पेड़ों को अवैध रूप से काटे जाने के मामले में बीएचयू पर लगा दो करोड़ से ज्यादा का जुर्माना

अवैध रूप से 33 पेड़ों को काटने के मामले में सख्त रुख अपनाते हुए उत्तर प्रदेश प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड ने काशी हिन्दू विश्वविद्यालय को 2.65 करोड़ रुपए से अधिक का पर्यावरणीय मुआवजा भरने का निर्देश दिया है
प्रतीकात्मक तस्वीर: आईस्टॉक
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सारांश
  • पर्यावरण नियमों के उल्लंघन के मामलों में नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (एनजीटी) ने सख्त रुख अपनाते हुए प्राकृतिक संसाधनों की सुरक्षा को सर्वोच्च प्राथमिकता दी है।

  • काशी हिन्दू विश्वविद्यालय (बीएचयू) परिसर में बिना अनुमति 33 पेड़ों की कटाई, जिनमें 7 चंदन के पेड़ भी शामिल थे, के मामले में उत्तर प्रदेश प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड ने विश्वविद्यालय पर 2.65 करोड़ रुपये से अधिक का पर्यावरणीय मुआवजा लगाया है।

  • एनजीटी को बताया गया कि इसकी वसूली की कार्रवाई तीन महीने में पूरी की जाएगी। हालांकि बीएचयू ने कोर्ट के निर्देश के अनुसार कटे पेड़ों के बदले 978 पौधे लगाए, जिनमें 859 सुरक्षित पाए गए, लेकिन पौधारोपण अवैध कटाई की जिम्मेदारी से मुक्त नहीं कर सका।

  • वहीं गाजीपुर में तालाब की भूमि पर कथित अतिक्रमण कर निजी स्कूल निर्माण के मामले में एनजीटी ने उत्तर प्रदेश सरकार, पर्यावरण विभाग, जिला प्रशासन और संबंधित एजेंसियों से जवाब मांगा है।

  • आरोप है कि सार्वजनिक तालाब की जमीन पर निर्माण के साथ स्थानीय लोगों के पारंपरिक रास्ते को भी प्रभावित किया गया।

  • दोनों मामलों में एनजीटी के फैसले और निर्देश यह स्पष्ट करते हैं कि पर्यावरणीय नियमों की अनदेखी करने वालों के खिलाफ कठोर कार्रवाई होगी और प्राकृतिक संसाधनों की रक्षा के लिए जवाबदेही तय की जाएगी।

काशी हिन्दू विश्वविद्यालय (बीएचयू) परिसर में अवैध रूप से पेड़ों को काटने के मामले में नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (एनजीटी) में एक बड़ा अपडेट सामने आया है। उत्तर प्रदेश प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (यूपीपीसीबी) ने ट्रिब्यूनल को सूचित किया है कि यूनिवर्सिटी पर 2,65,26,877 (दो करोड़ पैंसठ लाख रुपए से अधिक) का पर्यावरणीय मुआवजा लगाया गया है।

गौरतलब है कि इन काटे गए 33 पेड़ों में चंदन के 7 बेशकीमती पेड़ भी शामिल थे।

7 जुलाई 2026 को इस मामले की सुनवाई के दौरान उत्तर प्रदेश प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के वकील ने कोर्ट को बताया कि मुआवजे के आंकलन की प्रक्रिया पूरी हो चुकी है और इसकी वसूली की कार्रवाई अगले तीन महीनों के भीतर पूरी कर ली जाएगी।

इससे पहले, एनजीटी ने एक संयुक्त समिति का गठन कर जांच के आदेश दिए थे, जिसमें यूनिवर्सिटी को बिना अनुमति पेड़ काटने का दोषी पाया गया था।

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सुनवाई के दौरान यह सामने आया कि बीएचयू परिसर में 33 पेड़ नियमों के विरुद्ध काटे गए थे।

बदले में लगाने पड़े 900 से ज्यादा पौधे

इसके बाद अगस्त 2025 में कोर्ट ने बीएचयू को हर एक काटे गए पेड़ के बदले में कम से कम 20 नए पेड़ लगाने का आदेश दिया था। विभागीय वन अधिकारी की रिपोर्ट के मुताबिक, यूनिवर्सिटी ने कोर्ट के इस आदेश का पालन किया है।

29 जून 2026 को मौके पर किए गए निरीक्षण में पाया गया कि बीएचयू ने परिसर में 978 पौधे लगाए थे, जिनमें से 859 पौधे सुरक्षित और जीवित हैं।

अधिकरण ने यह भी निर्देश दिया था कि पेड़ों को अवैध रूप से काटे जाने के लिए बीचएयू को पर्यावरणीय मुआवजा देना होगा, जिसकी गणना प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड को सुनवाई का अवसर देने के बाद करनी थी।

विश्वविद्यालय की और से पेश वकील ने अदालत में पक्ष रखा कि जीवित बचे पौधों की संख्या ट्रिब्यूनल द्वारा तय किए गए कोटे से अधिक है। हालांकि, वृक्षारोपण के बावजूद यूनिवर्सिटी अवैध कटाई के जुर्माने से बच नहीं सकी और अब उसे 2.65 करोड़ रुपए से अधिक की भारी-भरकम धनराशि चुकानी होगी।

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गाजीपुर में तालाब पर बन गया स्कूल: एनजीटी ने सरकार से मांगा जवाब

नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (एनजीटी) ने गाजीपुर की मोहम्मदाबाद तहसील में तालाब की भूमि पर कथित अतिक्रमण कर निजी स्कूल के निर्माण के मामले में उत्तर प्रदेश सरकार से जवाब तलब किया है।

एनजीटी ने 6 जुलाई 2026 को उत्तर प्रदेश के पर्यावरण सचिव, राज्य आर्द्रभूमि प्राधिकरण (स्टेट वेटलैंड अथॉरिटी), गाजीपुर के जिलाधिकारी, जिला आर्द्रभूमि समिति तथा उत्तर प्रदेश प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड को नोटिस जारी कर दो महीने के भीतर अपना जवाब दाखिल करने का निर्देश दिया है।

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गौरतलब है कि यह मामला यूसुफपुर कस्बा गंज निवासी आफताब आलम द्वारा दायर याचिका पर सुनवाई के दौरान सामने आया। याचिका में आरोप लगाया गया है कि मोहम्मदाबाद नगर पालिका परिषद ने सार्वजनिक तालाब की भूमि पर एक निजी स्कूल भवन के निर्माण को मंजूरी दे दी।

इससे न केवल तालाब की भूमि पर अतिक्रमण हुआ, बल्कि यूसुफपुर कस्बा गंज दक्षिणी क्षेत्र के लोगों द्वारा वर्षों से उपयोग किए जा रहे सार्वजनिक रास्ते को भी कथित भू-माफियाओं ने बंद कर दिया। यह रास्ता बस्ती के अंतिम छोर तक आने-जाने का मुख्य मार्ग बताया गया है।

सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता अफताब आलम मोबाइल फोन के माध्यम से जुड़े और उन्होंने एनजीटी के समक्ष अपना पक्ष रखा। मामले की अगली सुनवाई संबंधित विभागों के जवाब दाखिल होने के बाद होगी।

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