

केंद्र सरकार ने जंगलों में आग की बढ़ती घटनाओं को रोकने और प्रबंधन के लिए सभी राज्यों को नई स्टैंडर्ड ऑपरेटिंग प्रोसीजर जारी कर बड़े कदम उठाए हैं।
यह योजना देश के अलग-अलग वनों की विशेषताओं को ध्यान में रखते हुए तैयार की गई है और इसमें आग की रोकथाम, आपातकालीन प्रतिक्रिया और मानकीकृत अग्निशमन उपकरणों का समावेश किया गया है।
विशेषज्ञों का मानना है कि इन एसओपी के लागू होने से जंगलों की सुरक्षा मजबूत होगी, आग पर तेजी से नियंत्रण संभव होगा और मानवीय एवं आर्थिक नुकसान में कमी आएगी, जिससे यह भारत के पर्यावरण संरक्षण की दिशा में एक महत्वपूर्ण मील का पत्थर साबित होगा।
देश के जंगलों में लगने वाली आग अब सिर्फ एक मौसमी समस्या नहीं, बल्कि बड़ा पर्यावरणीय संकट बनती जा रही है। इस चुनौती से निपटने के लिए सरकार ने सभी राज्यों के लिए नए नियम जारी किए हैं।
पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय (एमओईएफसीसी) ने देशभर में वनाग्नि की बढ़ती घटनाओं को देखते हुए इसके प्रबंधन के लिए स्टैंडर्ड ऑपरेटिंग प्रोसीजर (एसओपी) तैयार कर सभी राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों को लागू करने के लिए भेज दिए हैं। यह जानकारी मंत्रालय ने 1 अप्रैल 2026 को दाखिल अपने हलफनामे में दी है।
देखा जाए तो भारत के जंगलों में धधकने वाली आग अब महज एक मौसमी समस्या नहीं रह गई, बल्कि यह हमारे वनों और पर्यावरण के लिए गंभीर खतरे का रूप ले चुकी है।
इंडिया स्टेट ऑफ फॉरेस्ट रिपोर्ट, 2021 के अनुसार, देश के 36 फीसदी से अधिक जंगलों के आग की चपेट में आने का जोखिम है। इनमें से 2.81 फीसदी क्षेत्र बेहद संवेदनशील हैं और हर पल आग की भयावह लपटों से प्रभावित होने का खतरा रखते हैं, जबकि 7.85 फीसदी क्षेत्र को भी बहुत अधिक हिस्सा आग के प्रति संवेदनशील माना गया है।
जंगलों में आग की बढ़ती घटनाओं पर सरकार का बड़ा कदम
पर्यावरण मंत्रालय की रिपोर्ट में वनाग्नि के प्रबंधन के लिए एसओपी तैयार करने के लिए उठाए गए कदमों की विस्तार से जानकारी दी गई है।
रिपोर्ट के अनुसार, इस एसओपी को तैयार करने की प्रक्रिया 2025 में शुरू हुई थी। 25 फरवरी 2025 को सेंट्रल मॉनिटरिंग कमेटी की बैठक में इस मुद्दे पर विस्तार से चर्चा हुई, जिसमें भारतीय वानिकी अनुसंधान एवं शिक्षा परिषद (आईसीएफआरई), देहरादून को 15 मार्च 2025 तक व्यापक एसओपी तैयार करने की जिम्मेदारी सौंपी गई थी।
इन एसओपी में जंगल की आग को रोकने, कम करने और उस पर कार्रवाई करने की आपातकालीन प्रतिक्रिया पर विशेष ध्यान देने के निर्देश दिए गए थे। साथ ही विभिन्न राज्यों की सर्वोत्तम व्यवस्थाओं को शामिल कर आग बुझाने के उपकरणों को मानकीकृत (स्टैंडर्ड) करने के भी निर्देश दिए गए।
पर्यावरण मंत्रालय ने 11 मार्च 2025 को जारी पत्र के माध्यम से आईसीएफआरई, देहरादून से अनुरोध किया कि वह आगे की आवश्यक कार्रवाई के लिए स्टैंडर्ड ऑपरेटिंग प्रोसीजर का ड्राफ्ट मंत्रालय को प्रस्तुत करे। साथ ही, मानक अग्निशमन उपकरणों की सूची साझा करने के भी निर्देश दिए गए।
इसके बाद 11 जुलाई 2025 को मंत्रालय, आईसीएफआरई और फॉरेस्ट रिसर्च इंस्टीट्यूट, देहरादून के बीच बैठक हुई, जिसमें एसओपी के ड्राफ्ट पर विस्तार से चर्चा की गई। इसमें प्रस्तावित बदलावों के पीछे का कारण और दूसरी संबंधित बातें शामिल थीं। इस दौरान, एफआरआई के डायरेक्टर ने जंगल की आग की रोकथाम, उसे कम करने और उससे निपटने के लिए स्टैंडर्ड ऑपरेटिंग प्रोसीजर पर एक प्रेजेंटेशन दिया।
अलग-अलग वनों के लिए अलग रणनीति
मंत्रालय ने 10 अगस्त 2025 को फिर पत्र भेजकर एसओपी को और बेहतर बनाने तथा बैठक में दिए गए सुझावों को शामिल कर संशोधित एसओपी शीघ्र भेजने को कहा। इसके बाद 25 सितंबर 2025 को आईसीएफआरई, देहरादून ने संशोधित एसओपी मंत्रालय को सौंप दिए।
जानकारी मिली है कि ये स्टैंडर्ड ऑपरेटिंग प्रोसीजर देश के विभिन्न प्रकार के वनों की विशेषताओं को ध्यान में रखते हुए तैयार किए गए हैं।
इनमें प्रमुख रूप से ट्रॉपिकल ड्राई डेसिडुअस फॉरेस्ट (उष्णकटिबंधीय शुष्क पर्णपाती वन), सब-ट्रॉपिकल पाइन फॉरेस्ट (उप-उष्णकटिबंधीय चीड़ वन), सब-ट्रॉपिकल ब्रॉडलीफ फॉरेस्ट (उप-उष्णकटिबंधीय चौड़ी पत्ती वाले वन), ट्रॉपिकल सेमी-एवरग्रीन फॉरेस्ट (उष्णकटिबंधीय अर्ध-सदाबहार वन) और ट्रॉपिकल मॉइस्ट डेसिडुअस फॉरेस्ट (उष्णकटिबंधीय आर्द्र पर्णपाती वन) शामिल हैं, ताकि हर प्रकार के वन क्षेत्र में आग की रोकथाम और प्रबंधन के लिए उपयुक्त रणनीति लागू की जा सके।
उम्मीद है कि इन नई एसओपी के लागू होने से देशभर के जंगलों में आग की रोकथाम और प्रबंधन पहले से कहीं अधिक संगठित और प्रभावी होगा। यह पहल न केवल त्वरित और सटीक आपातकालीन प्रतिक्रिया सुनिश्चित करेगी, बल्कि प्राकृतिक संसाधनों के संरक्षण और पर्यावरणीय संतुलन बनाए रखने में भी मदद करेगी।
विशेषज्ञों का मानना है कि इस रणनीति से वनाग्नि से होने वाले मानवीय और आर्थिक नुकसान को भी कम किया जा सकेगा, और भारत के जंगलों की सुरक्षा की दिशा में यह एक महत्वपूर्ण मील का पत्थर साबित होगी।