इलाज और नियमित फॉलो-अप से मां और बच्चे के स्वास्थ्य की बेहतर सुरक्षा की जा सकती है।

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