राजस्थान: 11 साल में जंगलों के धधकने की 218 घटनाएं आई सामने, 13,386 हेक्टेयर वन क्षेत्र प्रभावित

राजस्थान के जंगलों में आग की बढ़ती घटनाओं पर चिंता जताते हुए नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (एनजीटी) ने वन विभाग को इन घटनाओं को रोकने के लिए प्रभावी कदम उठाने और नियमों का सख्ती से पालन करने के निर्देश दिए हैं।
प्रतीकात्मक तस्वीर: आईस्टॉक
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सारांश
  • राजस्थान के जंगलों में आग की घटनाएं वन संरक्षण के सामने गंभीर चुनौती बनती जा रही हैं।

  • आंकड़ों के मुताबिक, पिछले 11 वर्षों में राज्य में जंगल में आग लगने की 218 घटनाएं दर्ज हुईं, जिनसे 13,386.47 हेक्टेयर वन क्षेत्र प्रभावित हुआ। इनमें कुंभलगढ़ वन क्षेत्र में अप्रैल 2026 में लगी आग भी शामिल है, जिसने करीब 120 हेक्टेयर जंगल को प्रभावित किया।

  • तेज हवाओं और सूखी घास-पत्तियों के कारण आग तेजी से फैल गई थी, जिसे वनकर्मियों, फायर वॉचर और स्थानीय ग्रामीणों ने मिलकर नियंत्रित किया।

  • जंगल की आग से निपटने के लिए कुंभलगढ़ और टॉडगढ़-रावली अभयारण्यों में पिछले तीन वर्षों के दौरान फायर लाइन बनाने और उनके रखरखाव पर 1.07 करोड़ रुपए से अधिक खर्च किए गए हैं। इसके बावजूद आग की घटनाओं का सामने आना रोकथाम की तैयारियों पर सवाल खड़े करता है।

  • ऐसे में 23 सितंबर 2026 के अपने आदेश में एनजीटी ने राजस्थान वन विभाग को आधुनिक उपकरण और तकनीक उपलब्ध कराने, नियमित गश्त बढ़ाने और आग की लगातार निगरानी करने के निर्देश दिए हैं, ताकि जंगलों में लगी आग को शुरुआती स्तर पर ही नियंत्रित किया जा सके।

एक जंगल को बनने में दशकों लगते हैं, लेकिन उसे राख में बदलने के लिए कई बार कुछ घंटे ही काफी होते हैं। सूखी घास, पत्तियां और तेज हवाएं मिलकर जब आग को हवा देती हैं, तो लपटें देखते ही देखते जंगल के बड़े हिस्से को अपनी चपेट में ले लेती हैं।

राजस्थान के जंगलों में आग की घटनाओं पर चिंता जताते हुए नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (एनजीटी) ने वन विभाग को आग की इन घटनाओं को रोकने के लिए प्रभावी कदम उठाने और राजस्थान वन नियमावली के प्रावधानों का सख्ती से पालन करने के निर्देश दिए हैं।

23 सितंबर 2026 को दिए अपने आदेश में एनजीटी की केंद्रीय पीठ ने राजस्थान वन विभाग से कहा कि जंगलों में आग की घटनाओं को रोकने के लिए जरूरी उपकरण और आधुनिक तकनीक खरीदी जाए और उनका प्रभावी इस्तेमाल सुनिश्चित किया जाए।

साथ ही, वन अधिकारियों और कर्मचारियों को नियमित गश्त करने तथा आग की घटनाओं की लगातार निगरानी करने के भी निर्देश दिए गए हैं, ताकि आग लगने की स्थिति में उसे शुरुआती स्तर पर ही नियंत्रित किया जा सके।

कुंभलगढ़ में आग ने निगल लिया 120 हेक्टेयर जंगल

यह पूरा मामला राजस्थान के कुंभलगढ़ वन क्षेत्र में लगी भीषण आग से जुड़ा है। 27 अप्रैल 2026 को दैनिक भास्कर में प्रकाशित एक रिपोर्ट में कुंभलगढ़ के जंगल में लगी आग से सैकड़ों एकड़ वन क्षेत्र प्रभावित होने की बात सामने आई थी। रिपोर्ट के मुताबिक तेज हवाओं और सूखी घास के कारण आग तेजी से फैल गई और समय रहते उस पर काबू पाना मुश्किल हो गया था।

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राजसमंद जिले में कुंभलगढ़ वन्यजीव अभ्यारण्य के प्रिंसिपल चीफ कंजर्वेटर ऑफ फॉरेस्ट्स (पीसीसीएफ) और डिविजनल फॉरेस्ट ऑफिसर (डीएफओ) की और से एनजीटी में बताया गया कि 28 अप्रैल 2026 की शाम कुंभलगढ़ रेंज के वनकर्मियों को नियमित गश्त के दौरान आग की जानकारी मिली।

सूचना मिलते ही वनकर्मी, फायर वॉचर और स्थानीय ग्रामीण मौके पर पहुंचे। वहां पता चला कि तेज हवाओं के कारण कुंभलगढ़ वन क्षेत्र के पालेर वन खंड में सूखी घास और पत्तियां जल रही थीं।

तेज हवा के चलते आग की चिंगारियां सूखी घास और पत्तियों तक पहुंच रही थीं और आग दूसरी पहाड़ी की ओर बढ़ रही थी। ऐसे में मौके पर मौजूद वनकर्मियों, फायर वॉचर और ग्रामीणों ने अलग-अलग समूह बनाकर आग को रोकने का काम शुरू किया।

उन्होंने सूखी घास और पत्तियों को हटाकर फायर लाइन तैयार की। पेड़ों की छाल, शाखाओं और टहनियों की मदद से आग को फैलने से रोका गया। लगातार प्रयासों के बाद 29 अप्रैल की आधी रात तक आग पर पूरी तरह काबू पा लिया गया।

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इसके बाद अगले दिन वन विभाग ने प्रभावित क्षेत्र का जायजा लिया। आकलन में सामने आया कि आग से करीब 120 हेक्टेयर वन क्षेत्र प्रभावित हुआ था। इस दौरान मुख्य रूप से सूखी घास और पत्तियां जलीं। विभाग के अनुसार, आग में किसी वन्यजीव के हताहत होने की सूचना नहीं मिली है।

धधकती आग को रोकने पर 1.07 करोड़ रुपए से ज्यादा खर्च

वन विभाग ने एनजीटी को बताया कि कुंभलगढ़ वन्यजीव अभयारण्य और टॉडगढ़ रावली-अभ्यारण्य में जंगल की आग को रोकने के लिए फायर लाइन बनाने और उनके रखरखाव पर 2023-24, 2024-25 और 2025-26 के दौरान 107.2 लाख रुपए यानी करीब 1.07 करोड़ रुपए खर्च किए गए हैं।

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इसके अलावा आग बुझाने के लिए जरूरी उपकरण भी वनकर्मियों को उपलब्ध कराए गए हैं। इनमें वॉटर फायर स्प्रे मशीन, फायर किट, फायर बीटर और पानी की बोतलें शामिल हैं। इन उपकरणों का उद्देश्य आग लगने के तुरंत बाद उस पर काबू पाना और उसे जंगल के दूसरे हिस्सों तक फैलने से रोकना है।

11 साल में 218 बार लगी जंगल में आग

राजस्थान के जंगलों में धधकती की आग की समस्या केवल कुंभलगढ़ तक सीमित नहीं है। वन विभाग के अनुसार, पिछले 11 वर्षों में राज्य में आग लगने की 218 घटनाएं दर्ज की गई हैं। इन घटनाओं में कुल 13,386.47 हेक्टेयर वन क्षेत्र प्रभावित हुआ है।

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वन विभाग ने करीब 6,816 वर्ग किलोमीटर वन क्षेत्र को संभावित रूप से आग की चपेट में आने वाले क्षेत्र के रूप में चिन्हित किया है। इनमें अजमेर, अलवर, बांसवाड़ा, बारां, भरतपुर, बूंदी, चित्तौड़गढ़, धौलपुर, डूंगरपुर, जयपुर, जालौर, कोटा, पाली, सवाई माधोपुर, सिरोही और उदयपुर जिले शामिल हैं।

समय पर निगरानी ही बचा सकती है जंगल

एनजीटी के निर्देश ऐसे समय में आए हैं जब गर्मी, सूखी घास-पत्तियों और तेज हवाओं का मेल जंगल की आग को कुछ ही घंटों में बड़े क्षेत्र तक पहुंचा सकता है। एक छोटी-सी चिंगारी भी पेड़ों, घास और वन्यजीवों के उस घर को खतरे में डाल सकती है, जिसे बनने में वर्षों लगते हैं।

यही वजह है कि एनजीटी ने केवल आग लगने के बाद कार्रवाई करने के बजाय नियमित गश्त, शुरुआती निगरानी, फायर लाइन के रखरखाव और आधुनिक उपकरणों के इस्तेमाल पर जोर दिया है। जंगल को आग से बचाने की सबसे बड़ी चुनौती आग बुझाना नहीं, बल्कि उसे फैलने से पहले पहचानना और रोकना है।

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